नर्मदा नदी प्रदूषण पर NGT सख्त, हजारों लीटर दूध बहाने पर प्रदूषण बोर्ड से मांगी रिपोर्ट
समझें क्या है पूरा मामला
- सीहोर जिले में एक धार्मिक आयोजन के दौरान नर्मदा नदी में भारी विसर्जन हुआ।
- यहां नदी में 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियां बहाई गई थीं।
- इस गतिविधि को पर्यावरण के लिए नुकसानदेह बताते हुए याचिका दायर की गई।
- एनजीटी ने इस मामले पर केंद्रीय और राज्य प्रदूषण बोर्ड से रिपोर्ट मांगी है।
- कोर्ट जानना चाहता है कि क्या नदी में दूध बहाने से प्रदूषण फैलता है।
मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने नर्मदा नदी प्रदूषण पर चिंता जताई है। एक धार्मिक कार्यक्रम में नदी को भारी मात्रा में सामग्री चढ़ाई गई थी। इस मामले पर कोर्ट ने अब कड़ा रुख अपना लिया है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के आरोप में यह कानूनी कदम उठाया गया है।
कहां हुआ था यह आयोजन
यह पूरा मामला सीहोर जिले के सतदेव और भेरूंदा क्षेत्र का है। यहां अप्रैल के महीने में एक बड़ा धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुआ था। इस दौरान श्रद्धा के नाम पर नर्मदा नदी में करीब 11 हजार लीटर दूध बहा दिया गया। इसके साथ ही 210 साड़ियां भी पानी में विसर्जित की गई थीं।
कोर्ट में दायर हुई जनहित याचिका
इस विसर्जन के खिलाफ एनजीटी भोपाल की सेंट्रल जोन बेंच में अर्जी लगी। याचिकाकर्ता ने इसे पर्यावरण और नदी की सेहत के लिए खतरनाक बताया। शिकायत में कहा गया कि इससे पानी में प्रदूषण तेजी से फैलेगा। नदी में रहने वाले जीवों पर इसका बहुत बुरा असर होगा। साथ ही सिंचाई और पीने का पानी भी दूषित हो सकता है।
जस्टिस ने प्रदूषण बोर्ड से जवाब मांगा
इस गंभीर मामले की सुनवाई NGT की विशेष पीठ ने की। इसमें जस्टिस श्योकुमार सिंह और सुधीर कुमार चतुर्वेदी शामिल रहे। कोर्ट ने कहा कि जल प्रदूषण कानून के तहत नदी में कचरा बहाना मना है। किसी भी तरह के प्रदूषक पदार्थ को सीधे पानी में नहीं डाल सकते। पीठ ने प्रदूषण बोर्ड को इस पर गंभीर विचार करने को कहा है।
NGT ने अपने आदेश में वैज्ञानिक कारणों का भी जिक्र किया। दूध जैसे जैविक पदार्थ पानी में मिलने से गंभीर समस्या खड़ी करते हैं। इससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर बहुत तेजी से कम होने लगता है। विज्ञान की भाषा में इसे बीओडी यानी बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड बढ़ना कहते हैं। इसके कारण पानी में रहने वाली मछलियां और अन्य जीव मर सकते हैं।
एक्सपर्ट्स टीम करेगी वैज्ञानिक अध्ययन
अधिकरण ने अब सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण बोर्ड को निर्देश दिए हैं। दोनों विभागों को एक्सपर्ट्स से इस मामले का वैज्ञानिक अध्ययन कराना होगा। उन्हें कोर्ट को बताना होगा कि क्या ऐसी गतिविधियों के लिए कोई नियम हैं। अगर नियम नहीं हैं, तो क्या नए गाइडलाइंस बनाने की जरूरत है। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे का फैसला होगा।
कब होगी मामले की अगली सुनवाई
इस पूरे मामले पर अब अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी। तब तक मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अपनी पूरी रिसर्च रिपोर्ट सौंपनी होगी। कोर्ट यह तय करेगा कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बने। इस फैसले का असर भविष्य में होने वाले अन्य नदी आयोजनों पर भी पड़ेगा। नदी को बचाना बेहद जरूरी है।
FAQ
- नर्मदा नदी में दूध अर्पण करने के मामले पर एनजीटी ने क्या कार्रवाई की है?
NGT ने मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा नदी के भीतर 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियां बहाने पर कड़ा संज्ञान लिया है। एनजीटी की भोपाल बेंच ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) को आदेश जारी कर विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट मांगी है। इसे जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई तक पेश करना होगा। - नदी के पानी में बड़ी मात्रा में दूध बहाने से पर्यावरण को क्या नुकसान होता है?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नदी के पानी में इतनी भारी मात्रा में दूध बहाना बेहद नुकसानदेह है। दूध एक ऑर्गेनिक यानी कार्बनिक पदार्थ है। जब यह पानी में मिलता है, तो इसके अपघटन के लिए बैक्टीरिया पानी की ऑक्सीजन का इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड बढ़ जाती है और घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है। ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण मछलियां और अन्य जलीय जीव दम घुटने से मर जाते हैं।
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