News Strike : निगम मंडल के पद के लिए इन दलबदलुओं ने शुरू की जोरआजमाइश!
Jitendra Shrivastava | May 27, 2024, 23:18 IST
thesootr
मध्यप्रदेश में ऐसे बहुत से नेता वो भी शामिल हैं जो कांग्रेस बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। माना जा रहा है कि सियासी डील के तहत इन्हें भी पार्टी बदलने के बदले कोई प्रलोभन दिया गया होगा। जिसमें निगम मंडलों में नियुक्ति एक प्रलोभन हो सकता है...
News Strike : चुनाव के काम से फारिग होते ही मध्यप्रदेश में वेटिंग लिस्ट वाले नेताओं ने फिर से उछल कूद शुरू कर दी है। ये वो नेता हैं जो बीजेपी सरकार के चौथे सीजन में अब कुछ बेहतर जगह की उम्मीद कर रहे हैं। सरकार में तो खैर उन्हें ही जगह मिल सकती है जो जीतकर सदन में पहुंचे हों, लेकिन जो जीते नहीं उनका एडजस्टमेंट जरूरी है। इसके लिए तगड़ी लॉबिंग शुरू हो चुकी है। अधिकांश नेताओं की नजर मध्यप्रदेश के निगम मंडलों पर है और जो निगम मंडल की पोस्टिंग से ऊपर उठ चुके हैं वो किसी राज्य का राजपाल बनने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
आपको बता दूं कि निगम मंडल को लेकर फिलहाल प्रदेश के नए मुखिया डॉ. मोहन यादव का रुख कुछ अलग चल रहा है, लेकिन उम्मीद लगाने वालों को भला कौन रोक सकता है। मध्यप्रदेश में नई सरकार दिसंबर में बनी और बमुश्किल एक महीने के अंदर ही सत्ता संगठन पर केंद्र के चुनाव की चुनौती आ गई। अब मध्यप्रदेश की सभी सीटों पर मतदान पूरा हो ही चुका है। बमुश्किल एक सप्ताह बाद नतीजे भी सबके सामने होंगे। जितने भी नेता कुछ भाल होने की वेटिंग लिस्ट में हैं, उन्हें उम्मीद है कि अब उनके राजनीतिक पुनर्वास का रास्ता साफ हो गया है। ये सोचने वालों में सिर्फ बीजेपी ही नहीं, ऐसे बहुत से नेता वो भी शामिल हैं जो कांग्रेस बीजेपी शामिल हो चुके हैं। माना जा रहा है कि सियासी डील के तहत इन्हें भी पार्टी बदलने के बदले कोई प्रलोभन दिया गया होगा। जिसमें निगम मंडलों में नियुक्ति एक प्रलोभन हो सकता है। जैसे ही निगम मंडलों में नियुक्ति का रास्ता साफ हो जाएगा। उसके बाद नंबर उन नेताओं का आएगा जो किसी भी राज्य में राजपाल बनने की बाट जोह रहे हैं। निगम मंडलों में खासतौर से नेताओं की रुचि ज्यादा है। इसकी वजह ये है कि मामला प्रदेश का है और एमपी लेवल पर ही इसका फैसला भी होना है। यही वजह है कि बहुत से नेता अभी से निगम मंडल में लाभ का पद हासिल करने के लिए दौड़ धूप कर रहे हैं और बहुत से नेता लॉबिंग भी कर रहे हैं।
आपको ऐसे कुछ नाम बताता हूं जो निगम मंडल के दावेदारों में सबसे टॉप पर हैं। इसमें पहला नाम हितेष वाजपेयी का है जो लंबे समय तक बीजेपी सरकार में प्रवक्ता रहे हैं। इसके बाद माखन सिंह चौहान, अखिलेश्वरानंद गिरी, शैलेंद्र बरुआ, गिर्राज दंडोतिया, विनोद गोटिया, जयपाल चावड़ा, शैलेंद्र शर्मा, कृष्ण मोहन सोनी, सुनील पांड और सुल्तान सिंह शेखावन का नाम आता है। आपको याद दिला दूं इससे पहले अधिकांश निगम मंडलों पर सिंधिया समर्थकों का कब्जा था। ऐसे समर्थक जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुए थे, लेकिन 2020 का चुनाव जीत कर दोबारा सदन नहीं पहुंच पाए थे। ऐसे अधिकांश दल बदल करने वाले विधायकों को निगम मंडल में नियुक्ति दी गई थी। इस बार भी सिंधिया समर्थक निगम मंडल में नियुक्ति को लेकर कतार में ही हैं। इस बार इन समर्थकों में हारने वाले सिंधिया समर्थक तो शामिल हैं ही, वो सिंधिया समर्थक भी शामिल हैं जिनके टिकट काट लिए गए ऐसे समर्थकों को ये उम्मीद है कि उन्हें फिर से ऐसी जगह मिलेगी जहां उनका सियासी रुतबा बरकरार होगा। इस बार इमरती देवी जैसे समर्थकों को उम्मीद है कि चुनाव जीत सकीं हो या न जीती हों, लेकिन उनका मंत्री दर्जा बरकरार रहेगा। भले ही इसके लिए बैक डोर एंट्री ही क्यों न लेनी पड़े।
