MPPSC के नए भर्ती नियमों पर छिड़ी बहस, OBC प्रतिनिधित्व को लेकर अधिवक्ता ने जताई 8 आपत्तियां
Neel Tiwari | Jun 02, 2026, 15:30 IST
mppsc exam rules objections lawyer vinayak shah
मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की नई परीक्षा नियमावली 2026 लागू होने से पहले ही विवाद में आ गई है। अधिवक्ता विनायक शाह ने कहा है कि इसमें OBC वर्ग के आरक्षण और अधिकारों पर असर पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने सरकार को कानूनी और संवैधानिक आपत्तियां भेजी हैं।
समझें क्या है पूरा मामला...
- MPPSC भर्ती परीक्षाओं के लिए परीक्षा नियम 2026 का नया ड्राफ्ट जारी किया गया है।
- सामान्य प्रशासन विभाग ने 5 जून 2026 तक जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी थीं।
- अधिवक्ता विनायक शाह ने सरकार को 8 बिंदुओं पर विस्तृत कानूनी आपत्तियां भेजीं।
- विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के जनरल मेरिट में चयन से जुड़ा है।
- नियमों में बदलाव नहीं हुआ तो मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।
प्रशासनिक सुधार की पहल या नए विवाद की शुरुआत
सरकार का कहना है कि ये नियम भर्ती प्रक्रिया में साफ-सफाई और एकरूपता लाने के लिए हैं। यानी हर परीक्षा में सबके लिए समान तरीके अपनाए जाएं और किसी तरह की गड़बड़ी या भेदभाव न हो।
वहीं मसौदे के कुछ नियमों ने सवाल भी खड़े कर दिए हैं। कई लोगों को लगता है कि ये कानूनी तौर पर सही हैं या नहीं, इसे लेकर संदेह है। इसके अलावा छात्रों और विशेषज्ञों के बीच इस पर बहस भी तेज हो रही है।
सुझाव आमंत्रित किए गए, लेकिन पहुंच गई कानूनी आपत्तियां
इसी प्रक्रिया के दौरान 01 जून 2026 को जबलपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ता विनायक शाह ने विस्तृत आपत्तियां प्रस्तुत की। साथ ही सरकार का ध्यान कई संवैधानिक और कानूनी पहलुओं की ओर आकर्षित किया।
विनायक शाह लंबे समय से OBC वर्ग के अधिकारों और प्रतिनिधित्व से जुड़े मामलों में सक्रिय रूप से पक्ष रखते रहे हैं। उनके द्वारा भेजे गए सुझावों ने भर्ती नियमों के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों पर बहस छेड़ दी है।
OBC की परिभाषा पर उठे संवैधानिक सवाल
शाह का तर्क है कि राज्य सरकार को वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार विधिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए। साथ ही OBC सूची के संबंध में स्पष्टता लानी चाहिए। अन्यथा भविष्य में यह प्रावधान कानूनी चुनौती का कारण बन सकता है।
आरक्षण बनाम मेरिट की बहस फिर केंद्र में
शाह का तर्क है कि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि ,अनारक्षित पद सभी वर्गों के लिए खुले होते हैं। केवल मेरिट के आधार पर भरे जाने चाहिए।
वहीं यदि कोई आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी सामान्य मेरिट से चयनित होता है तो उसे अनारक्षित पद पर माना जाना चाहिए। इससे आरक्षित वर्ग के लिए निर्धारित सीटें सुरक्षित रहें। साथ ही अधिक उम्मीदवारों को अवसर मिल सके।
रियायत लेने वाले अभ्यर्थियों पर सबसे बड़ा विवाद
अधिवक्ता शाह ने इस व्यवस्था को आरक्षण के मूल उद्देश्य के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि एक ओर सरकार प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए रियायत देती है।
वहीं दूसरी ओर उसी रियायत के आधार पर सामान्य सीट पर चयन का अवसर समाप्त कर देती है। इससे आरक्षित वर्ग के योग्य उम्मीदवारों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
मेरिट सूची बनाने के तरीके पर भी उठी आपत्ति
इसके बाद जो अभ्यर्थी अपने अंकों और योग्यता के आधार पर उस सूची में आते हैं, उन्हें शामिल किया जाए। चाहे उन्होंने किसी चरण में कोई वैधानिक छूट प्राप्त की हो। शाह का मानना है कि यह व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर निर्धारित सिद्धांतों के अधिक अनुरूप होगी। साथ ही चयन प्रक्रिया को विवादों से बचा सकेगी।
सेवा आवंटन और रोस्टर व्यवस्था पर भी सवाल
शाह का कहना है कि अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य मेरिट से पास हो जाता है। साथ ही अपनी आरक्षित श्रेणी की वजह से बेहतर पोस्ट या सेवा पा लेता है, तो उसे सामान्य मेरिट वाला ही माना जाना चाहिए। इस तरह करने से आरक्षित वर्ग की मूल सीटें बची रहेंगी। साथ ही ज्यादा उम्मीदवारों को प्रतिनिधित्व का मौका मिलेगा।
भर्ती प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की कोशिश
जैसे कि भर्ती साल को तय करना, उम्र गिनने का एक ही तरीका। साथ ही अलग-अलग सेवाओं को ग्रुप में बांटना शामिल हैं। वहीं अगर आवेदन कम आए तो सीधे इंटरव्यू लेने की व्यवस्था और नकल या किसी भी गड़बड़ी पर सख्त कार्रवाई। सरकार का उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया को एक समान कानूनी ढांचे में लाना बताया जा रहा है।
अब सरकार के फैसले पर टिकी हैं निगाहें
वहीं अगर इन आपत्तियों पर संतोषजनक फैसला नहीं हुआ तो मामला हाईकोर्ट तक भी जा सकता है। ऐसे में MPPSC (मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग) की तैयारी कर रहे हजारों छात्रों के लिए ये मुद्दा आने वाले दिनों में काफी अहम हो जाएगा।
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