पुलिस की ड्यूटी 55 जिलों में, इलाज का नेटवर्क क्यों रह गया पीछे? कैशलेस सुरक्षा में अस्पतालों की पहुंच बनी बड़ा सवाल

Ramanand Tiwari | Oct 04, 2026, 22:37 IST
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एमपी के पुलिसकर्मी 55 जिलों में ड्यूटी करते हैं, इसलिए उनके परिवारों के इलाज के लिए अस्पतालों तक आसान पहुंच जरूरी है।
एमपी के पुलिसकर्मी 55 जिलों में ड्यूटी करते हैं, इसलिए उनके परिवारों के इलाज के लिए अस्पतालों तक आसान पहुंच जरूरी है।

मध्य प्रदेश पुलिसकर्मी प्रदेश के 55 जिलों में ड्यूटी करते हैं। उनके परिवारों के इलाज में अस्पतालों की पहुंच अहम है। मई 2026 में स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की समीक्षा हुई। तब कुल 59 निजी अस्पताल अनुबंधित बताए गए थे। पुलिस मुख्यालय ने अधिक अस्पताल जोड़ने पर जोर दिया है। गंभीर बीमारी में नजदीकी इलाज मिलना योजना की असली कसौटी है।

पुलिसकर्मी प्रदेशभर में तैनात

कानून-व्यवस्था से लेकर रात की गश्त तक पुलिसकर्मी प्रदेशभर में तैनात हैं, लेकिन उनके परिवार की गंभीर बीमारी सामने आए तो इलाज के विकल्प हर जगह समान नहीं हैं। मई 2026 में पुलिस स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की समीक्षा में खुद पुलिस मुख्यालय ने अधिक निजी अस्पतालों को जोड़ने पर जोर दिया था। तब योजना में प्रदेश के भीतर 55 और बाहर चार निजी अस्पताल अनुबंधित बताए गए थे।

ड्यूटी का दायरा बड़ा, अस्पताल नेटवर्क पर सवाल

मध्यप्रदेश पुलिस स्वास्थ्य सुरक्षा योजना पुलिसकर्मियों (Madhya Pradesh Police Health Security Scheme ) और उनके आश्रित परिवारों को गंभीर बीमारी के दौरान आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से संचालित है। योजना नई नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इसे 2013 में लागू किया गया था। लेकिन अब असली सवाल योजना के अस्तित्व का नहीं, उसकी भौगोलिक पहुंच का है।

मई 2026 में डीजीपी कैलाश मकवाना (DGP Kailash Makwana ) की अध्यक्षता में हुई न्यासी मंडल की बैठक में प्रदेश के ज्यादा से ज्यादा शासकीय मान्यता प्राप्त निजी अस्पतालों को योजना से जोड़ने पर जोर दिया गया।

उस समय प्रदेश के भीतर 55 और बाहर चार, यानी कुल 59 निजी अस्पतालों से अनुबंध होने की जानकारी सामने आई थी। यानी पुलिस मुख्यालय ने भी यह जरूरत महसूस की कि पुलिसकर्मियों को अपने जिले या नजदीकी क्षेत्र में कैशलेस उपचार उपलब्ध कराने के लिए नेटवर्क बढ़ाया जाना चाहिए।

गंभीर बीमारी में दूरी क्यों बने परेशानी?

पुलिसकर्मी की पोस्टिंग राजधानी या बड़े शहर तक सीमित नहीं रहती है। थाना, चौकी, बटालियन और दूसरी इकाइयों में कर्मचारी दूरदराज क्षेत्रों तक पदस्थ होते हैं। ऐसे में गंभीर बीमारी के लिए योजना से जुड़ा उपयुक्त अस्पताल आसपास न होना व्यावहारिक परेशानी बन सकता है। मरीज को दूसरे शहर ले जाने में समय, यात्रा और परिवार की व्यवस्था का अतिरिक्त दबाव जुड़ जाता है। यही कारण है कि अस्पतालों की कुल संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वे किन जिलों और क्षेत्रों में उपलब्ध हैं।

