News in Short
- ग्वालियर-चंबल, बुंदेलखंड में रसूखदारों का पंचायतों के ठेकों पर कब्जा।
- कमीशन लेकर सरपंच घर बैठे, काम करा रहे अफसर और ठेकेदार।
- प्रशासनिक स्वीकृति से लेकर भुगतान तक सब फाइलों तक सिमटा।
- भुगतान के बाद भी जमीन पर नहीं दिखते विकास और निर्माण कार्य।
- निर्माण कार्यों से कमाई के चक्कर में पंचायतें बन गई दलाली का अड्डा।
News in Detail
मध्यप्रदेश की पंचायतों में विकास कार्यों की जगह दलाली का खेल चल रहा है। ग्वालियर-चंबल अंचल और बुंदेलखंड अंचल की सैकड़ों पंचायतों में सरपंच सिर्फ नाम के रह गए हैं। असली नियंत्रण अफसरों और रसूखदार ठेकेदारों के हाथ में है। कमीशन तय होते ही सरपंच घर बैठ जाते हैं। प्रशासनिक स्वीकृति से लेकर भुगतान तक सब कुछ फाइलों में पूरा हो जाता है। लाखों के भुगतान के बाद भी जमीन पर काम नजर नहीं आता। ग्रामीण विकास योजनाओं का पैसा ठेकों के जरिए बांटा जा रहा है। ऐसे में पंचायतें दलाली का अड्डा बनकर रह गई हैं।
ठेकों पर चल रही पंचायत
ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड की पंचायतों में विकास कार्य से कमाई का खेल चल रहा है। इसके लिए केवल एक या दो निर्माण कार्यों का नहीं बल्कि पूरी पंचायत का ही ठेका हो रहा है। क्षेत्र के रसूखदार ही ठेकेदार बनकर अधिकारियों से मिलकर काम कर रहे हैं। वहीं सरपंचों तक सीधा कमीशन पहुंचा दिया जाता है। इस वजह से सरपंच केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने तक ही सिमटकर रह गए हैं। उनका कमीशन पहले से तय होता है। भुगतान मिलते ही सरपंच अपने घर बैठ जाते हैं। उन्हें न तो निर्माण की गुणवत्ता से कोई सरोकार होता है न ही विभागीय योजना में वे रुचि लेते हैं।
फाइलों में काम, जमीन पर नहीं
पंचायतों में निर्माण कार्य की हकीकत पूरी व्यवस्था को सवालों में जकड़ने वाली है। सड़क, नाली, भवन जैसे काम फाइलों से निकलकर जमीनी हकीकत ही नहीं बन पा रहे हैं। कई काम तो ऐसे हैं जिनमें एक ईंट लगे बिना ही पूरा भुगतान कर दिया गया। प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी मंजूरी, वर्क ऑर्डर और भुगतान—सब कुछ फाइलों में समय पर हो जाता है। एमबी बुक में माप दर्ज होती है, फोटो लगते हैं, पर मौके पर काम शून्य रहता है। जांच के नाम पर भी खानापूर्ति होती है। अफसर-ठेकेदार गठजोड़ के चलते शिकायतें दबा दी जाती हैं।
रसूखदार- अफसरों के आगे बेबस सरपंच
ग्राम पंचायतों में हर साल करोड़ों के निर्माण कार्य हो रहे हैं। इसमें सरपंच से लेकर जनपद के अफसरों तक तगड़ा कमीशन पहुंचता है। इसी वजह से सरपंच भी चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं। चंबल अंचल के एक सरपंच के अनुसार बिना कमीशन दिए फंड रिलीज नहीं होता। सब कुछ ऊपर से ही तय होता है। जो पंचायत या सरपंच अफसरों की गुड लिस्ट में होते हैं उन्हें ही सबसे ज्यादा काम मिलते हैं। कमीशन न देने पर कामों को स्वीकृति ही नहीं मिलती। इसी वजह से सरपंचों की भी मजबूरी होती है कि वे चुप्पी साधकर बैठे रहें।
वित्त आयोग के बजट में कमीशन की सेंध
