एमपी आयुष विभाग में नियुक्तियों पर उठे सवाल, जांच कमेटी ने प्रमाण पत्रों में गड़बड़ी बताई, मंत्री ने कहा- सब सही

Atul Dwivedi | Oct 26, 2026, 20:17 IST
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MP में आरक्षित पद पर अनारक्षित उम्मीदवार की नियुक्ति का आरोप।
MP में आरक्षित पद पर अनारक्षित उम्मीदवार की नियुक्ति का आरोप।

मध्यप्रदेश के सरकारी विभागों में फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर आप आराम से नौकरी कर सकते हैं। यकीन न हो तो मध्यप्रदेश के आयुष विभाग को देख लीजिए। यहां परीक्षा के बाद जॉइन हुए अधिकारियों के दस्तावेजों और अनुभव प्रमाण पत्रों की जांच हुई। जांच कमेटी ने पाया कि कुछ अधिकारियों के सर्टिफिकेट सही नहीं हैं। यानी मामला गड़बड़ है, कार्रवाई होनी चाहिए।

वहीं, विडंबना देखिए फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर नौकरी कर रहे अधिकारियों पर कार्रवाई होना तो दूर, मंत्री विधानसभा में खड़े होकर उनके समर्थन में जवाब दे रहे हैं। मंत्री इंदर सिंह परमार से जब इन अधिकारियों के प्रमाण पत्रों को लेकर सवाल किया गया, तो मंत्री ने सब कुछ ठीक बताया और मामला रफा-दफा कर दिया। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब जांच कमेटी प्रमाण पत्रों को फर्जी बता रही है, तो मंत्री उसे किस आधार पर सही कह रहे हैं? यहां कौन सही है कौन गलत?

इतना ही नहीं आयुष विभाग में तो आरक्षित पदों पर अनारक्षित कैटेगरी के उम्मीदवार की जॉइनिंग हो रही है। जॉइनिंग के बाद साहब का ट्रांसफर भोपाल में एक अच्छे और बड़े पद पर भी हो गया है। इन्हीं सारे मामलों की पड़ताल द सूत्र ने इस खबर में की है। ये पूरा मामला आयुष विभाग में आयुष अधिकारियों की जॉइनिंग से जुड़ा है। जिसकी परीक्षा मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की तरफ से आयोजित की गई थी।

पहले मामला समझें

मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने 31 मार्च 2015 को जिला आयुष अधिकारी के पदों पर भर्ती निकाली थी। भर्ती में आयुर्वेद, होम्यो और यूनानी चिकित्सा अधिकारी के पद पर पांच साल का अनुभव मांगा गया था। ये भर्ती द्वितीय श्रेणी के 5400 ग्रेड पे वाली पदों पर निकाली गई थी। इसी भर्ती परीक्षा के बाद आयुष विभाग में डॉ. मनीषा पाठक, डॉ. सुरत्ना चौहान, डॉ. नरेंद्र कुमार पटेल, डॉ. गिरिराज बाथम और डॉ. निधि गुप्ता की जॉइनिंग हुई।

इन लोगों के डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के लिए विभाग ने एक समिति गठित की। इस समिति में डॉ. सीपी शर्मा अध्यक्ष, डॉ. पीसी शर्मा सदस्य और डॉ. वंदना बोराना सदस्य के तौर पर थे। समिति का काम था इन लोगों के दस्तावेजों की जांच करना, और अपनी रिपोर्ट विभाग को सौंपना। अब चलिए आपको एक-एक करके इन पांचों अधिकारियों की जांच रिपोर्ट में क्या निकला था वो बताते हैं।

कमेटी की जांच रिपोर्ट

कमेटी की जांच रिपोर्ट के बाद सबसे ज्यादा संदेह के घेरे में हैं डॉ. गिरिराज बाथम और डॉ. निधि गुप्ता। इन दोनों के अनुभव प्रमाण पत्रों को कमेटी ने संदिग्ध माना है। द सूत्र के पास जांच कमेटी की रिपोर्ट भी मौजूद है। डॉ. गिरिराज बाथम ने श्योपुर की एक संस्था का अनुभव प्रमाण पत्र जमा किया जिसमें उन्हें चिकित्सा अधिकारी बताया गया। लेकिन जांच कमेटी ने जांच में पाया कि संस्थान के लेटरहेड में चौबीस घंटे आकस्मिक सेवाएं देने का जिक्र है। जिस संस्थान का अनुभव प्रमाण पत्र बाथम ने लगाया वो आयुर्वेद चिकित्सा के लिए है ही नहीं।

