पोषण आहार में 270 करोड़ का घाटा या खेल? 7 प्लांट बंद, गोदामों में पड़ा करोड़ों का माल
Amresh Kushwaha | Sept 05, 2026, 11:20 IST
पोषण आहार में 270 करोड़ का घाटा
मध्य प्रदेश में पोषण आहार आपूर्ति का जिम्मा महिला स्वसहायता समूहों से छीनकर निजी कंपनियों को देने की तैयारी है। 270 करोड़ के घाटे की वजह से 7 सहकारी प्लांट बंद हो चुके हैं।
पोषण आहार में 270 करोड़ का घाटा या खेल? 7 प्लांट बंद, गोदामों में पड़ा करोड़ों का माल
समझें क्या है पूरा मामला...
- सरकार पोषण आहार सप्लाई का काम निजी कंपनियों को देने जा रही है।
- महिला स्वसहायता समूहों से यह जिम्मेदारी छीनी जा रही है।
- वजह बताई गई करीब 270 करोड़ रुपए का घाटा।
- पड़ताल में यह घाटा सुनियोजित होने के संकेत मिले हैं।
- सात सहकारी प्लांट बंद हैं, करोड़ों का सामान अटका है।
घाटे की असली कहानी
जब काम छीनने की वजह पक्की करनी थी, तभी इसी घाटे को कैबिनेट के सामने बड़ा दिखाया गया। सूत्रों के मुताबिक 2024-25 और 2025-26 के बीच घाटा 150 करोड़ रुपए बढ़ गया। यानी यह लगभग दोगुना हो गया।
दिसंबर के बाद क्या हुआ
इसे महिला बाल विकास विभाग को सौंपने की योजना बनी थी। दिलचस्प बात यह है कि यह विभाग पहले भी यह काम संभाल चुका है। उस समय कैग (Comptroller and Auditor General) ने इसमें करोड़ों रुपए के घोटाले पकड़े थे।
80 करोड़ का हिसाब नहीं
प्लांटों में करीब 20 करोड़ रुपए का कच्चा माल फंसा हुआ है। इसमें अनाज, दालें और मसाले शामिल हैं। इसी बीच एमपी एग्रो का बाड़ी प्लांट भी अगस्त 2024 से बंद पड़ा है।
इस प्लांट को 2021-22 और 2022-23 में हर महीने 50 लाख रुपए का घाटा हुआ था। रेसिपी नहीं बदली गई और उत्पादन लागत बढ़ती गई। अब सरकार ने केंद्र को रेट रिवाइज करने का प्रस्ताव भेजा है।
पुराने रेट पर राशन, नुकसान सप्लायरों को
गंभीर कुपोषित और कम वजन वाले बच्चों के लिए 12 रुपए तय थे। वहीं, असल में सामान बनाने की लागत इससे कहीं ज्यादा थी। सप्लायर लगातार दाम बढ़ाने की मांग करते रहे। उन्हें हर बार कहा गया कि पहले सामान दें, पैसा बाद में मिलेगा। अब परेशान सप्लायर कोर्ट पहुंच गए हैं। सरकार अब उनकी रकम लौटाने की कोशिश में जुटी है।
मैनेजमेंट में भी बड़ी खामियां
फिर भी कई जनपद सीईओ ने प्रभाव का इस्तेमाल कर खुद को प्लांट सीईओ बनवा लिया। हर महीने जरूरत सिर्फ 9500 से 10 हजार टन पोषण आहार की थी। लेकिन सातों प्लांटों की कुल क्षमता 15 हजार टन थी।
इस अतिरिक्त क्षमता का व्यावसायिक इस्तेमाल भी किया जा सकता था। इसके अलावा प्लांट को पूरे महीने चलाने की बजाय जरूरत के हिसाब से चलाया जा सकता था। इससे लागत भी कम आती।
अफसरों की राय अलग-अलग
पूर्व सीईओ केदार सिंह आईएएस यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस अधिकारी हैं। वे सिर्फ छह महीने इस पद पर रहे। उनके मुताबिक एमपी के मंत्री प्रह्लाद पटेल ने प्लांट को मुनाफे में लाने का निर्देश दिया था। उनका सुझाव था कि अतिरिक्त मशीनरी से दलिया बनाकर कहीं और बेचा जा सकता था। उनका कहना है कि सरकार की कोई भी चीज घाटे में नहीं जानी चाहिए।
दीपक आर्य सिर्फ डेढ़ महीने सीईओ रहे। उन्होंने कहा कि इतने कम समय में वे ज्यादा कुछ नहीं बता सकते। वहीं मनोज पुष्प और हर्षिका सिंह ने भी इस विषय पर बोलने से इनकार कर दिया। गौर करने वाली बात यह है कि हर्षिका सिंह के कार्यकाल 2024-25 से 2025-26 के बीच ही घाटा सबसे ज्यादा बढ़ा।
आगे क्या होना बाकी है
यदि रेट समय पर बढ़ाए जाते तो शायद यह नौबत ही नहीं आती। अब सरकार को प्लांटों के भविष्य पर जल्द फैसला लेना होगा। साथ ही फंसे सामान और सप्लायरों के भुगतान का हल निकालना जरूरी है।
यह खबर क्यों जरूरी है
इसमें किसी व्यक्ति या पद के खिलाफ पूर्वाग्रह नहीं रखा गया है। मकसद सिर्फ तथ्य सामने लाना और जवाबदेही तय करना है। महिला स्वसहायता समूहों की आजीविका से जुड़ा यह विषय सामाजिक न्याय से भी जुड़ता है।
FAQ
- एमपी के पोषण आहार में 270 करोड़ का घाटा किस वजह से हुआ?
सात सहकारी प्लांटों में 2018 की तय दर पर ही 2026 तक पोषण आहार बनाया गया। इस दौरान लागत लगातार बढ़ती गई, लेकिन रेट नहीं बदले गए। इससे हर साल घाटा बढ़ता गया और 2024-25 से 2025-26 के बीच यह दोगुना हो गया। मध्यप्रदेश सरकार अब पोषण आहार का काम किसे सौंपने की तैयारी में है?
सरकार महिला स्वसहायता समूहों से यह काम लेकर निजी कंपनियों को सौंपने की योजना बना रही है। इससे पहले यह काम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन यानी एसआरएलएम से लेकर महिला बाल विकास विभाग को देने का फैसला हुआ था।
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