MP में नल-जल मिशन के दावों की खुली पोल: 8 जिलों के 50% परिवार पानी को तरसे

Amresh Kushwaha | Aug 08, 2026, 08:55 IST
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MP में नल-जल मिशन
MP में नल-जल मिशन

मध्य प्रदेश में जल जीवन मिशन के तहत 77.21 प्रतिशत परिवारों तक नल जल पहुंचने का दावा किया जा रहा है। वहीं, 8 जिलों में आधे से ज्यादा परिवार अब भी नल जल से वंचित हैं। पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर की स्थिति भी खराब है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मध्य प्रदेश मेंनल जल मिशन के दावे और जमीनीहकीकत अलग हैं।
  • सरकार 77.21 प्रतिशतपरिवारों तक नल जल पहुंचने का दावा करतीहै।
  • 8 जिलों में आधे से ज्यादा परिवार अबभी पानी को तरस रहे हैं।
  • शिवराज सिंह चौहान के गृह जिलेसीहोर में भी हालत खराब है।
  • 23 जिलों मेंनल जल कवरेज अब भी 70 प्रतिशत से कमहै।

दावे और हकीकत में बड़ा फर्क

मध्य प्रदेश में जल जीवन मिशन को लेकर सरकार बड़े दावे कर रही है। सरकार का कहना है कि प्रदेश के 77.21 प्रतिशत परिवारों तक अब नल का पानी पहुंच चुका है। वहीं, जिला स्तर के आधिकारिक आंकड़े इस दावे से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाते हैं।

कई जिलों में हालात इस दावे के उलट नजर आते हैं। खासकर प्रदेश के आठ जिलों में स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां आधे से ज्यादा परिवार अब भी नल जल सुविधा से वंचित हैं।

23 जिलों में लक्ष्य से पीछे कवरेज

प्रदेश में कुल 55 जिले हैं। इनमें से 23 जिलों में नल जल कवरेज 70 प्रतिशत से भी कम है। यानी लगभग हर दूसरे जिले में मिशन का लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो सका है। इन 23 जिलों में भी आठ जिलों की स्थिति सबसे खराब मानी जा रही है। इन आठ जिलों में तो आधे परिवारों तक भी नल जल नहीं पहुंच पाया है। यह आंकड़े सरकार के दावों पर सीधा सवाल खड़ा करते हैं।

सबसे ज्यादा प्रभावित आठ जिले

जल जीवन मिशन के जिला स्तरीय आंकड़ों से हकीकत साफ हो जाती है। मऊगंज में सिर्फ 49.86 प्रतिशत परिवारों तक ही नल जल पहुंचा है। अशोकनगर में यह आंकड़ा 46.53 प्रतिशत और पन्ना में 45.26 प्रतिशत है।

सतना जिले में केवल 43.34 प्रतिशत परिवारों के घर नल कनेक्शन लगे हैं। अलीराजपुर में 42.78 प्रतिशत और छतरपुर में 42.77 प्रतिशत परिवार ही कवर हो सके हैं। सिंगरौली में यह आंकड़ा 40.62 प्रतिशत है। सबसे कम कवरेज मैहर जिले में है, जहां केवल 40.20 प्रतिशत परिवारों तक ही पानी पहुंचा है।

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जिलेवार पूरी तस्वीर

मऊगंज में कुल एक लाख 60 हजार 343 परिवारों में से केवल 79 हजार 945 परिवारों को ही नल कनेक्शन मिला है। यानी यहां अब भी 80 हजार 398 परिवार पानी के इंतजार में हैं। अशोकनगर में एक लाख 35 हजार 320 परिवारों में से 62 हजार 961 को ही कनेक्शन मिला, बाकी 72 हजार 359 परिवार अभी वंचित हैं।

सतना जिले में सबसे ज्यादा दो लाख 37 हजार 866 परिवार हैं, जिनमें से एक लाख 34 हजार 769 परिवार अब भी नल जल से महरूम हैं। छतरपुर में भी दो लाख 47 हजार 475 में से एक लाख 41 हजार 622 परिवारों तक पानी नहीं पहुंचा है। यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी बड़ी है।

शिवराज के गृह जिले भी पीछे

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्रीय कृषि मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सीहोर की स्थिति भी अच्छी नहीं है। सीहोर में केवल 56.95 प्रतिशत परिवारों तक ही नल जल पहुंच पाया है। यानी जिले के करीब 43 प्रतिशत परिवार अब भी पानी को तरस रहे हैं।

वहीं विदिशा जिले में भी हालत कुछ खास नहीं है। यहां 66.67 प्रतिशत परिवारों तक ही पानी पहुंचा है, यानी करीब 33 प्रतिशत परिवार अब भी वंचित हैं। यह आंकड़े दिखाते हैं कि बड़े नेताओं के गृह जिले भी इस मामले में पीछे हैं।

अन्य जिलों की स्थिति भी कमजोर

सीहोर और विदिशा के अलावा कई और जिले भी 70 प्रतिशत के लक्ष्य से पीछे हैं। जबलपुर में 69.67 प्रतिशत और बड़वानी में 69.62 प्रतिशत परिवारों तक ही पानी पहुंचा है। डिंडोरी में 69.48 प्रतिशत और टीकमगढ़ में 69.13 प्रतिशत कवरेज है। रतलाम में 67.47 प्रतिशत, आगर-मालवा में 65.38 प्रतिशत परिवार ही कवर हो सके हैं।