मध्य प्रदेश में पंचायतों से चुने जाने वाले ज्यादातर सरपंच पढ़े-लिखे नहीं हैं। सबसे ज्यादा स्थिति आरक्षित वर्ग की सीटों पर बिगड़ी है। ऐसी पंचायतों में क्षेत्र के रसूखदार ही ठेकेदार बन जाते हैं। वे अधिकारियों से साठगांठ कर काम लेते हैं और बदले में कमीशन से हिस्सा बांट लेते हैं। हाल ही में पंचायतों को 15वे वित्त से लाखों रुपए मिले हैं। मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन और आवास येाजना के तहत करोड़ों का बजट मिला है। इस राशि से कमीशन का बंटवारा भी शुरू हो गया है। पंचायतों में होने वाली गड़बड़ी सोशल ऑडिट में भी दबा दी जाती है। इस वजह से सबको खबर होने के बाद भी जिम्मेदार कार्रवाई से बच निकलते हैं।
ये हैं पंचायतों की ठेकेदारी की हकीकत
18 लाख की सड़क गायब
मेहगांव जनपद की ग्राम पंचायत रूरई में 2024-25 में 18 लाख रुपये की सीसी रोड स्वीकृत हुई। एमबी बुक में माप दर्ज, फोटो लगे, भुगतान पूरा। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में आज तक काम शुरू नहीं हुआ। सरपंच ने बताया, जनपद से कहा गया कि फलां ठेकेदार को काम दो, कमीशन दो। मैंने दस्तखत कर दिए।
12 लाख की नाली सिर्फ फाइलों में
सेंवढ़ा जनपद की पंचायत बरकरी में 12 लाख की नाली निर्माण के लिए राशि निकली। मौके पर एक भी ईंट नहीं लगी, लेकिन तकनीकी स्वीकृति, मूल्यांकन और अंतिम भुगतान सब हो गया। जनपद सीईओ की जांच में फर्जीवाड़ा पकड़ा गया, पर कार्रवाई नहीं हुई। ठेकेदार स्थानीय विधायक का करीबी बताया जा रहा है।
सामुदायिक भवन का अता-पता नहीं
बड़ामलहरा जनपद की ग्राम पंचायत कदवानी में 15वें वित्त से 22 लाख का सामुदायिक भवन स्वीकृत हुआ। एमबी में प्लास्टर तक पूरा दिखाया गया। ग्रामीण बताते हैं कि नींव भी नहीं खुदी। सरपंच का कहना है, एई-एसडीओ ने कहा साइन करो, पैसा आ जाएगा। कमीशन कटकर 16 लाख मिले, वो भी ठेकेदार ले गया।
पीएम आवास की किश्त हड़प ली
जतारा जनपद की पंचायत लिधौरा में 8 हितग्राहियों के पीएम आवास की दूसरी-तीसरी किश्त ठेकेदार ने अफसरों से मिलकर निकाल ली। हितग्राहियों के खाते में पैसा आया ही नहीं। कागजों पर मकान पूर्ण दिखाकर जियो टैग भी कर दिया गया। हितग्राही आज भी झोपड़ी में रह रहे हैं। कलेक्टर से शिकायत पर जांच चल रही है।
मनरेगा में फर्जी मस्टर रोल
पोरसा जनपद की पंचायत धनेला में मनरेगा के तहत तालाब गहरीकरण में 42 लाख का भुगतान हुआ। मस्टर रोल में 200 मजदूर दर्ज, पर गांव में किसी ने काम नहीं देखा। जेसीबी से काम कराकर फर्जी हाजिरी भर दी गई। राशि सीधे ठेकेदार के खाते में गई। सरपंच ने 2 लाख कमीशन लेकर चुप्पी साध ली।
कैसे चलता है पूरा खेल
1. ठेका तय: जनपद-जिला स्तर पर रसूखदार ठेकेदारों की सूची बनती है। सरपंच को फोन जाता है।
2. कमीशन फिक्स: 15 से 30% कमीशन तय। सरपंच को 2-5% देकर घर बैठा दिया जाता है।
3. फाइलों में काम: एई-एसडीओ एमबी भरते हैं, फोटो लगाते हैं, बिल पास होता है।
4. भुगतान पूरा: ट्रेजरी से राशि निकलते ही बंदरबांट। जमीन पर काम जीरो।
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