फाइलें जीतीं, वैज्ञानिक हारे: एमपी के 250 कृषि गुरु दाने-दाने को मोहताज!
Ravi Awasthi | Feb 10, 2026, 11:40 IST
madhya pradesh krishi vigyan kendra salary crisis
मध्यप्रदेश में दूसरों को उन्नत खेती के गुण सिखाने वाले कृषि वैज्ञानिकों का हाथ आज खाली है। अफसरशाही के अड़ियल रवैये से ये वैज्ञानिक दो साल से अपने वेतन के लिए तरस रहे हैं।
News In Short
- मध्य प्रदेश में करीब 250 कृषि वैज्ञानिक अपने वेतन को तरस रहे हैं।
- आईसीएआर ने दिया तर्क कि इन्हें वेतन सुविधाएं देना राज्य की जिम्मेदारी है।
- सरकार का तर्क है कि पहले आरसीएआर (केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद) खर्च उठाता था तो अब क्यों नहीं उठाता है।
- आईसीएआर और सरकार की लड़ाई में दो साल से मामला अटका है।
- विश्वविद्यालय सभी 228 कर्मचारियों का संविलियन नहीं कर सकता है।
News In Detail
ऐसे चलते हैं कृषि विज्ञान केंद्र
अकेले जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े केंद्रों में ही करीब 150 वैज्ञानिकों सहित 228 कर्मचारी कार्यरत हैं। ये सभी केंद्र अलग-अलग वर्षों में स्थापित हुए हैं। दो साल से सभी एक जैसी वेतन समस्या से जूझ रहे हैं।
दो साल पहले शुरू हुआ संकट
इस एमओयू में यह स्पष्ट था कि कर्मचारी राज्य सरकार के माने जाएंगे। केंद्रों की स्थापना में यह शर्त पहले से तय की गई थी। उनकी पेंशन व अन्य देनदारियां राज्य सरकार की जिम्मेदारी होंगी। आईसीएआर का कहना है कि वह केवल मूल वेतन, महंगाई भत्ता और मकान भत्ता का भुगतान करने के लिए बाध्य है।
पहले दे रहे थे,अब क्यों नहीं?
हाईकोर्ट की दखल,पूरा वेतन दें
विश्वविद्यालय खुद वेतन संकट में
जैन के मुताबिक अदालत के आदेश के अनुसार आईसीएआर से प्राप्त पूरी राशि कृषि विज्ञान केंद्रों को आवंटित की जा रही है। तय अनुपात से कम राशि मिलने के कारण साल में केवल कुछ महीनों का ही वेतन दिया जा रहा है।
संविलियन का प्रस्ताव, अनुसंधान पर खतरा
अब शर्तों की दुहाई क्यों
वहीं राज्य के कृषि विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने भी इस पर अपनी टिप्पणी दी। कहा कि दो साल पहले तक आईसीएआर पूरा वेतन देता रहा है। अब अचानक अनुबंध की शर्तों की दुहाई क्यों दी जा रही है।
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है। ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों को राज्य सरकार का कर्मचारी नहीं माना जा सकता।
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