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News in Short
मंत्री प्रतिमा बागरी सतना की रैगांव (SC) सीट से विधायक हैं।
उनके जाति प्रमाण पत्र को चुनौती देते हुए WP No. 5948/2026 दायर हुई थी।
18 फरवरी 2026 को जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच में सुनवाई हुई थी।
‘लोकस’ स्पष्ट न होने पर याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली है।
कोर्ट ने भविष्य में उचित प्रक्रिया के तहत दोबारा याचिका दायर करने की छूट दी है।
News in Detail
मध्यप्रदेश की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र के फर्जी होने के आरोप कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने लगाए थे। इस मामले में उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। जबलपुर हाईकोर्ट में 18 फरवरी 2026 को इस मामले की सुनवाई हुई।
मामला जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच के समक्ष लगा था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि इस मामले में उनका ‘लोकस’ यानी कानूनी अधिकार क्या है।
लंबी बहस के बाद भी जब यह स्पष्ट नहीं हो सका कि याचिकाकर्ता सीधे तौर पर किस तरह से प्रभावित हैं। इसके बाद उनके अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अहिरवार की ओर से अधिवक्ता ने याचिका को वापस ले लिया है।
हालांकि कोर्ट ने आदेश में यह स्वतंत्रता दी है कि याचिकाकर्ता उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाकर भविष्य में मामला उठा सकते हैं।
क्या है जाति प्रमाण पत्र का पूरा विवाद?
मंत्री प्रतिमा बागरी सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट से विधायक हैं, जो अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने उन पर आरोप लगाया है। इसमें उन्होंने कहा कि बागरी मूल रूप से राजपूत/ठाकुर बागरी समुदाय से हैं, जो अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं है।
अहिरवार का दावा है कि 2003 में मध्य प्रदेश सरकार और 2007 में केंद्र सरकार ने आदेश जारी किए थे। इनके अनुसार संबंधित जाति SC वर्ग में नहीं आती। उनका आरोप है कि प्रशासनिक मिलीभगत से फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर प्रतिमा बागरी ने 2023 का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
कांग्रेस ने की थी जांच की मांग उसके बाद पहुंचे हाईकोर्ट
कांग्रेस ने इस मामले को राजनीतिक और सामाजिक न्याय का सवाल बताते हुए, पहले प्रदीप अहिरवार ने जाति प्रमाण पत्र छानबीन समिति को ज्ञापन सौंपा था।
उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग की और मंत्री पद से बर्खास्तगी, विधायक पद की अयोग्यता और कानूनी कार्रवाई की भी मांग उठाई थी। हालांकि फरवरी 2026 तक इस मामले में किसी सक्षम अधिकारी ने अंतिम फैसला नहीं लिया है। इससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा का माहौल बना हुआ है। वहीं, यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
मंत्री प्रतिमा बागरी बता चुकी हैं आरोपों को निराधार
मंत्री प्रतिमा बागरी ने शुरू से ही इन आरोपों को निराधार बताया था। उनका कहना था कि उनके सभी दस्तावेज वैध और विधिसम्मत हैं। उन्होंने किसी भी निष्पक्ष जांच का स्वागत करने की बात कही है।
इसके साथ ही, कहा है कि चुनाव आयोग एवं प्रशासनिक स्तर पर पहले भी उनके दस्तावेजों की जांच हो चुकी है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनके नामांकन पर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं, लेकिन जांच में दस्तावेज सही पाए गए थे। इसके बाद उन्होंने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
राजनीतिक असर और आगे की राह
याचिका वापस लिए जाने को फिलहाल मंत्री के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, कोर्ट ने भविष्य में उचित मंच पर मामला उठाने की छूट देकर विवाद का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है।
यदि याचिकाकर्ता या कोई अन्य पक्ष सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रमाण और ठोस आधार के साथ शिकायत दर्ज करता है, तो मामला फिर कानूनी जंग में बदल सकता है।
फिलहाल यह मामला न्यायिक प्रक्रिया के अगले कदम की प्रतीक्षा में है, जबकि मध्य प्रदेश की राजनीति में यह मुद्दा आने वाले समय में और गरमा सकता है। हालांकि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आरोपों से अभी तो मंत्री प्रतिमा बागरी को हाईकोर्ट से राहत मिल गई है।
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