SAGA ग्रुप पर ED का छापा, 1.53 करोड़ कैश समेत 30 करोड़ की संपत्ति जब्त
Pawan Modiya | Aug 18, 2026, 22:38 IST
सागा ग्रुप
SAGA ग्रुप पोंजी घोटाले में ED ने मुंबई और भोपाल में छापे मारे। जांच में नकदी, विदेशी मुद्रा, आभूषण और निवेश से जुड़े दस्तावेज मिले। एजेंसी ने 50 से अधिक शेल कंपनियों के नेटवर्क का दावा किया है।
समझें क्या है पूरा मामला
- ED ने SAGA ग्रुप से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की।
- मुंबई और भोपाल के आवासीय तथा व्यावसायिक परिसर जांचे गए।
- ग्रुप पर निवेशकों से 10 हजार करोड़ रुपए जुटाने का आरोप है।
- जांच में 50 से अधिक शेल कंपनियों का नेटवर्क मिला।
- मुख्य नियंत्रक समीर अग्रवाल विदेश में फरार बताया गया है।
तलाशी अभियान 13 से 16 अगस्त 2026 के बीच चला। इसमें कई आवासीय और व्यावसायिक परिसरों की जांच हुई। ED ने भारी मात्रा में वित्तीय दस्तावेज मिलने का दावा किया है। डिजिटल उपकरण और संपत्ति संबंधी रिकॉर्ड भी जांचे गए हैं।एजेंसी का दावा अभी अदालत में साबित होना बाकी है। मामले में अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया से होगा।
छापों में क्या-क्या मिला
एजेंसी ने वित्तीय निवेश से जुड़े दस्तावेज भी जब्त किए। इनमें सूचीबद्ध शेयर और सिक्योरिटीज का रिकॉर्ड शामिल है। इन शेयरों और सिक्योरिटीज की कीमत 30 करोड़ रुपए से अधिक बताई गई। म्यूचुअल फंड निवेश के दस्तावेज भी मिले हैं।
एलआईसी (Life Insurance Corporation) पॉलिसियों से जुड़े रिकॉर्ड भी जांच में आए। कई बैंक खातों में मौजूद रकम की जानकारी मिली। जांच में नौ महंगी गाड़ियों का विवरण भी सामने आया। इनके भुगतान और वास्तविक मालिकों की जांच जारी है। ED ने इसे कथित अपराध की कमाई से जुड़ी संपत्ति बताया। यह दावा अदालत की जांच के अधीन रहेगा।
कैसे जुटाया गया पैसा
मासिक आय देने वाली योजनाएं भी चलाई गईं। निवेशकों को तय समय पर अधिक लाभ का भरोसा दिया गया। कई निवेशकों को तीन से पांच साल का समय बताया गया। रकम दोगुनी या तिगुनी होने का दावा किया गया। कुछ लोगों को महंगी कार देने का भरोसा भी मिला। स्थानीय एजेंट इन दावों का प्रचार करते थे।
जांच एजेंसी के अनुसार इन वादों का मजबूत कारोबारी आधार नहीं था। पर्याप्त आय देने वाला व्यवसाय भी नहीं मिला। ED ने कथित फर्जी बैंकिंग ढांचे का दावा किया है। आकर्षक रिटर्न से लोगों का भरोसा जीतने की कोशिश हुई।
पोंजी मॉडल कैसे चला
एजेंटों को नए निवेश पर कमीशन दिया जाता था। इससे नेटवर्क गांवों और छोटे शहरों तक पहुंचा नए निवेश से पहले निवेशकों को ऊंचा रिटर्न दिखाया गया। जोखिम और नियामक स्थिति स्पष्ट नहीं बताई गई। ED के अनुसार वास्तविक कारोबार से पर्याप्त आमदनी नहीं हो रही थी। इसके बावजूद बड़े रिटर्न के वादे जारी रहे।
निवेश की अधिकांश रकम कथित रूप से दूसरी जगह भेजी गई। कुछ रकम निजी लाभ के लिए इस्तेमाल हुई। कमीशन और प्रचार पर भी निवेशकों का पैसा खर्च हुआ। इससे पूरी व्यवस्था नए निवेश पर निर्भर होती गई। नया निवेश रुकने पर भुगतान व्यवस्था बिगड़ने लगी। इसके बाद कई निवेशकों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
