कुपोषण पर करोड़ों के दावे, जमीन पर 8 और 12 रुपए की हकीकत
Ramanand Tiwari | Dec 28, 2025, 08:20 IST
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एमपी के कुसमी NRC में औचक निरीक्षण के दौरान कुपोषण के आंकड़ों में फर्जीवाड़ा देखने को मिला है। कागजों में बच्चों को स्वस्थ दिखाया जा रहा है, जबकि हकीकत में लाखों बच्चे अब भी कुपोषण की जंग लड़ रहे हैं। पूरा मामला जानने के लिए खबर आखिरी तक पढ़ें।
पूरी खबर को 5 शॉर्ट पॉइंट में समझें-
- अस्पताल के कागजों में बच्चों को स्वस्थ दिखाया जा रहा है। वहीं, किन हकीकत में वे अभी भी कुपोषित और बीमार हैं।
- समी केंद्र में 12 दिनों तक भर्ती रहने के बाद भी बच्चों के वजन और सेहत में कोई सुधार नहीं पाया गया।
- कुसमी केंद्र में 12 दिनों तक भर्ती रहने के बाद भी बच्चों के वजन और सेहत में कोई सुधार नहीं पाया गया।
- जांच के दौरान सफाई बेहद खराब मिली और भविष्य की तारीखों का रिकॉर्ड पहले से ही भरा हुआ पाया गया।
- मध्य प्रदेश के 45 जिले कुपोषण के खतरे (रेड जोन) में हैं और 10 लाख से ज्यादा बच्चे इसकी चपेट में हैं।
कुपोषण के खिलाफ इस कथित जंग का नतीजा यह है कि मध्य प्रदेश के 45 जिले आज कुपोषण के रेड जोन में हैं। प्रदेश में 10 लाख से अधिक बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। इसमें 1.36 लाख बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आते हैं।
कागजों में स्वस्थ, हकीकत में कुपोषित बच्चे
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12 दिन भर्ती, फिर भी वजन नहीं बढ़ा
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फर्जी फॉलोअप और रिकॉर्ड में हेराफेरी
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जिम्मेदारों पर कार्रवाई के निर्देश
सरकारी आंकड़े खुद कह रहे हैं त्रासदी की कहानी
महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया का कहना है कि कुपोषण एक वैश्विक समस्या है। इसे खत्म करने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है। साथ ही जागरूकता पर भी जोर दिया जा रहा है।
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पोषण ट्रैकर ऐप क्या बताता है?
अप्रैल 2023 में 30% बच्चे कम वजन के थे। जुलाई 2024 तक यह दर घटकर 27% रह गई। पोषण ट्रैकर के अनुसार एमपी में कुपोषण दर 7.79% है।
भोपाल में 27%, ग्वालियर-चंबल में 35%, इंदौर में 45% और उज्जैन में 46% बच्चे कुपोषित हैं। शिवपुरी जिले की स्थिति पूरे प्रदेश में सबसे खराब बताई जा रही है।
20 साल से जारी कुपोषण के खिलाफ जंग
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक 2005-06 में 60% बच्चे कम वजन के थे। 2019-21 में यह घटकर 33% रह गए। दुबलेपन और गंभीर कुपोषण में गिरावट, फिर भी चिंता बरकरार है। दुबलेपन की दर: 35% से घटकर 18.9% हो गई है।
गंभीर दुबलेपन की दर
चिंता: कम वजन और दुबलेपन में मध्य प्रदेश अब भी देश में दूसरे नंबर पर है।
सवाल: आंकड़ों में सुधार के बावजूद कुसमी एनआरसी जैसी घटनाएं सवाल खड़ी करती हैं।
निष्कर्ष: क्या सरकारी योजनाएं जमीन के बजाय सिर्फ फाइलों तक ही सीमित हैं?
जवाबदेही और जमीनी निगरानी बढ़ना बेहद जरूरी है। इसके बिना कुपोषण की जंग सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी।
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