अपराध से पहले सजा? मध्य प्रदेश की जेलों में अटकी गरीबों की जिंदगी

मध्य प्रदेश की जेलों में क्षमता से कहीं अधिक कैदी बंद हैं। आधे से ज्यादा कैदी विचाराधीन हैं, जिनमें बड़ी संख्या गरीब और कमजोर वर्गों की है। जमानत और धीमी सुनवाई के कारण हजारों लोग बिना दोष सिद्ध हुए सालों से जेल में हैं।

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Madhya Pradesh Jails Packed With Undertrials
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News In Short 

  • मध्य प्रदेश की 132 जेलों में फिलहाल 45,543 कैदी हैं, जबकि जेलों की अधिकतम क्षमता लगभग 30 हजार ही है, जिससे स्थिति बेहद गंभीर हो गई है।
  • राज्य की जेलों में बंद हर दूसरा कैदी विचाराधीन है, यानी उसके खिलाफ अभी तक दोष साबित नहीं हुआ है।
  • आंकड़े बताते हैं कि विचाराधीन कैदियों में आदिवासी, दलित और OBC समुदाय की हिस्सेदारी करीब 80% है।
  • आर्थिक कमजोरी और जमानत की राशि न जुटा पाना कैदियों के लंबे समय तक जेल में रहने की सबसे बड़ी वजह बन रहा है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है।

News In Detail

मध्य प्रदेश की जेलों की स्थिति लगातार चिंता बढ़ाने वाली होती जा रही है। राज्य की जेलों की कुल क्षमता भले ही 30,000 हो, लेकिन फिलहाल इनमें 45,543 कैदी बंद हैं। इस भारी भीड़ में सबसे गंभीर पहलू है विचाराधीन कैदियों की संख्या, जो कुल कैदियों का लगभग आधा हिस्सा है।

लंबी न्यायिक प्रक्रिया और जमानत राशि जुटाने में असमर्थता के कारण गरीब कैदी महीनों नहीं, बल्कि सालों तक सलाखों के पीछे फंसे रहते हैं। यह स्थिति केवल न्याय में देरी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता की सच्चाई भी उजागर करती है।

कौन हैं ये विचाराधीन कैदी?

जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों का सामाजिक प्रोफाइल साफ बताता है कि सबसे ज्यादा मार कमजोर वर्ग झेल रहा है।

  • आदिवासी: 21%
  • दलित: 19%
  • OBC: 40%

इन आंकड़ों से साफ होता है कि विचाराधीन कैदियों में सबसे ज्यादा संख्या गरीब और वंचित वर्गों की है। इस मद्दे की गंभीरता को ग्राफ से भी समझा जा सकता है। देखिए- 

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इसी मुद्दे पर X पर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ सरकार में वन मंत्री रह चुके और गंधवानी से कांग्रेस विधायक उमंग सिंघार ने भी चिंता जताई। उन्होंने लिखा 

“मध्य प्रदेश की जेलें: अन्याय की सलाखें। सरकार और न्यायालय को मिलकर विचाराधीन कैदियों की सुनवाई शीघ्र पूरी करनी चाहिए, जमानत प्रक्रिया सरल बनानी चाहिए और जेल सुधारों पर ध्यान देना चाहिए।”

इन आंकड़ों से साफ है कि गरीब और कमजोर वर्ग न्यायिक प्रक्रिया में सबसे ज्यादा फंसा हुआ है, जबकि जेलें उनकी आज़ादी और ज़िंदगी पर भारी बोझ बनती जा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दो टूक कहा है कि बिना दोष साबित हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी माना कि जमानत राशि न जुटा पाने के कारण गरीब कैदी अक्सर सालों तक जेल में पड़े रहते हैं। इसी को देखते हुए राज्यों को नियमित समीक्षा और जमानत प्रक्रिया में सुधार के निर्देश दिए गए हैं।

दोषियों की स्थिति

प्रदेश में दोषी कैदियों की संख्या लगभग 22,000 है, जिनमें से करीब आधे आदिवासी और दलित समुदाय से हैं। यह दर्शाता है कि जेलों में सामाजिक असमानता केवल विचाराधीन कैदियों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे जेल तंत्र में गहराई तक मौजूद है।

मध्य प्रदेश की जेलों की यह तस्वीर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की असली परीक्षा है। जब आधे से अधिक कैदी बिना दोष सिद्ध हुए सालों तक जेल में रहते हैं, तो सवाल सिर्फ भीड़ का नहीं, बल्कि न्याय की समानता और संवैधानिक अधिकारों का खड़ा होता है।

अगर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियों के बावजूद हालात नहीं बदले, तो जेलें सुधारगृह नहीं, बल्कि गरीब और कमजोर वर्गों के लिए स्थायी सजा बनती जाएंगी। अब वक्त आ गया है कि सरकार और न्यायपालिका सिर्फ बयानों तक सीमित न रहें, बल्कि तेज़ सुनवाई, आसान जमानत और ठोस जेल सुधार जमीन पर लागू करें वरना “न्याय” शब्द केवल कागजों में ही सिमट कर रह जाएगा।

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