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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने सनातन धर्म में सुधार की आवश्यकता जताई।
- धीरेंद्र शास्त्री ने निंदा और कुरीतियों को खत्म करने पर जोर दिया।
- मंदिरों का जीर्णोद्धार जरूरी है, नए मंदिर बनाना पर्याप्त नहीं।
- पिकनिक स्पॉट बनने के बजाय मंदिरों को आस्था का केंद्र बनाना चाहिए।
- पंडित शास्त्री ने कहा कि हम संत नहीं बने, आचरण से बनेंगे।
NEWS IN DETAIL
INDORE. धार दौरे के लिए सोमवार 2 फरवरी को इंदौर पहुंचे बाबा बागेश्वर धाम पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने एयरपोर्ट पर मीडिया से बात की। इस दौरान उन्होंने सनातन धर्म की कई कमियों पर खुलकर बोला। साथ ही कहा कि हम अभी संत नहीं बन पाए हैं।
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खुद को सुधारने की कोशिश करे सनातनी
पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि दूसरों की निंदा करने की बजाय हमें अपने आत्मसुधार पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर हर सनातनी खुद को सुधारने की कोशिश करेगा तो सनातन धर्म और भी मजबूत बनेगा। इसके अलावा, उन्होंने कई कमियों का जिक्र किया जिनमें सबसे प्रमुख कुरीतियां और रूढ़ीवादिता शामिल हैं।
निंदा और विवाद: पंडित शास्त्री ने कहा, "साधू समाज में निंदा का प्रचलन बहुत बढ़ गया है, जो सनातन धर्म के लिए घातक है।"
पुरानी कुरीतियां: उन्होंने बलि प्रथा और अन्य पुरानी कुरीतियों को हटाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
मंदिरों का जीर्णोद्धार: नए मंदिर तो बन रहे हैं, लेकिन पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार नहीं हो रहा है, जो एक बड़ी कमी है।
मंदिरों का उद्देश्य: पंडित शास्त्री ने कहा कि मंदिर अब सिर्फ पिकनिक स्पॉट बनते जा रहे हैं, जबकि इनका असली उद्देश्य आस्था का केंद्र होना चाहिए।
वैश्विक ज्ञान का अभाव: "हम सब एक-दूसरे को ज्ञान देते हैं, लेकिन हमें विश्व को ज्ञान देने की सोच नहीं रखते।"
मैं किसी मजहब के खिलाफ या पक्ष में नहीं
पंडित शास्त्री ने साफ किया कि वह किसी भी मजहब के खिलाफ नहीं हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ सनातन धर्म की अच्छाइयों को बढ़ावा देना है। "हम सिर्फ सनातन के पक्ष में हैं और सच बोलने से कभी चूकते नहीं," उन्होंने कहा।
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आचरण से बनेंगे संत:
पंडित शास्त्री ने कहा कि संतों के विवाद पर बोलने की औकात हमारी नहीं है, क्योंकि हम अभी संत नहीं बन पाए हैं। हम वाणी से नहीं आचरण से संत बनना चाहते हैं।
आचरण से बनने के लिए हम अभी संत नहीं बन पाए हैं और जब नहीं बन पाए हैं तो हम किसी संत पर टिप्पणी भी नहीं कर सकते हैं। इतना कह सकते हैं कि जो देख पा रहे हैं भला नहीं है, अच्छा नहीं है बुरा लग रहा है। हमारे गांव में कहावत है कि अपनी जांघ निकालने से अपनी हंसी होगी।
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