आपको याद दिला दें कुछ ही महीने पहले डॉ. मोहन यादव ने सभी निगम मंडलों की नियुक्तियों को निरस्त किया था। उसके बाद से निगम मंडलों को लेकर अलग-अलग खबरें आती रही हैं। अब खबर ये आ रही है कि प्रदेश सरकार ने सभी निगम मंडलों की लिस्ट तलब की है। मंत्रालय के गलियारों में ये अटकले तेज हैं कि सरकार घाटे में चल रहे निगम मंडलों को बंद करने की तैयारी में है। कुल 46 निगम मंडलों में से ऐसे निगम मंडल छाटे जाएंगे जो सरकार पर बोझ बने हुए हैं। जिनसे न सरकार को और न ही आम जनता को कोई फायदा हो रहा हो। वित्तीय बोझ बन रहे ऐसे निगम मंडलों पर सरकार का रवैया सख्त हो सकता है।
सरकार के अलावा नियंत्रक और महालेखापरीक्षक यानी कैग ने भी घाटे में चल रहे निगम मंडलों के फाइनेंशियल स्टेट्स से जुड़ी जानकारी मांगी है। इस संबंध में सभी निगम मंडल प्रमुखों को पत्र लिख दिया गया है। जिसमें 12 बिंदुओं से जुड़ी जानकारी मांगी गई है। संभव है कि लोकसभा चुनावों से फारिग होते ही ऐसे निगम मंडलों की लिस्ट तैयार की जाए जिन्हें बंद किया जा सकता है। ये तो हुई निगम मंडलों की बात, अब चर्चा ऐसे कुछ बोर्ड्स की जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष होना तो दूर अभी तक कोई स्टाफ ही नियुक्त नहीं हुआ है। दरअसल चुनाव के मद्देनजर बहुत सारे समाजों को मैनेज करने के लिए शिवराज सरकार ने धड़ाधड़ बोर्ड गठन करने का ऐलान कर दिया था। जिसमें विश्वकर्मा, स्वर्णकला, कुश, महाराणा प्रताप, जय मीनेश, मां पूरी बाई कीर, देवनारायण जैसे कई कल्याण बोर्ड्स की घोषणा हुई थी। ये बोर्ड गठित तो हुए, लेकिन स्टाफ और ऑफिस नहीं मिला। ये बोर्ड प्रदेश के लिए कितने जरूरी हैं। आने वाले समय में बीजेपी को इससे कितना फायदा मिलेगा और प्रदेश पर ये कितना बोझ बन सके हैं। इन सब का आकलन नतीजों के बाद किया जाएगा। उस के बाद ये फैसला होगा कि इन बोर्ड्स में भी नई नियुक्ति होगी या नहीं होगी और स्टाफ दिया जाएगा या नहीं। अगर इन में से कुछ बोर्ड्स को जारी रखने का फैसला होता है तो वेटिंग लिस्ट के नेताओं के लिए कुछ विकल्प और खुल जाएंगे।
इसके अलावा बहुत से नेता ऐसे भी हैं जो राजपाल बनने के इंतजार में हैं। इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार से काफी उम्मीदें हैं। सुमित्रा महाजन, सत्यनारायण जटिया, प्रभात झा, रघुनंदन शर्मा इस फेहरिस्त में शामिल हैं। इनके अलावा हाल ही में कांग्रेस से बीजेपी में आए सुरेश पचौरी को भी ये उम्मीद है कि उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास मिलेगा।
अगर चुनाव जीते, अगर क्या उम्मीद है कि चुनाव ही जीत ही जाएंगे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया भी लोकसभा का रुख करेंगे। ऐसे में उनकी राज्यसभा की सीट भी खाली होगी। उस सीट के लिए भी लॉबिंग शुरू हो चुकी है।
