कागजों में दबकर रह गई एमपी की संविदा नीति 2023, कर्मचारियों को हर महीने लग रहा 10 हजार का घाटा!

Amresh Kushwaha | Mar 29, 2026, 12:08 IST
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mp contract policy 2023 delayed implementation loss employees
mp contract policy 2023 delayed implementation loss employees

मध्यप्रदेश में संविदा नीति 2023 के लागू होने के बावजूद एक लाख से अधिक संविदा कर्मचारी आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं। समकक्ष वेतन और नियमित सुविधाओं का अभाव कर्मचारियों के लिए मानसिक और वित्तीय संकट बन गया है।

मध्यप्रदेश के सरकारी तंत्र में संविदा कर्मचारियों के भविष्य को संवारने के लिए बनाई गई संविदा नीति 2023 फिलहाल फाइलों के बोझ तले दबी नजर आ रही है। जुलाई 2023 में जब सरकार ने बड़े उत्साह के साथ इस नीति का ऐलान किया था, तब लगा था कि प्रदेश के हजारों परिवारों के दिन फिरेंगे।

वहीं, कड़वी सच्चाई यह है कि तीन साल बीतने के बाद भी प्रदेश के 10 बड़े विभागों में इसे पूरी तरह धरातल पर नहीं उतारा जा सका है। इसका सीधा खामियाजा एक लाख से ज्यादा उन कर्मचारियों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्हें हर महीने करीब 10 हजार रुपए का आर्थिक नुकसान (Financial Loss) हो रहा है।

उम्मीदों का जुलाई 2023 और धरातल का अंधेरा

सरकार ने 22 जुलाई 2023 को सामान्य प्रशासन विभाग (General Administration Department) के माध्यम से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे। मंशा साफ थी- संविदा कर्मचारियों को नियमित पदों के समकक्ष (Equivalent) वेतन और सुविधाएं दी जाएं।

हाल ही में लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए एक आदेश जारी किया है। इसमें कंप्यूटर ऑपरेटर, वाहन चालक और वार्ड बॉय जैसे पदों की समकक्षता तय कर उन्हें मैट्रिक्स लेवल-1 और लेवल-4 में वर्गीकृत (Classified) किया गया है। लेकिन, यह प्रयास केवल एक विभाग तक सीमित नजर आता है, बाकी जगह सन्नाटा है।

10 विभागों की सुस्ती ने बिगाड़ा बजट

मध्य प्रदेश संविदा कर्मचारी अधिकारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष रमेश राठौर के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति चिंताजनक है। प्रदेश के 10 बड़े विभागों ने अब तक इस नीति को ठंडे बस्ते में डाल रखा है।

पी.एच.ई (PHE) में 12 हजार और स्कूल शिक्षा विभाग में 18 हजार कर्मचारियों का वेतनमान अब तक नहीं सुधरा है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास से लेकर ऊर्जा विभाग तक, हर जगह प्रक्रिया या तो अटकी है या फिर केवल कागजी समितियों (Committees) के फेर में फंसी है।

आरक्षण के नियमों पर भी ताला

सिर्फ वेतन ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के मापदंडों पर भी ये विभाग खरे नहीं उतर रहे हैं। मध्यप्रदेश कर्मचारी कांग्रेस अध्यक्ष सुरेंद्र निगम के अनुसार, संविदा नीति में नियुक्तियों के दौरान आरक्षण (Reservation) का स्पष्ट प्रावधान है। इसके बावजूद कई विभाग इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। इससे पात्र उम्मीदवार अपने संवैधानिक हक से वंचित रह रहे हैं।



जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते सख्ती नहीं दिखाई गई, तो यह मामला भविष्य में बड़े कानूनी विवादों (Legal Disputes) को जन्म दे सकता है।

आखिर कहां फंसा है पेंच?

हालिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि विभाग सशक्त समितियों की बैठकें समय पर नहीं बुला रहे हैं। पदों की तुलना (Equivalence) करने में जानबूझकर देरी की जा रही है ताकि विभाग पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय भार से बचा जा सके। मॉनिटरिंग और जवाबदेही की कमी ने इस पूरी कल्याणकारी नीति को 'अदृश्य' बना दिया है।

मानसिक और आर्थिक मोर्चे पर दोहरी मार

इस देरी का असर केवल बैंक बैलेंस पर ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। समान काम के बावजूद नियमित कर्मचारियों से कम वेतन पाना और महंगाई भत्ते (DA) व मकान किराए (HRA) जैसे लाभों से वंचित रहना कर्मचारियों में भारी असंतोष पैदा कर रहा है। भविष्य की सुरक्षा यानी पीएफ (PF) और पेंशन जैसी सुविधाएं न मिलने से प्रदेश का एक बड़ा वर्कफोर्स असुरक्षित महसूस कर रहा है।

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