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शराब ठेकों की कीमतों में 20% की बढ़ोतरी के साथ मध्यप्रदेश सरकार जल्द ही नई आबकारी नीति (लिकर पॉलिसी) लागू कर सकती है। इसका उद्देश्य शराब के कारोबार में अधिक प्रतिस्पर्धा लाकर राजस्व में बढ़ोतरी करना है। साथ ही और ओवरचार्जिंग की शिकायतों को कम करना भी है। हालांकि इस बदलाव का सीधा असर उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा।
तैयारी पूरी हो चुकी
राज्य सरकार की इस नई नीति (एमपी की शराब नीति) को लेकर सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। नई व्यवस्था के तहत शराब की दुकानों को छोटे-छोटे ग्रुप्स में बांटकर ठेके दिए जाएंगे। एक ग्रुप में 2 से 5 दुकानें होंगी। टेंडर की प्रक्रिया भी इन्हीं ग्रुप्स के आधार पर होगी।
सरकार का कहना है कि इससे शराब के कारोबार में ज्यादा प्रतिस्पर्धा होगी। इससे बड़े ठेकेदारों की मोनोपॉली टूटेगी। साथ ही राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। इधर शराब दुकानों के नवीनीकरण की संभावना कम है। अब ई-टेंडर प्रक्रिया के जरिए ही आवंटन होगा। मौजूदा कीमत में 20% की बढ़ोतरी कर नई कीमत तय की जाएगी। विभाग का मानना है कि छोटे समूह बनेंगे तो अधिक व्यापारी सामने आएंगे और सरकार को इसका फायदा होगा।
अतिरिक्त राजस्व हासिल करने की योजना
आबकारी विभाग को इस साल 31 मार्च तक करीब 18 हजार करोड़ रुपए का राजस्व जमा करना है। अगले साल इसमें 15 से 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में सरकार छोटे समूहों के जरिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगी। साथ ही ऊंची बोली लगवाकर अतिरिक्त राजस्व हासिल करने की योजना बना रही है।
पहले क्या होता था
अब तक ज्यादातर जिलों में शराब के ठेके एक ही टेंडर के जरिए दिए जाते थे। प्रदेश में करीब 3500 शराब दुकानें हैं। ये दुकानें 600 से ज्यादा समूहों के जरिए चलाई जाती थीं। बड़े समूहों के कारण सिर्फ कुछ ही कंपनियां टेंडर में हिस्सा ले पाती थीं। वहीं भोपाल की बात करें तो यहां 87 शराब दुकानें हैं। इन पर 4 कंपनियों का नियंत्रण है।
नई नीति से इन बदलाव की संभावना
अब से 2 से 5 दुकानों के छोटे समूह बनाए जाएंगे। पूरे प्रदेश में लगभग 1000 ऐसे समूह बनाए जा सकते हैं। भोपाल में करीब 25 से 30 ऐसे समूह बन सकते हैं। इसके अलावा होटल और रेस्त्रां के बार लाइसेंस की शर्तों में भी बदलाव किया जाएगा। होटल-बार के लिए पहले 20 कमरों की शर्त को घटाकर 10 किया जा सकता है।
क्रम से जारी होंगे टेंडर
नई नीति में पहली बार अब शराब के ठेके रेंडमाइजेशन सिस्टम से होंगे। पहले जो सभी टेंडर एक साथ होते थे, अब वो क्रमवार तरीके से जारी होंगे। यह तय होगा कि कौन सा समूह पहले खुलेगा। यह कंप्यूटराइज्ड ड्रॉ से किया जाएगा। नई दुकानें या अहाते नहीं खोले जाएंगे। मौजूदा ठेकों में ही बदलाव किए जाएंगे।
देशी के मुकाबले विदेशी की डिमांड
भोपाल में शराब से राज्य सरकार को अब तक करीब 1,015 करोड़ रुपए का राजस्व मिल चुका है। शराब की बिक्री में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। पिछले साल जहां करीब 1,300 करोड़ रुपए की शराब बिकी थी। वहीं इस साल यह आंकड़ा बढ़कर 1,800 करोड़ रुपए को पार कर चुका है यानी करीब 500 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है।
रोचक बात यह है कि मध्यप्रदेश में देशी शराब की खपत 61% कम हो गई है। यह 71.31 लाख प्रूफ लीटर* से घटकर 27.63 लाख प्रूफ लीटर तक आ गई है। इसके मुकाबले विदेशी शराब की खपत 55% बढ़ी है। यह 45.07 लाख प्रूफ लीटर से बढ़कर 70.26 लाख प्रूफ लीटर हो गई है। बीयर की खपत में भी बढ़ोतरी हुई है।
ओवरचार्जिंग की शिकायत होगी कम
सरकार का कहना है कि सिंगल टेंडर सिस्टम में ओवरचार्जिंग की शिकायतें बढ़ गई थीं। अब छोटे-छोटे ग्रुप बनने से ज्यादा प्रतिस्पर्धा होगी। साथ ही ओवरचार्जिंग की शिकायतें कम हो जाएंगी।
thesootr Knowladge
*ये प्रूफ लीटर क्या होता है?
प्रूफ लीटर शराब उद्योग में इस्तेमाल होने वाली एक मानक इकाई है। ये शराब की मात्रा को उसके अल्कोहल की सांद्रता (गाढ़ेपन) के आधार पर मापती है। यह कुल वॉल्यूम को अल्कोहल प्रतिशत से गुणा करके निकाला जाता है।
उदाहरण के लिए 40% अल्कोहल वाली एक लीटर शराब में 0.4 प्रूफ लीटर होते हैं। दूसरे शब्दों प्रूफ लीटर (Proof Litre) का मतलब है शुद्ध अल्कोहल की मात्रा। सामान्यतः 57.1% अल्कोहल वाली स्पिरिट को एक प्रूफ लीटर मानकर गणना की जाती है।
प्रूफ लीटर की गणना का तरीका क्या है?
फॉर्मूला: प्रूफ लीटर = कुल लीटर × अल्कोहल प्रतिशत (दशमलव में)
उदाहरण: 750 मिली (0.75 लीटर) की बोतल में 42.8% अल्कोहल हो तो प्रूफ लीटर = 0.75 × 0.428 = 0.321।
प्रूफ लीटर का उपयोग कहां होता है?
भारत सरकार और राज्य एक्साइज विभाग शराब के स्टॉक, बिक्री और ड्यूटी के लिए प्रूफ लीटर का उपयोग करते हैं। यह सादे लीटर से अलग होता है क्योंकि अल्कोहल की शुद्ध मात्रा पर टैक्स लगता है।
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