सरकार के लिए गले की हड्डी बन जाता विशेष सत्र, नियमों की आड़ में निकली बाहर
Pawan Modiya | Apr 29, 2026, 19:11 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश विधानसभा के महिला आरक्षण विशेष सत्र में प्रमुख सचिव की एक तकनीकी चूक ने बीजेपी को ऐसे चक्रव्यूह में फंसाया, जहां हां करना और ना करना, दोनों नुकसानदेह थे। 8 घंटे चले सत्र में जमकर हंगामा हुआ।
भोपाल. महिला आरक्षण के मुद्दे पर बुलाया गया मध्यप्रदेश विधानसभा का विशेष सत्र मोहन सरकार के लिए आसान नहीं रहा। एक प्रशासनिक चूक ने ऐसा सियासी पेंच फंसा दिया कि सरकार कुछ देर के लिए अपने ही रुख के उलट खड़ी होने की स्थिति में आ गई। सदन में हंगामा, तीखी बहस और नियमों की अलग-अलग व्याख्या के बीच सरकार को डैमेज कंट्रोल करना पड़ा।
दरअसल, मोहन सरकार ने 27 अप्रैल को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लागू करने के मुद्दे पर केंद्र सरकार के समर्थन में एक दिन का विधानसभा विशेष सत्र बुलाया था। राज्य सरकार चाहती थी कि वह महिला आरक्षण पर अपनी मंशा साफ करे और सदन से सरकारी प्रस्ताव पास कराए, लेकिन जैसे ही प्रक्रिया आगे बढ़ी, एक चूक ने पूरे घटनाक्रम की दिशा बदल दी।
1. सरकार ने क्या किया?
सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं के सर्वांगीण विकास एवं सशक्तिकरण के उद्देश्य से देश की संसद एवं सभी विधानसभाओं में महिलाओं के एक तिहाई आरक्षण तथा परिसीमन लागू करने संबंधी संकल्प पत्र पेश किया।
2. विपक्ष ने क्या किया?
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार के शासकीय संकल्प पर संशोधन प्रस्ताव रखा। विपक्ष ने कहा कि महिलाओं के सर्वांगीण विकास और सशक्तिकरण के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण विधानसभा, लोकसभा में मौजूदा सीटों पर शीघ्र प्रदान किया जाए।
3. अब चूक क्या हुई?
विधानसभा सचिवालय ने कांग्रेस के संशोधन को गहराई से परखे बिना स्वीकार कर लिया और मामला पेचीदा हो गया। संशोधन स्वीकार होने का मतलब था कि उस पर आगे की प्रक्रिया भी तय करनी पड़ेगी। इसी दौरान दूसरी बड़ी स्थिति बनी और कांग्रेस के संशोधन पर वोटिंग की संभावना बन गई।
विशेष सत्र में प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा ने विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को संकेत दिया था कि संशोधन पर वोटिंग कराई जा सकती है। इसी आधार पर संशोधन को वोटिंग के लिए स्वीकार करने की स्थिति बनी थी। यही वह मोड़ था, जहां से विवाद खुलकर सामने आ गया।
सत्ता पक्ष को जैसे ही स्थिति का पूरा अंदाजा हुआ, संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और मंत्री प्रहलाद पटेल खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया पर आपत्ति है और नियमों के अनुसार स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। इसके बाद सदन में असमंजस का माहौल बन गया। एक तरफ कांग्रेस अपने संशोधन पर अड़ी रही, दूसरी तरफ बीजेपी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही। बहस तेज होती गई और माहौल गरमा गया।
कांग्रेस का संशोधन था कि अभी आरक्षण दो। बीजेपी यदि इसके खिलाफ वोट करती तो बाहर क्या मैसेज जाता?
कांग्रेस कहती: देखो, हम महिलाओं को आरक्षण देना चाहते हैं, बीजेपी नहीं चाहती। यानी बीजेपी महिला विरोधी दिखती।
बीजेपी के पास संख्या ज्यादा थी, वो प्रस्ताव पास करा सकती थी। लेकिन प्रस्ताव में लिखा था कि अभी आरक्षण लागू करो। जबकि बीजेपी की लाइन है कि परिसीमन के बाद लागू होगा। अगर बीजेपी हां करती तो उसे उसी बात के साथ खड़ा दिखना पड़ता, जो वह खुद नहीं मानती। यानी पार्टी अपने ही रुख के खिलाफ जाती हुई नजर आती।
मतलब साफ है कि ना करती तो फंसती (महिला विरोधी इमेज) और हां करती तो भी फंसती (अपने ही बयान से पलटती)
यही असली चक्रव्यूह था।
इस घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के बीच तीखी नोंक-झोंक देखने को मिली। दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप हुए। मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर पुराने फैसलों को लेकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने 55 साल पहले परिसीमन को ‘सीज’ कर दिया था, जिसकी वजह से देश की आधी आबादी आरक्षण से वंचित रही। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने संसद में संशोधन विधेयक का समर्थन नहीं करके महिलाओं के साथ विश्वासघात किया।
विपक्ष के हंगामे पर मुख्यमंत्री ने कड़ा रुख दिखाते हुए कहा कि जोर-जोर से चिल्लाकर डराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन सरकार सदन में भी जवाब देना जानती है और मैदान में भी। इसके जवाब में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मुख्यमंत्री की भाषा और रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने इस नोंक-झोंक का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सरकार की कार्यशैली को निशाने पर लिया।