राहत का प्रावधान भी, लेकिन नेटवर्क का विकल्प नहीं

बैठक में योजना के कुछ नियमों को व्यावहारिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय भी सामने आए। हार्ट अटैक और गंभीर सड़क दुर्घटना जैसी आकस्मिक परिस्थितियों में गैर-अनुबंधित अथवा गैर-मान्यता प्राप्त निजी अस्पताल में मरीज के स्थिर होने तक कैशलेस इलाज की व्यवस्था का निर्णय लिया गया।

इसके अलावा ड्यूटी के दौरान घायल पुलिसकर्मियों तथा कैंसर, किडनी-लीवर ट्रांसप्लांट और ओपन हार्ट सर्जरी जैसे गंभीर मामलों में चिकित्सा प्रतिपूर्ति के बाद बची पात्र राशि को योजना निधि से देने की व्यवस्था भी सामने आई। गंभीर मामलों में सहायता की सीमा 14 लाख रुपये तक बताई गई। ये प्रावधान राहत देते हैं, लेकिन नियमित और व्यापक अस्पताल नेटवर्क की जरूरत को खत्म नहीं करते।

जीतू पटवारी पर फेक वीडियो चलाने का आरोप, यादव समाज ने की FIR की मांग | Allegations against Jitu Patwari for running fake video, Yadav community demands FIR
जीतू पटवारी पर टीकमगढ़ घटना का फेक वीडियो चलाने के आरोप, यादव समाज ने की एफआईआर की मांग
04 Oct 2026 ,
By Sanjay Gupta
Indore. मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी टीकमगढ़ शराब घटना का वीडियो चलाकर उलझ गए हैं। वहीं, अब यह वीडियो फेक होने के आरोप लगे हैं। पटवारी पर फेक वीडियो चलाकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को बदनाम करने का आरोप लगा है। वहीं, इसे लेकर यादव समाज ने पटवारी के खिलाफ एफआईआर की मांग की है।
Indore. मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी टीकमगढ़ शराब घटना का वीडियो चलाकर उलझ गए हैं। वहीं, अब यह वीडियो फेक होने के आरोप लगे हैं। पटवारी पर फेक वीडियो चलाकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को बदनाम करने का आरोप लगा है। वहीं, इसे लेकर यादव समाज ने पटवारी के खिलाफ एफआईआर की मांग की है।

पहले भी इलाज को लेकर सामने आया था विवाद

अगस्त 2025 में भोपाल के एक आरक्षक से जुड़ा मामला मीडिया में आया था, जिसमें पुलिस स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत अस्पताल में कैशलेस इलाज नहीं मिलने का दावा किया गया था। बाद में संबंधित पुलिसकर्मी द्वारा वरिष्ठ अधिकारी से सीधे संपर्क करने को लेकर विभागीय प्रक्रिया पर भी सवाल उठे थे।

यह मामला अलग परिस्थितियों का था, इसलिए इसे पूरे सिस्टम का प्रतिनिधि उदाहरण नहीं माना जा सकता। फिर भी यह बताता है कि कागज पर उपलब्ध योजना और अस्पताल स्तर पर उसके क्रियान्वयन के बीच समन्वय बेहद महत्वपूर्ण है।

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<br />देश के आईआईटी में पढ़ाई छोड़ने वाले विद्यार्थियों का आंकड़ा फिर चर्चा में है। NTF की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 से 2023 के बीच IIT में ड्रॉपआउट हुए हैं। इस दौरान एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के तीन हजार 542 विद्यार्थियों ने पढ़ाई छोड़ी है। इन आंकड़ों के बीच मध्य प्रदेश के लिए राहत की खबर सामने आई है। <br />

अब असली कसौटी अस्पताल कितनी तेजी से जुड़ेंगे?

पुलिस मुख्यालय की मई 2026 की बैठक का संदेश साफ था स्थानीय स्तर पर अधिक अस्पतालों से समन्वय कर प्रस्ताव भेजे जाएं। इसलिए अब निगाह केवल सहायता राशि पर नहीं, बल्कि अस्पताल नेटवर्क के वास्तविक विस्तार पर भी रहनी चाहिए। किस जिले में कितने अस्पताल उपलब्ध हैं, नए अस्पताल कब जुड़े और पुलिस परिवार को अपने जिले में इलाज मिला या नहीं योजना की उपयोगिता का व्यावहारिक आकलन इन्हीं सवालों से होगा।
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