जेल की दीवारों के पीछे फर्जीवाड़े का खेल! HC ने डिप्टी सुपरिटेंडेंट के खिलाफ दिए जांच के निर्देश

Neel Tiwari | Apr 09, 2026, 11:10 IST
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mp high court investigation rewa jail deputy superintendent fraud case
mp high court investigation rewa jail deputy superintendent fraud case

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन और वकीलों की साठगांठ पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने डीजी जेल को डिप्टी सुपरिटेंडेंट की भूमिका की जांच और प्रदेश भर की जेलों की रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।

News in Short

  • रीवा सेंट्रल जेल से वकालतनामे के सत्यापन में बड़ा फर्जीवाड़ा समने आया है।
  • जेल प्रशासन ने उन आरोपियों के वकालतनामे प्रमाणित कर दिए जो पहले से ही जमानत पर बाहर थे।
  • कोर्ट ने बिना तारीख हस्ताक्षर करने वाले डिप्टी सुपरिटेंडेंट की भूमिका को संदिग्ध माना है।
  • डीजी जेल को प्रदेश की सभी जेलों की कार्यप्रणाली की जांच कर तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया है।
  • हाईकोर्ट ने भविष्य में सुधार न होने पर आरोपियों की व्यक्तिगत पेशी अनिवार्य करने की चेतावनी दी है।

News in Detail

वकालतनामे पर उठे सवाल

यह पूरा मामला अरविंद कुमार बनाम मध्यप्रदेश राज्य (CRA No. 11293 of 2023) की अपील से जुड़ा है। मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई है। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता राम प्रकाश यादव ने तीन आरोपियों (अपीलार्थी संख्या एक, तीन और छह) की ओर से वकील बदलने का आवेदन पेश किया। हालांकि, जब मूल अधिवक्ता सिद्धार्थ दत्त ने दस्तावेजों की जांच की, तो एक बड़े फर्जीवाड़े की परतें खुलने लगीं।



बाहर घूम रहे आरोपियों के वकालतनामे जेल से हुए अटेस्ट

कोर्ट में यह बात सामने आई कि आरोपी संख्या दो (साहबलाल), चार (रामप्रसाद) और पांच (ललता प्रसाद) पहले से ही जमानत पर बाहर थे। इसके बावजूद, रीवा सेंट्रल जेल के अधिकारियों ने एक ऐसा वकालतनामा प्रमाणित कर दिया जिस पर इन सभी के हस्ताक्षर थे। अधिवक्ता सिद्धार्थ दत्त ने सवाल उठाया कि जो लोग जेल में हैं ही नहीं, उनके वकालतनामे जेल अथॉरिटी कैसे जारी कर सकती है?

जेल माफिया और वकीलों की साठगांठ पर सवाल

माननीय उच्च न्यायालय ने इस स्थिति को अत्यंत गंभीर मानते हुए टिप्पणी की कि यह जेल प्रशासन और कुछ वकीलों के बीच चल रहे एक गिरोह का हिस्सा लग रहा है। कोर्ट ने कहा कि बिचौलियों को जेल अधिकारियों के साथ मिलकर न्याय की प्रक्रिया को बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी आश्चर्य जताया कि कैसे एक वकील बिना परिजनों के निर्देश के सीधे जेल अधिकारियों के पास जाकर वकालतनामा हासिल कर सकता है।

डिप्टी सुपरिटेंडेंट की भूमिका संदेह के घेरे में

जांच का मुख्य केंद्र रीवा जेल के डिप्टी सुपरिटेंडेंट हैं, जिन्होंने वकालतनामे पर हस्ताक्षर तो किए लेकिन तारीख नहीं डाली। कोर्ट ने इसे एक सोची-समझी अनियमितता माना है। डीजी जेल को अब यह पता लगाना होगा कि क्या यह प्रथा अन्य जेलों में भी प्रचलित है। इसके लिए उन्हें अगले तीन महीनों के भीतर प्रदेश की सभी जेलों की कार्यप्रणाली पर एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपनी होगी।

कोर्ट की चेतावनी, अब व्यक्तिगत पेशी ही विकल्प

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि जेल प्रशासन ने सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में आरोपियों को हर छोटे आवेदन के सत्यापन के लिए व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया जा सकता है। फिलहाल, कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है और राज्य सरकार के अधिवक्ता को आदेश की कॉपी तुरंत डीजी जेल को भेजने का निर्देश दिया है।

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