करीब 8 घंटे तक चले इस सत्र में स्थिति कई बार उलझती नजर आई। विपक्ष ने मत विभाजन की मांग की। हंगामा हुआ। एक-दूसरे पर जमकर आरोप-प्रत्यारोप हुए। आखिरकार, लंबी बहस और हंगामे के बीच प्रदेश सरकार ने अपना शासकीय संकल्प पारित करा लिया। संख्या बल के आधार पर बीजेपी ने जीत तो हासिल कर ली, लेकिन पूरा घटनाक्रम कई सवाल छोड़ गया। सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि एक प्रशासनिक स्तर की चूक ने सरकार को ऐसी स्थिति में कैसे ला दिया, जहां उसे अपने ही रुख से टकराने का खतरा खड़ा हो गया।
सत्र खत्म होने के बाद नाराजगी सामने आई। संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा पर भड़क गए। उन्होंने कक्ष में उन्हें जमकर फटकार लगाई। साफ कहा कि एक तकनीकी गलती ने पूरे सदन को मुश्किल में डाल दिया। सूत्रों के मुताबिक, मामला यहीं नहीं रुका। बाद में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने खुद पहल कर स्थिति संभालने की कोशिश की।
उन्होंने कैलाश विजयवर्गीय को फोन कर बताया कि आसंदी पर उठाए गए सवालों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया है। कुल मिलाकर, महिला आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे पर बुलाया गया यह विशेष सत्र बीजेपी के लिए राजनीतिक संदेश देने का मंच बनने के बजाय ऐसी स्थिति में बदल गया, जहां एक छोटी सी चूक ने सरकार को अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसा दिया।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 'द सूत्र' से बातचीत में कहा कि विधानसभा ने कार्यवाही को आगे बढ़ाया, फिर अपने कदम वापस खींच लिए। विधानसभा के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ है। उधर, बीजेपी का कहना है कि संशोधन प्रस्ताव पर कभी वोटिंग नहीं होती है।
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दरअसल, मोहन सरकार ने 27 अप्रैल को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लागू करने के मुद्दे पर केंद्र सरकार के समर्थन में एक दिन का विधानसभा विशेष सत्र बुलाया था। राज्य सरकार चाहती थी कि वह महिला आरक्षण पर अपनी मंशा साफ करे और सदन से सरकारी प्रस्ताव पास कराए, लेकिन जैसे ही प्रक्रिया आगे बढ़ी, एक चूक ने पूरे घटनाक्रम की दिशा बदल दी।
क्या और कैसे हुआ...समझिए?
सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं के सर्वांगीण विकास एवं सशक्तिकरण के उद्देश्य से देश की संसद एवं सभी विधानसभाओं में महिलाओं के एक तिहाई आरक्षण तथा परिसीमन लागू करने संबंधी संकल्प पत्र पेश किया।
2. विपक्ष ने क्या किया?
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार के शासकीय संकल्प पर संशोधन प्रस्ताव रखा। विपक्ष ने कहा कि महिलाओं के सर्वांगीण विकास और सशक्तिकरण के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण विधानसभा, लोकसभा में मौजूदा सीटों पर शीघ्र प्रदान किया जाए।
3. अब चूक क्या हुई?
विधानसभा सचिवालय ने कांग्रेस के संशोधन को गहराई से परखे बिना स्वीकार कर लिया और मामला पेचीदा हो गया। संशोधन स्वीकार होने का मतलब था कि उस पर आगे की प्रक्रिया भी तय करनी पड़ेगी। इसी दौरान दूसरी बड़ी स्थिति बनी और कांग्रेस के संशोधन पर वोटिंग की संभावना बन गई।
प्रमुख सचिव की बड़ी गलती
सत्ता पक्ष को जैसे ही स्थिति का पूरा अंदाजा हुआ, संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और मंत्री प्रहलाद पटेल खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया पर आपत्ति है और नियमों के अनुसार स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। इसके बाद सदन में असमंजस का माहौल बन गया। एक तरफ कांग्रेस अपने संशोधन पर अड़ी रही, दूसरी तरफ बीजेपी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही। बहस तेज होती गई और माहौल गरमा गया।
समझिए बीजेपी कैसे फंस गई
स्थिति 1: यदि वोटिंग होती और बीजेपी ना करती
कांग्रेस कहती: देखो, हम महिलाओं को आरक्षण देना चाहते हैं, बीजेपी नहीं चाहती। यानी बीजेपी महिला विरोधी दिखती।
स्थिति 2: यदि बीजेपी हां कर देती
मतलब साफ है कि ना करती तो फंसती (महिला विरोधी इमेज) और हां करती तो भी फंसती (अपने ही बयान से पलटती)
यही असली चक्रव्यूह था।
सीएम-नेता प्रतिपक्ष में नोंक-झोंक
विपक्ष के हंगामे पर मुख्यमंत्री ने कड़ा रुख दिखाते हुए कहा कि जोर-जोर से चिल्लाकर डराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन सरकार सदन में भी जवाब देना जानती है और मैदान में भी। इसके जवाब में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मुख्यमंत्री की भाषा और रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने इस नोंक-झोंक का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सरकार की कार्यशैली को निशाने पर लिया।
8 घंटे तक चला यह विशेष सत्र
मंत्री विजयवर्गीय ने पीएस को फटकारा
उन्होंने कैलाश विजयवर्गीय को फोन कर बताया कि आसंदी पर उठाए गए सवालों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया है। कुल मिलाकर, महिला आरक्षण जैसे गंभीर मुद्दे पर बुलाया गया यह विशेष सत्र बीजेपी के लिए राजनीतिक संदेश देने का मंच बनने के बजाय ऐसी स्थिति में बदल गया, जहां एक छोटी सी चूक ने सरकार को अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसा दिया।
अब जानें किसने क्या कहा?
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