एमपी में SC-ST वोटों की जंग: 2028 से पहले आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस

Ramanand Tiwari | Jan 24, 2026, 22:48 IST
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Battle of SC-ST votes in MP, BJP and Congress face to face before 2028
Photograph: (the sootr)

2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी में कांग्रेस और भाजपा SC-ST वोट बैंक को साधने में जुटी हैं। कांग्रेस आक्रामक है। भाजपा चुपचाप वोटों को साधने की रणनीति अपना रही है।

NEWS IN SHORT

  • 2028 चुनाव की तैयारी: कांग्रेस और भाजपा एससी–एसटी वोट बैंक पर काम कर रही हैं।
  • आंबेडकर प्रतिमा विवाद: कांग्रेस ने इसे दलित अस्मिता से जोड़ा, भाजपा ने चुप्पी साधी।
  • सवर्ण समाज की नाराजगी: भाजपा ने संतोष वर्मा पर कार्रवाई के लिए केंद्र को लिखा पत्र।
  • अजाक्स विवाद: दो संगठन खुद को असली अजाक्स बताकर एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।
  • चुप्पी की रणनीति: दोनों दल एससी–एसटी वोट बैंक को नाराज करने से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

NEWS IN DETAIL

BHOPAL. मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी तीन साल दूर हैं, लेकिन राजनीति का तापमान अभी से चढ़ चुका है। 2028 की तैयारी में कांग्रेस ही नहीं, भाजपा भी अनुसूचित जाति और जनजाति (SC-ST) वोट बैंक को साधने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस खुलकर मैदान में है, जबकि भाजपा कई मुद्दों पर साइलेंट मोड में रहकर संतुलन साधती दिख रही है।

डॉ. आंबेडकर विवाद बना चुनावी ट्रिगर पॉइंट

ग्वालियर हाईकोर्ट खंडपीठ परिसर में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा स्थापना को लेकर उपजा विवाद अचानक दलित राजनीति का केंद्र बन गया। कांग्रेस ने इस मुद्दे को प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि दलित सम्मान और अस्मिता से जोड़कर आक्रामक ढंग से उठाया। कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया सहित कई नेता खुलकर दलित संगठनों के समर्थन में सामने आए और सरकार को कटघरे में खड़ा किया।

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भाजपा का ‘साइलेंट सपोर्ट’: विरोध नहीं, खुला समर्थन भी नहीं

आंबेडकर प्रतिमा विवाद पर भाजपा ने कोई तीखा स्टैंड नहीं लिया। न खुला विरोध, न खुला समर्थन। राजनीतिक हलकों में इसे भाजपा की “मूक सहमति” के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा ने बयानबाजी से दूरी बनाकर एससी–एसटी मतदाताओं में नाराजगी से बचने की कोशिश की, जबकि सवर्ण समाज की नाराजगी को भी पूरी तरह अनदेखा नहीं किया।

सवर्ण समाज की मांगें और सरकार की बैलेंसिंग एक्ट

आंबेडकर प्रकरण और आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा के विवादित मामले को लेकर सवर्ण समाज ने कई बार राज्य सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की। मांग साफ थी-आईएएस संतोष वर्मा पर तत्काल कार्रवाई हो। सरकार ने सीधा एक्शन लेने के बजाय ‘बीच का रास्ता’ चुना और उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा करते हुए केंद्र सरकार को पत्र लिख दिया। इससे यह संदेश गया कि सरकार किसी एक वर्ग के खिलाफ खुला रुख नहीं अपनाना चाहती।

संतोष वर्मा मामला: जहां दोनों दल संभल-संभल कर चले

आईएएस संतोष वर्मा आदिवासी समाज से आते हैं और अजाक्स संगठन के अध्यक्ष हैं। कांग्रेस का इस संगठन से परंपरागत जुड़ाव रहा है, जबकि भाजपा भी इस वर्ग को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। यही वजह है कि कांग्रेस ने खुलकर विरोध नहीं किया और भाजपा ने प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला देकर मामला केंद्र के पाले में डाल दिया।

अजाक्स की लड़ाई: संगठन बनाम संगठन

मध्यप्रदेश में अजाक्स को लेकर भी हालात उलझे हुए हैं। दो अलग-अलग संगठन खुद को असली अजाक्स बताते हुए आमने-सामने हैं। धरना, प्रदर्शन और एक-दूसरे पर “नकली” होने के आरोप खुलेआम लगाए जा रहे हैं। शासन स्तर पर शिकायतें पहुंच चुकी हैं, लेकिन सरकार यहां भी मूकदर्शक बनी हुई है।

चुप्पी के पीछे की राजनीति: वोट बैंक की मजबूरी-

चाहे कांग्रेस हो या भाजपा-दोनों दल इस विवाद में सीधी कार्रवाई से बचते नजर आ रहे हैं। वजह साफ है-एससी–एसटी वोट बैंक। किसी एक पक्ष के खिलाफ सख्ती करने का मतलब दूसरे पक्ष की नाराजगी मोल लेना, और चुनावी सालों से पहले यह जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता।

एससी–एसटी सीटों का गणित, तय करता है सत्ता

मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में 35 सीटें अनुसूचित जाति, 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा करीब 40 सामान्य सीटों पर भी एससी–एसटी मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। यही वजह है कि दोनों दल इस वोट बैंक को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

2018 बनाम 2023: किसने साधा SC-ST वोट?

2018 में दलित-आदिवासी असंतोष कांग्रेस के पक्ष में गया और 15 साल बाद पार्टी सत्ता में लौटी। 2023 में भाजपा ने जमीनी पकड़ मजबूत कर एससी-एसटी सीटों पर बेहतर प्रदर्शन किया और पूर्ण बहुमत हासिल किया। यानी साफ है-यह वोट बैंक किसी एक दल का स्थायी नहीं है।

कांग्रेस का ओपन प्ले, भाजपा की साइलेंट स्ट्रैटेजी

कांग्रेस दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में नए दलित एजेंडे और आदिवासी फोकस के साथ खुलकर मैदान में है। वहीं भाजपा विकास, समरसता और प्रशासनिक संतुलन के नाम पर चुपचाप संदेश देने की रणनीति पर चल रही है। दोनों का लक्ष्य एक ही है-2028 में एससी-एसटी वोटों की अधिकतम हिस्सेदारी।

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सामाजिक न्याय या सियासी मजबूरी?

मध्यप्रदेश की राजनीति में दलित और आदिवासी मुद्दे एक बार फिर केंद्र में हैं। फर्क बस इतना है कि कांग्रेस इसे खुलकर सामाजिक न्याय की लड़ाई बता रही है, जबकि भाजपा बिना शोर-शराबे के वही वोट बैंक साधने में जुटी है।

2028 का चुनाव तय करेगा कि जनता को कौन-सा मॉडल ज्यादा भरोसेमंद लगता है। कांग्रेस का आक्रामक समर्थन या भाजपा की साइलेंट रणनीति।



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