टेक होम राशन घोटाला: पूर्व सीएस बैंस और बेलवाल के खिलाफ जांच में पंचायत विभाग का अड़ंगा

एमपी टेक होम राशन घोटाला की जांच को लेकर सीएम मोहन यादव ने बड़ा खुलासा किया है। सीएम ने विधानसभा में बताया कि लोकायुक्त के तीन नोटिस के बाद भी पंचायत विभाग ने दस्तावेज नहीं दिए हैं।

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Amresh Kushwaha
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BHOPAL. मध्यप्रदेश के बहुचर्चित पोषण आहार और टेक होम राशन घोटाले की जांच अब एक दिलचस्प मोड़ पर आ गई है। प्रदेश के पूर्व सीएस इकबाल सिंह बैंस और आजीविका मिशन के पूर्व सीईओ ललित मोहन बेलवाल के खिलाफ चल रही जांच एक साल से लंबित है। वहीं, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की चुप्पी चर्चा का विषय बनी हुई है।

मुख्यमंत्री के जवाब ने बढ़ाई हलचल

इस पूरे मामले की हकीकत तब सामने आई जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में एक लिखित जवाब पेश किया। पेश जानकारी के अनुसार, आजीविका मिशन में हुए इस घोटाले को लेकर मार्च 2025 में जांच प्रकरण दर्ज किया गया था।

हालांकि, हैरान करने वाली बात यह है कि अभी तक इस मामले में आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं हो सका है। इसका मुख्य कारण पंचायत विभाग के अफसरों के जरिए लोकायुक्त को जानकारी उपलब्ध न कराना बताया जा रहा है।

तीन बार बुलावा, फिर भी खाली हाथ रही लोकायुक्त की टीम

जांच की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकायुक्त ने सबूत जुटाने के लिए अफसरों को एक नहीं, बल्कि तीन बार तलब किया। मुख्यमंत्री मोहन यादव के जवाब के अनुसार:

  • 12 अगस्त 2025 को पहली बार विभाग के अफसरों को बुलाया गया था।

  • 28 नवंबर 2025 को दोबारा याद दिलाया गया था।

  • 5 फरवरी 2026 को तीसरी बार मौका दिया गया था।

इन तीनों तारीखों पर न तो कोई अधिकारी उपस्थित हुआ और न ही कोई दस्तावेज भेजे गए।

13 अप्रैल तक का अल्टीमेटम

लगातार मिल रही अनदेखी के बाद लोकायुक्त के विधिक सलाहकार जसवंत सिंह यादव ने मोर्चा संभाला है। उन्होंने 16 फरवरी को पंचायत विभाग की एसीएस दीपाली रस्तोगी, सचिव जीवी रश्मि और आजीविका मिशन की सीईओ हर्षिका सिंह को पत्र लिखा है।

पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि सीएजी (CAG) के जरिए 2022 में की गई टिप्पणियों से संबंधित जानकारी 13 अप्रैल तक अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाए। बता दें कि यह पूरी जांच पूर्व विधायक पारस सकलेचा की 2023 की शिकायत पर आधारित है।

सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

इस मामले को लेकर कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल ने सदन में सवाल पूछा था। एमपी विधानसभा में पेश आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पिछले 8 वर्षों (2018 से 2026 तक) में भ्रष्टाचार की कुल 37 हजार 967 शिकायतें मिलीं थीं। वहीं, इनमें से केवल तीन हजार 716 (9.77%) पर ही जांच शुरू हुई थी। बाकी 34 हजार 251 शिकायतों को निरस्त कर दिया गया था।

इसी अवधि में पद के दुरुपयोग के 236 मामलों सहित कुल दो हजार 41 आपराधिक केस दर्ज किए गए थे। सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार की शिकायतें वर्ष 2019-20 में (पांच हजार 493) दर्ज की गई थीं।

चार्जशीट पेश करने में लग रहे सालों

लोकायुक्त की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में जिन 176 मामलों में चार्जशीट पेश की गई, वे सभी केस 2012 से 2017 के बीच दर्ज हुए थे। यानी एक चार्जशीट पेश होने में औसतन 4 से 12 साल का समय लग रहा है।

स्थिति यह है कि जनवरी 2007 की एक शिकायत पर 17 साल बाद अगस्त 2024 में मामला दर्ज हो पाया था। वर्तमान में 31 जनवरी 2026 तक कुल 979 आपराधिक प्रकरण विवेचना (Investigation) के अधीन हैं।

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