अपराध से पहले सजा? मध्य प्रदेश की जेलों में अटकी गरीबों की जिंदगी
thesootr Desk | Jan 18, 2026, 15:54 IST
Madhya Pradesh Jails Packed With Undertrials
मध्य प्रदेश की जेलों में क्षमता से कहीं अधिक कैदी बंद हैं। आधे से ज्यादा कैदी विचाराधीन हैं, जिनमें बड़ी संख्या गरीब और कमजोर वर्गों की है। जमानत और धीमी सुनवाई के कारण हजारों लोग बिना दोष सिद्ध हुए सालों से जेल में हैं।
News In Short
- मध्य प्रदेश की 132 जेलों में फिलहाल 45,543 कैदी हैं, जबकि जेलों की अधिकतम क्षमता लगभग 30 हजार ही है, जिससे स्थिति बेहद गंभीर हो गई है।
- राज्य की जेलों में बंद हर दूसरा कैदी विचाराधीन है, यानी उसके खिलाफ अभी तक दोष साबित नहीं हुआ है।
- आंकड़े बताते हैं कि विचाराधीन कैदियों में आदिवासी, दलित और OBC समुदाय की हिस्सेदारी करीब 80% है।
- आर्थिक कमजोरी और जमानत की राशि न जुटा पाना कैदियों के लंबे समय तक जेल में रहने की सबसे बड़ी वजह बन रहा है।
- सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है।
News In Detail
लंबी न्यायिक प्रक्रिया और जमानत राशि जुटाने में असमर्थता के कारण गरीब कैदी महीनों नहीं, बल्कि सालों तक सलाखों के पीछे फंसे रहते हैं। यह स्थिति केवल न्याय में देरी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता की सच्चाई भी उजागर करती है।
कौन हैं ये विचाराधीन कैदी?
- आदिवासी: 21%
- दलित: 19%
- OBC: 40%
jain in mp
इसी मुद्दे पर X पर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ सरकार में वन मंत्री रह चुके और गंधवानी से कांग्रेस विधायक उमंग सिंघार ने भी चिंता जताई। उन्होंने लिखा
मध्य प्रदेश की जेलें: अन्याय की सलाखें। सरकार और न्यायालय को मिलकर विचाराधीन कैदियों की सुनवाई शीघ्र पूरी करनी चाहिए, जमानत प्रक्रिया सरल बनानी चाहिए और जेल सुधारों पर ध्यान देना चाहिए।
मध्य प्रदेश की जेलों में 50% विचाराधीन कैदी, सबसे अधिक आदिवासी !
मध्य प्रदेश की 132 जेलों में देश में तीसरे सबसे अधिक 45,543 कैदी बंद हैं। पहले और दूसरे स्थान पर बिहार तथा उत्तर प्रदेश हैं।
राज्य की जेलों की कुल क्षमता लगभग 30 हजार के आसपास है, लेकिन वर्तमान में कैदियों की… pic.twitter.com/aYKmU5J1wI
— Umang Singhar (@UmangSinghar) January 18, 2026
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
दोषियों की स्थिति
मध्य प्रदेश की जेलों की यह तस्वीर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की असली परीक्षा है। जब आधे से अधिक कैदी बिना दोष सिद्ध हुए सालों तक जेल में रहते हैं, तो सवाल सिर्फ भीड़ का नहीं, बल्कि न्याय की समानता और संवैधानिक अधिकारों का खड़ा होता है।
अगर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियों के बावजूद हालात नहीं बदले, तो जेलें सुधारगृह नहीं, बल्कि गरीब और कमजोर वर्गों के लिए स्थायी सजा बनती जाएंगी। अब वक्त आ गया है कि सरकार और न्यायपालिका सिर्फ बयानों तक सीमित न रहें, बल्कि तेज़ सुनवाई, आसान जमानत और ठोस जेल सुधार जमीन पर लागू करें वरना “न्याय” शब्द केवल कागजों में ही सिमट कर रह जाएगा।
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