मंदसौर में 62.79 प्रतिशत, शाजापुर में 59.40 प्रतिशत और गुना में 58.56 प्रतिशत कवरेज दर्ज हुआ है। नीमच में 57.93 प्रतिशत, रीवा में 53.65 प्रतिशत परिवार ही जुड़ पाए हैं। सबसे कम शिवपुरी में 52.50 प्रतिशत और सिधी में 52.36 प्रतिशत कवरेज है।

क्यों पिछड़ रहा है कवरेज

इतनी बड़ी संख्या में जिलों के पीछे रहने की वजह भी सामने आई है। लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) के मुताबिक इसकी बड़ी वजह बहु-ग्राम जल योजनाएं यानी एमवीएस (मल्टी विलेज स्कीम) हैं। कम कवरेज वाले ज्यादातर जिले इन्हीं थोक जल आपूर्ति परियोजनाओं पर निर्भर हैं।

विभाग का कहना है कि इनमें से कई परियोजनाएं अभी निर्माण या कार्यान्वयन के अलग-अलग चरणों में हैं। कुछ परियोजनाएं अभी पूरी होने से पहले वाले चरण में हैं। विभाग को उम्मीद है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद कवरेज में सुधार आएगा। हालांकि इसके लिए अभी कितना समय लगेगा, यह साफ नहीं बताया गया है।

पानी की गुणवत्ता जांचने का सीमित इंतजाम

सिर्फ कनेक्शन ही नहीं, पानी की गुणवत्ता जांचने का इंतजाम भी सीमित है। प्रदेश में कुल 155 प्रयोगशालाएं जल गुणवत्ता जांचने का काम कर रही हैं। इनमें से 103 उप-मंडल स्तर पर हैं, जबकि 51 प्रयोगशालाएं जिला स्तर पर काम कर रही हैं। सिर्फ एक प्रयोगशाला राज्य स्तर पर मौजूद है।

सभी प्रयोगशालाओं में सूक्ष्मजीवी यानी माइक्रोबायोलॉजिकल जांच की सुविधा है। वहीं, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी (Biochemical Oxygen Demand) की जांच सिर्फ राज्य स्तरीय प्रयोगशाला में ही हो पाती है। इससे भी बड़ी बात यह है कि रासायनिक विषाक्तता जांचने की सुविधा अभी प्रदेश में कहीं भी उपलब्ध नहीं है।

आम लोगों पर क्या असर पड़ रहा

इन आंकड़ों का सीधा असर गांव-गांव में रहने वाले परिवारों पर पड़ रहा है। जिन जिलों में कवरेज कम है, वहां महिलाओं को अब भी दूर से पानी लाना पड़ रहा है। कई इलाकों में लोग टैंकरों और पुराने हैंडपंप पर निर्भर हैं। गर्मी के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। पानी की गुणवत्ता जांचने की सीमित सुविधा भी लोगों की सेहत के लिए खतरा बन सकती है। ग्रामीण इलाकों में यह मुद्दा रोजमर्रा की सबसे बड़ी परेशानी बना हुआ है।

आगे क्या हो सकता है

सरकार का दावा है कि जल्द ही सभी जिलों में कवरेज बढ़ाया जाएगा। इसके लिए एमवीएस परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन जिस रफ्तार से काम चल रहा है, उसे देखते हुए सवाल उठ रहे हैं।

खासकर सबसे पिछड़े आठ जिलों में सुधार की रफ्तार और तेज करनी होगी। पानी की गुणवत्ता जांचने की सुविधा भी सभी स्तर पर बढ़ाने की जरूरत है। आने वाले महीनों में इन आंकड़ों पर सरकार की तरफ से और स्पष्टीकरण आ सकता है।

यह खबर क्यों जरूरी है

यह खबर इसलिए जरूरी है क्योंकि पानी हर नागरिक की बुनियादी जरूरत और अधिकार है। सरकारी योजनाओं के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर जानना जनता का हक है। यह खबर बताती है कि किन जिलों में लोगों को अब भी संघर्ष करना पड़ रहा है। इससे नीति निर्माताओं को सुधार के लिए सही दिशा मिल सकती है।

पानी की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी सीधे लोगों की सेहत से जुड़ी है। खबर पूरी तरह सरकारी आंकड़ों पर आधारित है और किसी की छवि को अनुचित नुकसान पहुंचाए बिना तैयार की गई है। यह सूचना के अधिकार और सुशासन के मूल्यों का सम्मान करती है।

FAQ

  1. मध्य प्रदेश में नल जल मिशन का असली कवरेज कितना है?
    सरकार 77.21 प्रतिशत परिवारों तक नल जल पहुंचने का दावा करती है। लेकिन जिला स्तर के आंकड़ों के मुताबिक 23 जिलों में कवरेज 70 प्रतिशत से कम है, जिनमें से 8 जिलों में यह आधे से भी कम है।
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