पोस्टकार्ड को याचिका माना, हाईकोर्ट ने कैदी को दिया पैरोल, कहा-सिर्फ अमीरों का विशेषाधिकार नहीं

Mukesh Sharma | Jan 08, 2026, 15:35 IST
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high court jodhpur
Photograph: (the sootr)

राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है कि पैरोल सिर्फ अमीरों का विशेषाधिकार नहीं है। ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने एक कैदी के पोस्टकार्ड को ही याचिका मानते हुए यह टिप्पणी की।

Jaipur. राजस्थान हाई कोर्ट ने पैरोल के लिए जमानत देने के मामले में कहा है कि पैरोल सिर्फ अमीरों का विशेषाधिकार नहीं है,बल्कि ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने जेल में बंद एक कैदी खरताराम के पोस्टकार्ड को ही याचिका मानकर सुनवाई की।
हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे कैदी खरताराम की पैरोल स्वीकृत हुई थी। रिहा होने के लिए उसे दो जमानती पेश करने को कहा था। कैदी खरताराम बेहद गरीबी के कारण दो जमानती पेश नहीं कर सकता था। इससे दु:खी होकर उसने हाईकोर्ट को पोस्टकार्ड लिखा था।

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अब आर्थिक स्थिति भी देखनी होगी

हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि गरीबी कोई अपराध नहीं है और पैरोल अमीरों का विशेषाधिकार नहीं हो सकता। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि भविष्य में पैरोल पर रिहाई के लिए बॉन्ड की शर्त तय करते समय कैदी की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखा जाए। कोर्ट ने पाली जिले के रहने वाले कैदी खरताराम को व्यक्तिगत जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए है। इसके साथ ही भविष्य के लिए गाइड लाइंस भी जारी की है।

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पोस्टकार्ड को याचिका माना, हाईकोर्ट ने कैदी को दिया पैरोल

खरताराम को हत्या के मामले में 2014 में आजीवन कारावास की सजा हुई थी। 29 सितंबर 2025 को जिला पैरोल कमेटी ने उसे चौथी बार 40 दिन की नियमित पैरोल देने का आदेश तो दिया, लेकिन साथ ही 25-25 हजार रुपए के दो जमानती पेश करने की शर्त लगा दी। आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर होने के कारण कैदी खरताराम यह शर्त पूरी नहीं कर सका। पैसा नहीं होने के कारण वह वकील की सेवा भी नहीं ले सकता था। इस पर उसने जेल से ही पोस्टकार्ड के जरिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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बार-बार एक ही शर्त से नहीं मिली पैरोल

कोर्ट ने कैदी खरताराम के पोस्टकार्ड को ही पत्र याचिका के तौर पर स्वीकार कर सुनवाई शुरू की थी। सुनवाई में पता चला कि खरताराम की पैरोल चौथी बार मंजूर हुई है। इससे पहले 2019,2020 और 2022 में भी उसे पैरोल मिला था। लेकिन हर बार जमानत देने की शर्त पूरी नहीं करने के कारण वह रिहा नहीं हो सका था।

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पता था फिर भी लगाई शर्त जेल अधिकारियेां और पैरोल स्वीकृत करने वाली कमेटी को पता था कि खरताराम पूर्व में भी तीन बार जमानत नहीं देने के कारण पैरोल का लाभ नहीं ले सका है। इसके बावजूद अधिकारियों का जमानती पेश करने की शर्त दोहराना कोर्ट को आपत्तिजनक लगा। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस फरजंद अली की बैंच अधिकारियों के इस रवैए पर कड़ी नाराजगी जताई।
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गरीब से जमानती मांगना,पैरोल से वंचित करना...

कोर्ट ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण पैटर्न है और सिस्टम की उदासीनता को दर्शाता है। यदि कोई कैदी गरीब है और जमानती पेश नहीं कर सकता, तो उससे जमानती मांगना वस्तुतः उसे पैरोल से वंचित करने जैसा है।
कोर्ट ने कहा है कि संबंधित अधिकारी यह भी सुनिश्चित करेंगे कि भविष्य में इस प्रकार के गरीब कैदियों के मामलों में दिशा-निर्देेशों के साथ नियमों के तहत मिले विवेक का इस्तेमाल मानवीय और तर्कसंगत तरीक से फैसले करेंगे।

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निजी मुचलके पर रिहा करने के निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुरने जिला पैरोल कमेटी के आदेश को रद्द करते हुए खरताराम को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर पैरोल पर रिहा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही प्रदेशभर में गरीब कैदियों के लिए पैरोल प्रक्रिया को मानवीय और न्यायसंगत बनाने के लिए छह सूत्रीय गाइडलाइन जारी की है।

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यह है गाइडलाइंस...

  • व्यक्तिगत बांड की रकम कैदी की आर्थिक पृ​ष्ठभूमि और स्टेट्स के अनुसार होनी चाहिए और बहुत ज्यादा व ऐसी ना हो जो कैदी पर जुल्म के रुप में हो।
  • पहली पैरोल मंजूर करते समय उचित जमानत लेनी चाहिए। लेकिन ऐसी मंजूरी से पहले पैरोल कमेटी को लगता है कि कैदी गरीब है तो उसे शर्ते नहीं लगानी चाहिए।
  • पहली पैरोल में जमानत की शर्त है और यदि कैदी ने इस शर्त से छूट मांगी है तो कमेटी उसकी गरीबी व जमानत देने में असमर्थता से संतुष्ट हो तो,जमानत की शर्त हटा देनी चाहिए।
  • यदि किसी कैदी को बिना जमानत बांड के पैरोल पर रिहा किया गया हो,तो आगे भी पैरोल के लिए जमानत बांड की शर्त को हटा देना चाहिए। ऐसा तब तक हो जब तक कि कमेटी इस बात से संतुष्ट हो जाए कि कैदी जमानत देने में सक्षम हो गया है।
  • एक बार जब किसी कैदी को जमानत पर छूट का फायदा दिया जाए तो इसकी सूचना फौरन मेंबर सेक्रेटरी,राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को देनी चाहिए। प्राधिकरण इसे एक डिजिटल डेटा बेस में दर्ज करे। एक बार एंट्री होने के बाद राज्य की ड्यूटी है कि वह मेंबर सेक्रेटरी के साथ मिलकर कानूनी सहायता के माध्यम से उचित आवेदन दाखिल करने के बाद पैरोल देने के लिए कदम उठाए।
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