सरकार के पास अपने ही नेताओं को उपकृत करने के लिए रेवड़ियां तो बहुत हैं। देखना ये है कि किसके हिस्से में कौन सी रेवड़ी आती है। वैसे निगम मंडल की नियुक्तियां सिर्फ लाभ पहुंचाने के मकसद से ही नहीं होती इसमें बड़ा राजनीतिक गेम भी छिपा होता है। किस अंचल और किस जाति के नेता की वजह से किस तरह के वोटर्स पर असर पड़ सकता है। उन समीकरणों को देखते हुए भी नियुक्तियां की जाती हैं। इसलिए हो सकता है कि सरकार कुछ निगम मंडलों में जल्दी नियुक्ति कर दे और कुछ में नियुक्ति रोककर रखे। साढ़े तीन साल बाद से फिर चुनावी सिलसिला शुरू होगा। तब हो सकता है कि सभी चुनावी समीकरणों को टटोलते हुए बची हुई नियुक्तियां की जाएं।
निगम मंडलों में नियुक्ति के लिए भी हो रही है लॉबिंग
आपको बता दूं कि निगम मंडल को लेकर फिलहाल प्रदेश के नए मुखिया डॉ. मोहन यादव का रुख कुछ अलग चल रहा है, लेकिन उम्मीद लगाने वालों को भला कौन रोक सकता है। मध्यप्रदेश में नई सरकार दिसंबर में बनी और बमुश्किल एक महीने के अंदर ही सत्ता संगठन पर केंद्र के चुनाव की चुनौती आ गई। अब मध्यप्रदेश की सभी सीटों पर मतदान पूरा हो ही चुका है। बमुश्किल एक सप्ताह बाद नतीजे भी सबके सामने होंगे। जितने भी नेता कुछ भाल होने की वेटिंग लिस्ट में हैं, उन्हें उम्मीद है कि अब उनके राजनीतिक पुनर्वास का रास्ता साफ हो गया है। ये सोचने वालों में सिर्फ बीजेपी ही नहीं, ऐसे बहुत से नेता वो भी शामिल हैं जो कांग्रेस बीजेपी शामिल हो चुके हैं। माना जा रहा है कि सियासी डील के तहत इन्हें भी पार्टी बदलने के बदले कोई प्रलोभन दिया गया होगा। जिसमें निगम मंडलों में नियुक्ति एक प्रलोभन हो सकता है। जैसे ही निगम मंडलों में नियुक्ति का रास्ता साफ हो जाएगा। उसके बाद नंबर उन नेताओं का आएगा जो किसी भी राज्य में राजपाल बनने की बाट जोह रहे हैं। निगम मंडलों में खासतौर से नेताओं की रुचि ज्यादा है। इसकी वजह ये है कि मामला प्रदेश का है और एमपी लेवल पर ही इसका फैसला भी होना है। यही वजह है कि बहुत से नेता अभी से निगम मंडल में लाभ का पद हासिल करने के लिए दौड़ धूप कर रहे हैं और बहुत से नेता लॉबिंग भी कर रहे हैं।
निगम मंडलों में नियुक्ति के दावेदार कौन
आपको ऐसे कुछ नाम बताता हूं जो निगम मंडल के दावेदारों में सबसे टॉप पर हैं। इसमें पहला नाम हितेष वाजपेयी का है जो लंबे समय तक बीजेपी सरकार में प्रवक्ता रहे हैं। इसके बाद माखन सिंह चौहान, अखिलेश्वरानंद गिरी, शैलेंद्र बरुआ, गिर्राज दंडोतिया, विनोद गोटिया, जयपाल चावड़ा, शैलेंद्र शर्मा, कृष्ण मोहन सोनी, सुनील पांड और सुल्तान सिंह शेखावन का नाम आता है। आपको याद दिला दूं इससे पहले अधिकांश निगम मंडलों पर सिंधिया समर्थकों का कब्जा था। ऐसे समर्थक जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुए थे, लेकिन 2020 का चुनाव जीत कर दोबारा सदन नहीं पहुंच पाए थे। ऐसे अधिकांश दल बदल करने वाले विधायकों को निगम मंडल में नियुक्ति दी गई थी। इस बार भी सिंधिया समर्थक निगम मंडल में नियुक्ति को लेकर कतार में ही हैं। इस बार इन समर्थकों में हारने वाले सिंधिया समर्थक तो शामिल हैं ही, वो सिंधिया समर्थक भी शामिल हैं जिनके टिकट काट लिए गए ऐसे समर्थकों को ये उम्मीद है कि उन्हें फिर से ऐसी जगह मिलेगी जहां उनका सियासी रुतबा बरकरार होगा। इस बार इमरती देवी जैसे समर्थकों को उम्मीद है कि चुनाव जीत सकीं हो या न जीती हों, लेकिन उनका मंत्री दर्जा बरकरार रहेगा। भले ही इसके लिए बैक डोर एंट्री ही क्यों न लेनी पड़े।
सरकार घाटे में चल रहे निगम मंडलों को बंद करने की तैयारी में?
