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INDORE. मध्य प्रदेश की भर्ती परीक्षाओं में उम्मीदवारों के लिए नासूर बन चुके, 87-13 फीसदी फॉर्मूले में अब नया विवाद शुरू हुआ है। इस फॉर्मूले के आने के बाद पीएससी के जरिए उम्मीदवारों से एक शपथपत्र लिया जाता है।
इस शपथ पत्र को जीएडी द्वारा 29 सितंबर 2022 को जारी किए गए सर्कुलर के खिलाफ बताया गया है। इस पर हाईकोर्ट जबलपुर में याचिका दायर की गई है और कोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षकारों से जवाब मांगा है।
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जीएडी का सर्कुलर और पीएससी के शपथपत्र में ये है
यह याचिका एडीपीओ (सहायक जिला लोक अभियोजक) परीक्षा 2024 के उम्मीदवारों ने दायर की है, और अधिवक्ता शिवम गौतम ने इस पर तर्क पेश किए हैं।
जीएडी के सर्कुलर के मुताबिक, बिंदु 3 में कहा गया है कि जो उम्मीदवार प्रोवीजनल (13 फीसदी रिजल्ट) में चयनित हुए हैं, वे हर चरण में इसी प्रोवीजनल कैटेगरी में रहेंगे।
यानी, न्यायालय के अंतिम आदेश के बाद ही, वे अपने संबंधित वर्ग (ओबीसी या अनारक्षित) के लिए रोके गए 13 फीसदी पद के खिलाफ चयनित होंगे।
इसका मतलब यह है कि 87 फीसदी मूल रिजल्ट के पद पर उनका कोई दावा नहीं होगा, जो पहले घोषित हो चुके हैं।
वहीं, पीएससी द्वारा लिए गए शपथपत्र में तीसरे पैरे में यह लिखा गया है कि उम्मीदवार यह शपथ लेते हैं कि वे 87 फीसदी से 13 फीसदी (87-13 फीसदी फॉर्मूला) या प्रोवीजनल रिजल्ट 13 फीसदी से मुख्य भाग 87 फीसदी में कोई बदलाव (इंटरचेंज) करने के लिए दावा या आपत्ति नहीं करेंगे।
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इस आधार पर लगी है याचिका
अधिवक्ता शिवम गौतम ने कहा कि जीएडी का सर्कुलर सिर्फ 13 फीसदी प्रोविजनल रिजल्ट वाले उम्मीदवारों को ही प्रभावित करता है। यानी जो 13 फीसदी रिजल्ट वाले हैं, वे 87 फीसदी वाले पदों पर कोई दावा नहीं कर सकते।
लेकिन पीएससी का जो शपथपत्र लिया जाता है, वह अलग है। इसमें 87 फीसदी वाले उम्मीदवारों को भी 13 फीसदी रिजल्ट वाले पदों में इंटरचेंज करने से रोक दिया गया है। इसका मतलब यह है कि दोनों कैटेगरी के बीच इंटरचेंज की कोई सुविधा नहीं है।
इस पर याचिका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लागू मेरिट आधारित व्यवस्था का उल्लंघन बताया गया है। याचिका में कहा गया कि यदि 87 फीसदी वाले उम्मीदवार को उसका पद नहीं मिलता, तो उसे 13 फीसदी रिजल्ट वाले पदों में से पद पाने का अधिकार होना चाहिए, बशर्ते वह मेरिट के आधार पर योग्य हो। यह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के तहत होना चाहिए।
अधिवक्ता गौतम ने कहा कि पीएससी द्वारा यह शपथपत्र लेकर जीएडी के फार्मूले को गलत तरीके से लागू किया गया है, और इसके साथ ही मेरिट को भी रोक दिया जा रहा है।
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उदाहरण से समझिए यह याचिका क्या बोल रही है
मान लीजिए डिप्टी कलेक्टर की 10 पोस्ट है। इसमें 87-13 फॉर्मूले ( एमपीपीएसी 87-13 फीसदी फार्मूले) के तहत इसमें 7 पोस्ट मूल रिजल्ट में और 3 पोस्ट 13 फीसदी में है। प्री के नंबर के आधार पर तो उम्मीदवार की छंटनी 87-13 फीसदी में हो गई है। यह मेरिट से बनी है। अंतिम चयन सूचि मेंस और इंटरव्यू के अंक से बनती है।
इसमें उम्मीदवारों का तर्क है कि, यदि किसी उम्मीदवार के अधिक अंक है और वह टॉप 8 में है तो उसे 87 फीसदी कैटेगरी में होने पर भी डिप्टी कलेक्टर का पद नहीं मिलेगा, क्योंकि वहां सात ही सीट है।
3 सीट तो 13 फीसदी में आरक्षित है। मेरिट के आधार पर उसका अधिकार डिप्टी कलेक्टर पद का बनता है। वहीं पीएससी का शपथपत्र ऐसा करने से रोक रहा है।
वहीं, जीएडी के सर्कुलर में केवल 13 फीसदी वालों को बाध्यता है। वह 87 फीसदी के लिए क्लेम नहीं करेंगे। इसमें 87 फीसदी वालों के लिए यह बाध्यता जीएडी सर्कुलर से नहीं है कि, वह 13 फीसदी पद के लिए क्लेम नहीं कर सकते हैं।
कायदे से मेरिट नियम से और जीएडी के फार्मूले से उसे 13 फीसदी में रखी गई तीन डिप्टी कलेक्टर की पोस्ट में से एक मिलना चाहिए।
इसलिए इसे निरस्त करने की मांग है
याचिका में इसे निरस्त कर 87 फीसदी वालों को 13 फीसदी (87-13 का फार्मूला) के पद मेरिट से लेने की पात्रता देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि पीएससी का शपथपत्र अल्ट्रा वायरेस है। इसे निरस्त किया जाना चाहिए।
कायदे से नियम बनाने का अधिकार जीएडी का है। पीएससी ने इसकी गलत व्याख्या करते हुए गलत शपथपत्र बनाया है। ये मेरिट को रोकता है। इस मामले में हाईकोर्ट ने पक्षकारों से जवाब मांगा है।
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