MP BJP संगठन में बिना ट्रेनिंग प्रयोग? एक साल बाद भी जिलाध्यक्ष अनट्रेंड, नियुक्तियां अटकीं
Ramanand Tiwari | Feb 16, 2026, 23:09 IST
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मध्य प्रदेश भाजपा में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति को एक साल से अधिक हो चुका है। अब तक प्रशिक्षण अभियान शुरू नहीं हुआ है। पार्टी की परंपरा के अनुसार नियुक्ति के बाद प्रशिक्षण अनिवार्य होता है।
BHOPAL. मध्यप्रदेश भाजपा में नए जिलाध्यक्षों और पदाधिकारियों की घोषणा हुए एक साल से ज्यादा हो चुका है, लेकिन अब तक प्रशिक्षण अभियान शुरू नहीं हो पाया। पार्टी की परंपरा के मुताबिक, नियुक्ति के बाद प्रशिक्षण शिविर अनिवार्य होता है, ताकि नई टीम नीति-रीति समझकर काम करे। जमीनी हकीकत यह है कि कई जिलों में पदाधिकारी बिना औपचारिक ट्रेनिंग के काम कर रहे हैं। भोपाल और ग्वालियर में हाल की नियुक्तियों के दौरान दिखी नूरा-कुश्ती ने सवाल और गहरे कर दिए हैं।
जिलाध्यक्ष बने एक साल से अधिक का समय हो चुका है। फिर भी प्रशिक्षण नहीं हुआ। प्रकोष्ठ, मंडल, निगम संयोजकों की नियुक्तियां लंबित हैं। प्रदेश कार्यशाला और ट्रेनर टीम का खाका तैयार है, लेकिन अमल नहीं हुआ। बड़े शहरों में नेताओं के बीच रस्साकशी की चर्चा है। कांग्रेस से आए नेताओं के समर्थकों को पद देने का दबाव है।
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भाजपा में नई नियुक्ति के बाद प्रशिक्षण वर्ग आयोजित करना तय प्रक्रिया है। इसमें पार्टी की विचारधारा, संगठन की संरचना और चुनावी रणनीति समझाई जाती है। 2023 विधानसभा चुनाव से पहले ऐसा प्रशिक्षण हुआ था। सवाल यह है कि नई टीम के साथ वही मॉडल क्यों लागू नहीं हुआ?
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एक सप्ताह पहले संगठन बैठक में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और अजय जामवाल ने लंबित नियुक्तियां जल्द करने की बात कही थी। अब तक प्रकोष्ठों के संयोजक, मंडल-निगम पद और अन्य जिम्मेदारियां घोषित नहीं हो पाई हैं। संगठन का कहना है कि प्रशिक्षण शुरू होने से पहले नियुक्तियां पूरी करना जरूरी है।
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सूत्रों के मुताबिक, बड़े महानगरों में वरिष्ठ नेताओं के बीच अपने-अपने समर्थकों को पद दिलाने की होड़ है। सांसद, विधायक और मंत्री सभी अपने खेमे को मजबूत करने में जुटे हैं। भोपाल और ग्वालियर में जिलाध्यक्षों की घोषणा के दौरान असहज स्थिति बनी। इससे यह संकेत मिला कि अंदरूनी मतभेद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
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चुनाव के दौरान कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं और समर्थकों से वादे किए गए थे। अब संगठन पर ये वादे दबाव बना रहे हैं। कई कार्यकर्ता वादानुसार पद की उम्मीद कर रहे हैं। विरोध और असंतोष से बचने के लिए संगठन सावधानी बरत रहा है। इस कारण नियुक्तियां और टल रही हैं।
प्रशिक्षण अभियान में जिलाध्यक्ष की भूमिका और जिम्मेदारी स्पष्ट की जाती है। मंडल अध्यक्ष और प्रकोष्ठ संयोजक की जिम्मेदारियां भी निर्धारित की जाती हैं। प्रवक्ताओं का आचरण और संदेश-प्रबंधन कैसे होगा, यह बताया जाता है। पंचायत, नगरीय निकाय और संगठनात्मक चुनावों की रणनीति भी तय होती है। बिना इस मार्गदर्शन के कामकाज में असंगति और भ्रम बढ़ सकते हैं।
प्रदेश स्तर पर एक बड़ी कार्यशाला प्रस्तावित है। इसके बाद जिलों में ट्रेनर्स की टीम प्रशिक्षण देगी। लेकिन सवाल यही है एक साल से ज्यादा देरी के बाद यह प्रक्रिया कब तक पूरी होगी? जानकार मानते हैं कि जितनी देर होगी, संगठन की छवि पर उतना असर पड़ेगा।
भाजपा संगठन चुनाव: भाजपा संगठन के सामने दोहरी चुनौती है। पहली, लंबित नियुक्तियां पूरी करना, दूसरी, प्रशिक्षण अभियान शुरू करना। देरी के कारण चाहे जो हों, कार्यकर्ता स्पष्ट दिशा चाहते हैं। अब सबकी नजरें इस पर हैं कि संगठन जल्द कदम उठाएगा या अंदरूनी रस्साकशी जारी रहेगी।
जिलाध्यक्ष बने एक साल से अधिक का समय हो चुका है। फिर भी प्रशिक्षण नहीं हुआ। प्रकोष्ठ, मंडल, निगम संयोजकों की नियुक्तियां लंबित हैं। प्रदेश कार्यशाला और ट्रेनर टीम का खाका तैयार है, लेकिन अमल नहीं हुआ। बड़े शहरों में नेताओं के बीच रस्साकशी की चर्चा है। कांग्रेस से आए नेताओं के समर्थकों को पद देने का दबाव है।
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भाजपा की परंपरा क्या कहती है?
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घोषणाएं अटकीं, कारण क्या है?
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जिलों में बढ़ती अंदरूनी खींचतान
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दलबदल का दबाव भी एक वजह?
प्रशिक्षण क्यों अहम है?
आगे क्या?
मजबूरी में होगा प्रशिक्षण या सुलझेगी रस्साकशी?
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