आपको याद दिला दें कुछ ही महीने पहले डॉ. मोहन यादव ने सभी निगम मंडलों की नियुक्तियों को निरस्त किया था। उसके बाद से निगम मंडलों को लेकर अलग-अलग खबरें आती रही हैं। अब खबर ये आ रही है कि प्रदेश सरकार ने सभी निगम मंडलों की लिस्ट तलब की है। मंत्रालय के गलियारों में ये अटकले तेज हैं कि सरकार घाटे में चल रहे निगम मंडलों को बंद करने की तैयारी में है। कुल 46 निगम मंडलों में से ऐसे निगम मंडल छाटे जाएंगे जो सरकार पर बोझ बने हुए हैं। जिनसे न सरकार को और न ही आम जनता को कोई फायदा हो रहा हो। वित्तीय बोझ बन रहे ऐसे निगम मंडलों पर सरकार का रवैया सख्त हो सकता है।
शिवराज के द्वारा गठित बोर्ड कितने जरूरी
सरकार के अलावा नियंत्रक और महालेखापरीक्षक यानी कैग ने भी घाटे में चल रहे निगम मंडलों के फाइनेंशियल स्टेट्स से जुड़ी जानकारी मांगी है। इस संबंध में सभी निगम मंडल प्रमुखों को पत्र लिख दिया गया है। जिसमें 12 बिंदुओं से जुड़ी जानकारी मांगी गई है। संभव है कि लोकसभा चुनावों से फारिग होते ही ऐसे निगम मंडलों की लिस्ट तैयार की जाए जिन्हें बंद किया जा सकता है। ये तो हुई निगम मंडलों की बात, अब चर्चा ऐसे कुछ बोर्ड्स की जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष होना तो दूर अभी तक कोई स्टाफ ही नियुक्त नहीं हुआ है। दरअसल चुनाव के मद्देनजर बहुत सारे समाजों को मैनेज करने के लिए शिवराज सरकार ने धड़ाधड़ बोर्ड गठन करने का ऐलान कर दिया था। जिसमें विश्वकर्मा, स्वर्णकला, कुश, महाराणा प्रताप, जय मीनेश, मां पूरी बाई कीर, देवनारायण जैसे कई कल्याण बोर्ड्स की घोषणा हुई थी। ये बोर्ड गठित तो हुए, लेकिन स्टाफ और ऑफिस नहीं मिला। ये बोर्ड प्रदेश के लिए कितने जरूरी हैं। आने वाले समय में बीजेपी को इससे कितना फायदा मिलेगा और प्रदेश पर ये कितना बोझ बन सके हैं। इन सब का आकलन नतीजों के बाद किया जाएगा। उस के बाद ये फैसला होगा कि इन बोर्ड्स में भी नई नियुक्ति होगी या नहीं होगी और स्टाफ दिया जाएगा या नहीं। अगर इन में से कुछ बोर्ड्स को जारी रखने का फैसला होता है तो वेटिंग लिस्ट के नेताओं के लिए कुछ विकल्प और खुल जाएंगे।
इसके अलावा बहुत से नेता ऐसे भी हैं जो राजपाल बनने के इंतजार में हैं। इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार से काफी उम्मीदें हैं। सुमित्रा महाजन, सत्यनारायण जटिया, प्रभात झा, रघुनंदन शर्मा इस फेहरिस्त में शामिल हैं। इनके अलावा हाल ही में कांग्रेस से बीजेपी में आए सुरेश पचौरी को भी ये उम्मीद है कि उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास मिलेगा।
अगर चुनाव जीते, अगर क्या उम्मीद है कि चुनाव ही जीत ही जाएंगे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया भी लोकसभा का रुख करेंगे। ऐसे में उनकी राज्यसभा की सीट भी खाली होगी। उस सीट के लिए भी लॉबिंग शुरू हो चुकी है।
सरकार कुछ निगम मंडलों में जल्दी नियुक्ति कर दे
सरकार के पास अपने ही नेताओं को उपकृत करने के लिए रेवड़ियां तो बहुत हैं। देखना ये है कि किसके हिस्से में कौन सी रेवड़ी आती है। वैसे निगम मंडल की नियुक्तियां सिर्फ लाभ पहुंचाने के मकसद से ही नहीं होती इसमें बड़ा राजनीतिक गेम भी छिपा होता है। किस अंचल और किस जाति के नेता की वजह से किस तरह के वोटर्स पर असर पड़ सकता है। उन समीकरणों को देखते हुए भी नियुक्तियां की जाती हैं। इसलिए हो सकता है कि सरकार कुछ निगम मंडलों में जल्दी नियुक्ति कर दे और कुछ में नियुक्ति रोककर रखे। साढ़े तीन साल बाद से फिर चुनावी सिलसिला शुरू होगा। तब हो सकता है कि सभी चुनावी समीकरणों को टटोलते हुए बची हुई नियुक्तियां की जाएं।
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