इतना ही नहीं बाथम ने अपने पांच साल के अनुभव को पूरा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बाथम ने कुल छह अनुभव प्रमाण पत्र लगाए। जिसमें कोई दो साल का, कोई आठ महीने का तो कोई अनुभव प्रमाण पत्र एक साल आठ महीने का था। समिति का दावा है कि जिस पीपुल टू पीपुल इंडिया विकास परियोजना का अनुभव प्रमाण पत्र बाथम ने लगाया, वो तो एनजीओ है, न कि आयुर्वेद संस्थान। एक अनुभव प्रमाण पत्र तो कुष्ठ सलाहकार का लगाया गया है। जबकि मांगा चिकित्सा अधिकारी का गया था।

जांच कमेटी ने डॉ. बाथम का कुल अनुभव निकाला तो ये चार साल दो महीने का ही मिला। यानी मांगी गई अनिवार्य योग्यता से 10 महीने कम। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि फिर बाथम की जॉइनिंग हुई कैसे?

इसके अलावा एक और अधिकारी हैं, जिनका नाम डॉ. निधि गुप्ता है। निधि गुप्ता ने भी मंदसौर इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद एजुकेशन एंड रिसर्च के मेडिकल ऑफिसर का अनुभव प्रमाण पत्र लगाया। लेकिन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि मंदसौर इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद एजुकेशन एंड रिसर्च ने उस प्रमाण पत्र को जारी नहीं किया है। ये बात खुद इंस्टीट्यूट ने कमेटी को बताई।

जब ये वैकेंसी निकाली गई थी, तब फॉर्म भरने की लास्ट डेट 09 मई 2015 थी। तब तक डॉ. गुप्ता का कुल अनुभव मात्र चार साल नौ दिन का था। ऐसे में डॉ. निधि गुप्ता भी सवालों के घेरे में हैं कि फिर इनकी जॉइनिंग हुई कैसे? जांच कमेटी ने अपनी टीप में ये भी लिखा कि डॉ. निधि गुप्ता, डॉ. मनीषा पाठक, डॉ. सुरत्ना सिंह चौहान और डॉ. नरेंद्र पटेल के अनुभव प्रमाण पत्र संविदा के हैं। यानी इन लोगों ने नियमित पद पर नौकरी नहीं की थी।

मंत्री ने विधानसभा में क्या कहा?

मामले में कांग्रेस विधायक केशव देसाई ने सवाल भी उठाया था। विधायक ने विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान साल 2025 में पूछा कि जब डॉ. निधि गुप्ता का अनुभव प्रमाण पत्र फर्जी पाया गया था, तब भी उनकी पोस्टिंग क्यों की गई? उन्होंने ये भी पूछा कि जब निधि गुप्ता जिला आयुष अधिकारी के पद पर थीं तो परिवीक्षा अवधि के दौरान ही उन्हें उच्च कार्यालय में किस नियम के तहत पोस्टिंग दी गई?

इसका जवाब दिया मंत्री इंदर सिंह परमार ने। आयुष मंत्री ने कहा कि सिलेक्ट हुए अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच की गई थी। डॉ. निधि गुप्ता के दस्तावेज और अनुभव प्रमाण पत्र विभागीय सेवा भर्ती नियमों के तहत हैं। मंत्री ने आगे कहा कि उनकी नियुक्ति नियमों के तहत हुई है। साथ ही उनका तर्क ये था कि संचालनालय में नियमित अधिकारी नहीं था, इसलिए डॉ. गुप्ता की पोस्टिंग की गई। यानी ये बड़ा गजब मामला है। जांच कमेटी कह रही है दस्तावेज फर्जी हैं, लेकिन मंत्री कहते हैं सब ठीक है।

मंत्री का जवाब
मंत्री का जवाब
मामला सिर्फ इन दो अधिकारियों तक सीमित नहीं है। एक और अधिकारी से आपको मिलवाते हैं। इनका नाम राजीव मिश्रा है। दावा है कि इनकी नियुक्ति व्याख्याता के पद पर आयुर्वेद महाविद्यालय बुरहानपुर में हुई थी। लेकिन जिस कैटेगरी में इनकी नियुक्ति हुई, उसने बवाल खड़ा कर दिया। विधानसभा में पूछे गए सवाल के मुताबिक राजीव मिश्रा की नियुक्ति आरक्षित पद पर की गई थी, जो कि एकल पद था। यानी दूसरा पद था ही नहीं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मिश्रा यानी सामान्य कैटेगरी वाले उम्मीदवार का सिलेक्शन आरक्षित पद पर कैसे हो गया?

विभाग ने क्या कहा?

मामले में विभाग का पक्ष जानने द सूत्र ने संचालनालय आयुष के प्रमुख सचिव शोभित जैन से संपर्क किया। हमने प्रमुख सचिव को मैसेज किए, कई बार फोन भी किया लेकिन उनकी तरफ से खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया है। उनका जवाब आने पर उसे खबर में शामिल किया जाएगा।
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