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Shivpuri. शिवपुरी जिले की करैरा विधानसभा सीट इस समय पूरे मध्यप्रदेश में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। वजह कोई बड़ा विकास कार्य नहीं, बल्कि भाजपा विधायक रमेश खटीक के जरिए की गई थोक नियुक्तियां हैं।
विधायक जी ने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 106 कार्यकर्ताओं को विधायक प्रतिनिधि बनाकर नियुक्ति पत्र सौंप दिए हैं। विधायक के इस कदम के बाद जिले की राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
हर विभाग में माननीय के खास
बीजेपी विधायक रमेश खटीक ने नियुक्तियों के मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने जिला मुख्यालय के लगभग सभी सरकारी विभागों से लेकर अपने क्षेत्र के स्कूल, कॉलेज, छात्रावास और यहां तक कि निजी विश्वविद्यालयों में भी अपने प्रतिनिधि तैनात कर दिए हैं।
इतना ही नहीं, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और पशु अस्पतालों तक में अब विधायक प्रतिनिधि नजर आएंगे। आलम यह है कि क्षेत्र की जनता अब चुटकी ले रही है कि शायद ही कोई ऐसा कोना बचा हो जहां विधायक प्रतिनिधि की नेमप्लेट न दिखे।
पार्षदों की संख्या से आगे निकले प्रतिनिधि
शिवपुरी जिले का गणित देखें तो यह आंकड़ा और भी दिलचस्प हो जाता है। जिले की सात नगर परिषदों और एक नगर पालिका को मिलाकर कुल 152 निर्वाचित पार्षद हैं।
वहीं, ताज्जुब की बात यह है कि सिर्फ दो विधायकों (पिछोर के प्रीतम लोधी और करैरा के रमेश खटीक) के प्रतिनिधियों की कुल संख्या करीब 200 पहुंच गई है। यानी जनता के जरिए चुने गए पार्षदों से कहीं ज्यादा संख्या इन मनोनीत प्रतिनिधियों की हो गई है।
हर दूसरी गली में मिलेगा एक प्रतिनिधि- कांग्रेस
इस नियुक्ति अभियान पर विपक्षी (कांग्रेस) ने तीखा हमला बोला है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र गुप्ता ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा में अब काम से ज्यादा प्रतिनिधि बनाने की होड़ मची है।
कांग्रेस का आरोप है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली जैसे विभागों में इतने प्रतिनिधि बनाना असंवैधानिक है। यह सिर्फ समर्थकों को अनावश्यक लाभ पहुंचाने की कोशिश है।
कांग्रेस ने याद दिलाया कि इससे पहले पिछोर विधायक प्रीतम लोधी ने थानों में प्रतिनिधि नियुक्त कर सुर्खियां बटोरी थीं। वहीं केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक ने भी सवा सौ से ज्यादा सांसद प्रतिनिधि बनाए थे।
समाधान के लिए बढ़ाया कुनबा- विधायक
चारों तरफ से घिरने के बाद विधायक रमेश खटीक ने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतनी बड़ी संख्या में प्रतिनिधि बनाने का मकसद रेवड़ी बांटना नहीं, बल्कि जनसमस्याओं का त्वरित समाधान करना है।
उनका तर्क है कि अधिक प्रतिनिधि होने से हर समुदाय की समस्या उन तक आसानी से पहुंचेगी। साथ ही, वे सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा सकेंगे।
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