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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- एमपी हाईकोर्ट ने नगर परिषद चुनाव से जुड़े अहम कानूनी सवाल पर फैसला सुनाया।
- बहुकोणीय चुनाव में विजेता अयोग्य होने पर रनर-अप को घोषित नहीं किया जा सकता विजेता।
- सतना जिले के नागौद नगर परिषद वार्ड नंबर 13 का मामला।
- इलेक्शन ट्रिब्यूनल का आदेश आंशिक रूप से रद्द।
- चार महीने में दोबारा चुनाव कराने के निर्देश।
INTRO
JABALPUR. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने चुनावी कानूनों की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि यदि किसी चुनाव में जीतने वाले प्रत्याशी का चुनाव रद्द होता है और मुकाबला बहुकोणीय रहा हो, तो दूसरे स्थान वाला प्रत्याशी स्वतः विजेता नहीं बन सकता। ऐसी स्थिति में मतदाताओं की वास्तविक इच्छा जानने का एकमात्र संवैधानिक रास्ता दोबारा चुनाव ही है।
NEWS IN DETAIL
यह मामला सतना जिले की नगर परिषद नागौद के वार्ड नंबर 13 के पार्षद चुनाव से जुड़ा है। इस वार्ड में हुए चुनाव में कुल सात प्रत्याशी मैदान में थे। चुनाव परिणामों में मोहम्मद सोहराब को 337 वोट मिले और वे विजयी घोषित हुए, जबकि मोहम्मद नफीस को 293 वोट प्राप्त हुए और वे दूसरे स्थान पर रहे।
चुनाव के बाद मोहम्मद नफीस ने निर्वाचन न्यायाधिकरण के समक्ष याचिका दायर कर आरोप लगाया कि मोहम्मद सोहराब ने नामांकन पत्र और शपथपत्र में आपराधिक मामलों तथा आय से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है, जो कानूनन ‘भ्रष्ट आचरण’ की श्रेणी में आता है।
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इलेक्शन ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटिशन
इलेक्शन ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई के बाद यह पाया कि मोहम्मद सोहराब द्वारा दी गई जानकारी अपूर्ण और भ्रामक थी। इसे गंभीर निर्वाचन अनियमितता मानते हुए इलेक्शन tribunal ने न केवल सोहराब का निर्वाचन रद्द कर दिया, बल्कि दूसरे स्थान पर रहे मोहम्मद नफीस को सीधे पार्षद घोषित कर दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मोहम्मद सोहराब ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में रिवीजन पिटिशन दायर की।
रनर अप को विजेता घोषित करना गलत: याचिकाकर्ता
जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से स्पष्ट किया गया कि उन्हें चुनाव रद्द किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। रनर-अप प्रत्याशी को विजेता घोषित करना कानून के विपरीत है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब चुनाव में सात प्रत्याशी मैदान में हों, तो यह मान लेना कि विजयी प्रत्याशी को मिले 337 वोट स्वतः दूसरे प्रत्याशी को मिल जाते, केवल अनुमान और अटकलबाजी है, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है।
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नहीं चली प्रतिवादी पक्ष की दलील
वहीं, प्रतिवादी पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि मध्य प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 24 के तहत निर्वाचन न्यायाधिकरण को यह अधिकार प्राप्त है कि वह वोटों के अंतर को देखते हुए दूसरे प्रत्याशी को विजेता घोषित कर सकता है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को बहुकोणीय चुनाव की परिस्थितियों में स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों ‘प्रकाश खांडरे बनाम विजय कुमार खांडरे’ और‘मुनिराजु गौड़ा बनाम मुनिरत्ना’ का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि यदि चुनाव में केवल दो प्रत्याशी हों और एक अयोग्य ठहराया जाए, तब दूसरा प्रत्याशी विजेता माना जा सकता है। लेकिन जब दो से अधिक उम्मीदवार हों, तब मतदाताओं की मंशा का अनुमान लगाना न्यायसंगत नहीं है। यह कहना कि सभी वोट स्वतः रनर-अप को मिलते, पूरी तरह काल्पनिक और कानूनी रूप से गलत है।
दोबारा चुनाव ही एकमात्र विकल्प
कोर्ट ने माना कि वार्ड नंबर 13 में सात प्रत्याशी होने के कारण यह तय करना असंभव है कि यदि सोहराब चुनाव मैदान में नहीं होते, तो मतदाता किसे वोट देते।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निर्वाचन न्यायाधिकरण द्वारा रनर-अप को विजेता घोषित किए जाने के आदेश को कानूनी त्रुटि करार दिया।
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हाईकोर्ट ने रिक्त घोषित की सीट
जस्टिस विवेक जैन ने निचली अदालत के आदेश में संशोधन करते हुए वार्ड नंबर 13 की सीट को रिक्त घोषित कर दिया है। साथ ही, संबंधित निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि कानून के अनुसार चार महीने के भीतर नए सिरे से चुनाव कराए जाएं, ताकि मतदाता अपनी मर्जी से कैंडिडेट का चुनाव कर सकें।
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