स्कूल-कॉलेज में डिजिटल सर्टिफिकेट की पाबंदी, विभागों की भर्तियों में ऑफलाइन की छूट
Sanjay Sharma | May 21, 2026, 23:51 IST
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मध्यप्रदेश में स्कूल-कॉलेजों में ऑनलाइन जाति प्रमाण पत्र अनिवार्य है, लेकिन सरकारी भर्तियों में ऑफलाइन सर्टिफिकेट की छूट बनी हुई है। इसी खामी से फर्जीवाड़ा पनप रहा है। 232 केस जांच में हैं, एसटीएफ ने 25 अफसर-कर्मचारियों पर कार्रवाई की है।
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्यप्रदेश में सरकारी भर्तियों में ऑफलाइन जाति प्रमाण पत्र की छूट फर्जीवाड़े की जड़ बन गई है।
- स्कूल-कॉलेजों में ऑनलाइन सर्टिफिकेट जरूरी है, लेकिन भर्ती एजेंसियां ऑफलाइन सर्टिफिकेट मान रही हैं।
- सरकार ने विधानसभा में 232 फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामलों की जांच स्वीकार की है।
- एसटीएफ (Special Task Force) ने अब तक 25 अफसर-कर्मचारियों पर कार्रवाई की है।
- इनमें डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और पुलिसकर्मी तक शामिल हैं।
भर्तियों में क्यों चल रहा है ऑफलाइन का खेल?
बावजूद इसके मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मण्डल और मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग भर्ती प्रक्रिया में डिजिटल सर्टिफिकेट को अनिवार्य नहीं कर पाए हैं। यही वह खामी है जिसका फर्जीवाड़ा करने वाले गिरोह पूरा फायदा उठा रहे हैं।
ऑफलाइन सर्टिफिकेट से कैसे होता है खेल?
एसटीएफ की जांच में यह तथ्य सामने आया कि भर्ती निकलते ही ऐसे गिरोह सक्रिय हो जाते हैं।
दो मामले जो बताते हैं सिस्टम की खामी
दूसरा मामला बिजली कंपनी के ही विनोद सिंह राजपूत का है। उन्हें 17 मई 2012 को नियुक्ति मिली थी। उन्होंने एसडीएम कार्यालय ग्वालियर से कथित रूप से जारी अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी (Other Backward Class) का जाति प्रमाण पत्र जमा किया था, जिसमें जाति किरार दर्शाई गई थी। विनोद सिंह इसी सर्टिफिकेट के सहारे 11 साल तक लेखा अधिकारी बनकर वेतन लेते रहे। जब ग्वालियर एसडीएम कार्यालय की दायरा पंजी से सत्यापन हुआ तो उस प्रमाण पत्र का रिकॉर्ड ही नहीं मिला।
ये दोनों मामले बताते हैं कि ऑफलाइन सर्टिफिकेट का फर्जीवाड़ा सालों तक पकड़ में नहीं आता।
डॉक्टर-इंजीनियर तक पहुंचा मामला
232 केस जांच में, हजारों लंबित
डिजिटल लॉकर बेअसर क्यों?
यह खबर क्यों जरूरी है
जरूरी FAQ
मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरी, कॉलेज एडमिशन और स्कॉलरशिप के लिए ऑनलाइन डिजिटल जाति प्रमाण पत्र अनिवार्य है। इसे एमपी ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल या लोकसेवा केंद्र से बनवाया जा सकता है। सामान्य प्रशासन विभाग ने डिजिटल दस्तावेजों के उपयोग के निर्देश भी जारी किए हुए हैं। फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने पर बीएनएस के तहत सात साल तक जेल और नौकरी रद्द करने का प्रावधान है। फिर भी भर्ती एजेंसियां ऑफलाइन सर्टिफिकेट की छूट दे रही हैं जो इस समूचे फर्जीवाड़े की जड़ है।
ऑफलाइन जाति प्रमाण पत्र से फर्जीवाड़ा कैसे होता है?
फर्जीवाड़ा करने वाले गिरोह एसडीएम और तहसील कार्यालय के नाम पर नकली जाति प्रमाण पत्र तैयार करते हैं। इसके लिए कुछ हजार से एक लाख रुपए तक वसूले जाते हैं। विभागों में सांठगांठ होने के कारण पदस्थापना के समय सत्यापन नहीं हो पाता। रजिस्टर में एंट्री न होने पर भी प्रमाणित लिखवा दिया जाता है। पकड़े जाने पर आरोपी कोर्ट का सहारा लेकर जांच को पांच से दस साल तक अटका देते हैं। इसीलिए सालों तक फर्जीवाड़ा उजागर नहीं होता।
अब तक कितने मामले पकड़े गए और क्या कार्रवाई हुई?
सरकार ने विधानसभा में 232 फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामलों की जांच स्वीकार की है। एसटीएफ ने अब तक 25 अफसर और कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज की है जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और पुलिसकर्मी शामिल हैं। ग्वालियर हाईकोर्ट ने 11 आरक्षकों के सर्टिफिकेट की 90 दिन में जांच के आदेश दिए हैं। जबलपुर में 1950 से अब तक के सभी सर्टिफिकेट की जांच शुरू हुई है। हाईकोर्ट में इससे जुड़े करीब 17 हजार मामले अब भी लंबित हैं।
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