MPPSC की भर्ती प्रक्रिया पर हाईकोर्ट सख्त, अब फैसले पर टिकीं नियुक्तियां

MPPSC की सहायक संचालक भर्ती में कम अंक वाले का चयन और ज्यादा अंक वाले को वेटिंग में डालने पर हाईकोर्ट सख्त। नियुक्तियां अब कोर्ट के फैसले पर टिक गई है।

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Neel Tiwari
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High Court is strict on the recruitment process of MPPSC

Photograph: (the sootr)

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5 पाइंट में समझें पूरी खबर...

  • MPPSC की सहायक संचालक (तकनीकी) भर्ती पर हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • याचिकाकर्ता ने आरक्षण नियमों का उल्लंघन होने का आरोप लगाया।
  • हाईकोर्ट ने सभी नियुक्तियों को याचिका के फैसले पर स्थगित किया।
  • 16 दिसंबर 2025 को जारी चयन सूची में याचिकाकर्ता को अनारक्षित सूची में रखा गया।
  • अगर याचिकाकर्ता की दलीलें सही पाई जाती हैं, तो भविष्य की भर्तियां प्रभावित हो सकती हैं।

JABALPUR. मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की एक और भर्ती प्रक्रिया हाईकोर्ट के कटघरे में आ गई है। कुटीर एवं ग्रामोद्योग विभाग में सहायक संचालक (तकनीकी) के 11 पदों पर हुई भर्तियों को लेकर बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। बालाघाट निवासी नितिन कुमार मेश्राम की याचिका पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए पूरी चयन प्रक्रिया को याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन कर दिया है।

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कम अंक वाले का चयन, अधिक अंक वाला वेटिंग में

याचिका में बताया गया कि लोक सेवा आयोग द्वारा 31 मई 2023 को जारी विज्ञापन के तहत सहायक संचालक (तकनीकी) पदों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसमें याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति वर्ग से शामिल हुआ था।

6 दिसंबर 2025 को जारी परिणाम में न तो उसका नाम था और न ही अंक घोषित किए गए। इसके बाद 16 दिसंबर 2025 को जारी चयन सूची में अनुसूचित जाति वर्ग से लखन सिंह दौहरे (53 अंक) को चयनित दिखाया गया। याचिकाकर्ता को उससे अधिक अंक होने के बावजूद अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची में क्रमांक दो पर रखा गया।

आरक्षण नियमों की अनदेखी का आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर और अधिवक्ता पुष्पेंद्र शाह ने कोर्ट में पैरवी की। अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया गया कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 335 के साथ-साथ मध्य प्रदेश आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 4(4) के भी खिलाफ है। दलील दी गई कि अनुसूचित जाति वर्ग के अधिक अंक वाले अभ्यर्थी को अनारक्षित प्रतीक्षा सूची में डालना और कम अंक वाले को चयन देना पूरी तरह असंवैधानिक है।

हाईकोर्ट ने किया जवाब तलब

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए मध्य प्रदेश शासन, लोक सेवा आयोग और चयनित अभ्यर्थी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही स्पष्ट किया गया है कि सहायक संचालक पदों पर की गई समस्त नियुक्तियां अब इस याचिका के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी।

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भर्ती पारदर्शिता पर फिर सवाल

इस आदेश के बाद एक बार फिर MPPSC की भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और आरक्षण नियमों के पालन को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि याचिकाकर्ता की दलीलें सही पाई जाती हैं, तो यह फैसला भविष्य की भर्तियों के लिए भी अहम मिसाल बन सकता है।

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