एमपी में घपले-घोटालों ने पोषण आहार संयंत्रों की तोड़ी कमर, अब इन्हें निजी हाथों में देने की तैयारी

मध्य प्रदेश सरकार सात पोषण संयंत्रों को लेकर बड़ा फैसला करने की तैयारी कर रही है। इन संयंत्रों की घोटालों के कारण कमर टूट चुकी है। इन्हें जल्द ही निजी हाथों में सौंपा जा सकता है।

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Ravi Awasthi
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Scams broke the back of nutrition plants, now preparations to hand them over to private hands

Photograph: (the sootr)

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News In Short

  • मध्य प्रदेश में सभी 7 पोषण आहार संयंत्रों को निजी हाथों में देने की तैयारी।
  • सभी संयंत्र घपले-घोटालों के कारण जूझ रहे बड़े घाटे से।
  • अब संयंत्रों का काम नाफेड के जरिए निजी कंपनी से कराया जाएगा।
  • कर्नाटक की राशि फूड्स को संयंत्र संचालन से जोड़ने की योजना।
  • कैग ने 2022 में 110 करोड़ रुपए से अधिक के फर्जीवाड़े का किया था खुलासा।

News In Detail

BHOPAL. मध्य प्रदेश में घपले–घोटालों से घाटे में जूझ रहे सभी 7 पोषण आहार संयंत्रों को फिर से निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। ये संयंत्र प्रदेश के कुपोषित बच्चों के लिए पोषण आहार तैयार करते हैं। इस बार सीधे निजी कंपनी को जिम्मेदारी देने के बजाय नाफेड के जरिए काम कराने का रास्ता चुना गया है। यह रास्ता फैसले पर उठने वाले विवादों से बचने के लिए अपनाया है। 

कर्नाटक की कंपनी को देंगे काम

सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक की निजी फर्म राशि फूड्स को संयंत्रों के संचालन से जोड़े जाने की योजना है। महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम दो बार कर्नाटक जाकर फर्म की व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर चुकी है। इसकी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी जा चुकी है।

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भ्रष्टाचार की लंबी कहानी

कुपोषित बच्चों के लिए अमृत माने जाने वाले पोषण आहार की व्यवस्था मध्य प्रदेश में शुरुआत से ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही है। कैग ने 2022 में अपनी रिपोर्ट में 110 करोड़ रुपए से अधिक के फर्जीवाड़े का खुलासा किया था।

रिपोर्ट में बताया गया था कि जिन संयंत्रों से पोषण आहार की ढुलाई ट्रकों से होना दर्शाई गई, जांच में वे वाहन बाइक और ऑटो के निकले। नतीजतन, पोषण आहार न तो संयंत्र से बाहर आया और न ही गोदामों में पाया गया। सातों संयंत्र 31 मार्च 2025 तक करीब 267 करोड़ के घाटे में थे। आगामी 31 मार्च तक इसमें करीब 12 करोड़ की वृद्धि होने के आसार हैं।

महिला समूहों का प्रयोग भी साबित हुआ दिखावा

ये वही अत्याधुनिक संयंत्र हैं, जिन्हें साल 2021 में एमपी एग्रो कॉरपोरेशन से वापस लेकर स्व-सहायता समूहों के परिसंघों को सौंपा गया था। दावा किया गया था कि महिलाओं की भागीदारी से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।

हकीकत यह रही कि संयंत्रों का संचालन निजी तकनीशियनों और सरकारी अफसरों के हाथों में ही रहा। समूह परिसंघ कागजों तक सिमट गए और उनसे जुड़ी महिलाएं संयंत्रों में मजदूर बनकर रह गईं।

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बदलाव भी नहीं रोक सका भ्रष्टाचार

देश में कुपोषण समाप्त करने के लिए 1975 में एकीकृत बाल विकास योजना लागू की गई थी। मध्य प्रदेश में एक दशक में ही इस योजना का सालाना बजट 1200 करोड़ रुपए से अधिक रहा, लेकिन यह योजना भ्रष्टाचारियों के लिए चारागाह बनती चली गई। शिवराज सरकार के तीसरे कार्यकाल में लगे आरोपों के बाद लंबी जांच हुई और संयंत्रों का संचालन निजी हाथों से लेकर एमपी एग्रो को सौंपा गया।

निजी कंपनियों को बाहर रखने का था फैसला

 वर्ष 2019 में राज्य मंत्रिपरिषद ने तय किया था कि एमपी एग्रो किसी भी निजी कंपनी को पोषण आहार निर्माण का काम नहीं देगा। एक अंतरविभागीय समिति पूरे तंत्र की निगरानी करेगी और महिला एवं बाल विकास विभाग सीधे सप्लाई ऑर्डर जारी करेगा।

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आजीविका मिशन के हाथ आए संयंत्र

इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र तक दिया, लेकिन दो साल बाद ही संयंत्रों को देवास, धार, नर्मदापुरम, मंडला, सागर, शिवपुरी और रीवा में आजीविका मिशन से जुड़े समूहों को सौंप दिया गया। आधुनिकीकरण के नाम पर मिशन को करीब 400 करोड़ रुपए का बजट दिया गया। तीन महीने के अग्रिम भुगतान की व्यवस्था शुरू की गई, जो आज भी जारी है।

घाटे में फिसले सभी संयंत्र

इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद कोई भी संयंत्र घाटे से नहीं उबर सका। सूत्रों के अनुसार, बीते चार वर्षों में किसी भी संयंत्र ने अपनी कुल उत्पादन क्षमता का आधा भी उपयोग नहीं किया। काम 30-40 प्रतिशत और खर्च सौ प्रतिशत कच्चे माल की अफरा-तफरी और फर्जी परिवहन पर निगरानी का अभाव गड़बड़ियों की बड़ी वजह बना।

विरोध के बाद बदली रणनीति

सूत्र बताते हैं कि पहली निरीक्षण टीम में शामिल कुछ महिला अधिकारी निजी फर्म को संयंत्र सौंपने के पक्ष में नहीं थीं। इसके बाद विभाग प्रमुख और आयुक्त स्तर पर बदलाव कर नई टीम गठित की गई, जिसने दूसरी रिपोर्ट सौंपी।

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नाफेड बना ‘बीच का रास्ता’

शुरुआत में विभागीय मंत्री भी प्रबंधन व्यवस्था बदलने के पक्ष में नहीं थीं, लेकिन विरोध को देखते हुए उच्चस्तरीय समीक्षा में तय किया गया कि संयंत्र सीधे राशि फूड्स को न देकर नाफेड के माध्यम से सौंपे जाएं।

बताया जाता है कि इसी कारण राशि फूड्स ने हाल ही में नाफेड में अपना पंजीयन भी करा लिया है। सूत्रों का दावा है कि जल्द ही यह प्रस्ताव कैबिनेट बैठक में लाया जा सकता है।

इस संबंध में महिला एवं बाल विकास विभाग के वित्तीय सलाहकार पंकज मोहन ने कहा कि वह सिर्फ पहली ट्रिप में कर्नाटक गए थे।इस मामले में आगे के डेवलपमेंट की जानकारी उन्हें नहीं है।

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