50 शेल कंपनियों का जाल
ED के अनुसार निवेशकों का पैसा इन कंपनियों में भेजा गया। इसके लिए कई बैंक खातों का इस्तेमाल हुआ। रकम को अलग-अलग खातों में बार-बार भेजा गया। इससे पैसे के असली स्रोत को छिपाने का प्रयास हुआ। कुछ रकम कथित हवाला चैनलों से भेजी गई। हवाला लेनदेन औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था के बाहर होता है।
जांच एजेंसी को देश के भीतर निवेश के संकेत मिले हैं। विदेशों में संपत्ति खरीदने की संभावना भी जांची गई। चल और अचल संपत्तियों में निवेश का रिकॉर्ड मिला। इनके भुगतान का निवेशक रकम से संबंध खोजा जा रहा है। ED बैंक खातों और कंपनी रिकॉर्ड का मिलान कर रही है। निदेशकों और लाभार्थी मालिकों की पहचान भी की जा रही है।
समीर अग्रवाल की भूमिका
ED पहले दो अस्थायी कुर्की आदेश जारी कर चुकी है। इनके तहत कई संपत्तियों पर कार्रवाई हुई। अस्थायी कुर्की का मतलब अंतिम जब्ती नहीं होता। अदालत और सक्षम प्राधिकरण इसकी आगे समीक्षा करते हैं। समीर अग्रवाल या उनके वकील का नया पक्ष उपलब्ध नहीं है। उनका जवाब मिलने पर आरोपों की स्थिति स्पष्ट होगी।
रवि तिवारी पर कार्रवाई
अगले दिन उन्हें दिल्ली की अदालत में पेश किया गया। अदालत ने दस दिन की ED हिरासत मंजूर की थी। एजेंसी ने उनके बैंक खातों में बड़ी रकम मिलने का दावा किया। यह रकम SAGA ग्रुप की कंपनियों से आई थी।
ED के अनुसार रकम का संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। उनके परिवार से जुड़े खातों की भी जांच हुई। जांच में कई मकान और व्यावसायिक संपत्तियां सामने आईं। इनके भुगतान का स्रोत भी खंगाला जा रहा है।
ED ने 24 जुलाई को विशेष अदालत में शिकायत दाखिल की। आरोपों पर अदालत का अंतिम निर्णय अभी बाकी है। रवि तिवारी को अपना पक्ष रखने का कानूनी अधिकार है। गिरफ्तारी को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।
जांच कहां से शुरू हुई
एलयूसीसी (Loni Urban Multi State Credit and Thrift Cooperative Society) भी जांच में शामिल है। इससे जुड़ी दूसरी सहकारी समितियां भी जांच के दायरे में हैं। लस्टीनेस जनहित क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी पर भी आरोप लगे। ऑप्शन वन इंडस्ट्रीज का नाम भी मामलों में आया।
ED का अनुमान करीब 10,314 करोड़ रुपए की कथित गड़बड़ी का है। देशभर के 30.51 लाख निवेशक प्रभावित बताए गए हैं। हालांकि विभिन्न एजेंसियों की जांच का दायरा अलग है। उत्तराखंड में एलयूसीसी की रकम अलग आंकी गई है।
केंद्रीय जांच ब्यूरो ने उत्तराखंड वाले मामलों की जांच की। वहां लगभग 800 करोड़ रुपए जमा होने का दावा है।
निवेशकों पर कितना असर
जांच एजेंसियां निवेश और संपत्तियों का पूरा हिसाब बना रही हैं। फ्रीज संपत्तियों से वसूली की संभावना देखी जाएगी। निवेशकों को अपने सभी दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। जमा पर्ची और बैंक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
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