फर्जी SC सर्टिफिकेट मामले में डीन निलंबित, सागर यूनिवर्सिटी में 20 साल बाद खुला राज
Jitendra Shrivastava | Aug 08, 2026, 23:38 IST
Photograph: (THESOOTR)
SAGAR. सागर के हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में डीन प्रो. भगवत निलंबित। 2005 में SC आरक्षित पद पर नियुक्ति, जांच में प्रमाण पत्र अमान्य पाया गया।
समझें क्या है पूरा मामला...
- 20 साल पुराने SC प्रमाण पत्र पर उठा बड़ा सवाल।
- सागर यूनिवर्सिटी के डीन निलंबित, आरोप गंभीर।
- छत्तीसगढ़ के प्रमाण पत्र की पुष्टि नहीं हो सकी।
- डीन ने कहा, यह पूरी कार्रवाई प्रतिशोध है।
- जांच रिपोर्ट के बाद प्रोफेसर पर गिरी गाज।
मध्य प्रदेश के सागर स्थित डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहा विवाद अब बड़ी कार्रवाई तक पहुंच गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बिजनेस मैनेजमेंट विभाग के प्रोफेसर श्री भगवत को निलंबित कर दिया है। उन पर फर्जी अनुसूचित जाति यानी SC (Scheduled Caste) के फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर नौकरी पाने का आरोप है। प्रो. भगवत फिलहाल स्कूल ऑफ कॉमर्स एंड मैनेजमेंट के डीन भी हैं।
विश्वविद्यालय ने इस मामले की जांच के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई थी। कमेटी ने दस्तावेजों और रिकॉर्ड के सत्यापन के बाद अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी। इसी रिपोर्ट के आधार पर अब अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है।
2005 में हुई थी नियुक्ति
कमेटी ने पाया कि प्रो. भगवत ने नियुक्ति के समय छत्तीसगढ़ का SC प्रमाण पत्र पेश किया था। कमेटी ने इसका सत्यापन संबंधित प्राधिकारी से कराने की कोशिश की। लेकिन छत्तीसगढ़ के अधिकारियों ने बताया कि यह प्रमाण पत्र उनके रिकॉर्ड से जारी ही नहीं हुआ है। यानी लगभग दो दशक पुराने दस्तावेज पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
यूपी में OBC श्रेणी में आने का दावा
रिपोर्ट के आधार पर कमेटी ने प्रो. भगवत के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की सिफारिश की है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसी सिफारिश के आधार पर निलंबन का आदेश जारी किया। यह पूरा मामला अभी जांच के दायरे में है, इसलिए अंतिम फैसला आना बाकी है।
डीन पद पर बने रहने से जांच प्रभावित होने की आशंका
एक वरिष्ठ प्रशासनिक पद पर रहते हुए जांच से जुड़े रिकॉर्ड तक पहुंच बनी रहती है। यही वजह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच पूरी होने तक उन्हें पद से हटाना जरूरी समझा। इससे जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने की कोशिश की गई है।
निलंबन आदेश के मुताबिक आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई अनुशासनात्मक प्राधिकारी करेंगे। अंतिम फैसला विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद लेगी। जांच पूरी होने तक प्रो. भगवत का मुख्यालय विश्वविद्यालय ही रहेगा।
प्रो. भगवत ने कार्रवाई को बताया प्रतिशोधात्मक
प्रो. भगवत ने आरोप लगाया कि यह पूरी कार्रवाई प्रतिशोध की भावना से की गई है। उनके मुताबिक कुलपति निजी स्वार्थ के चलते यह कदम उठा रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि वे इस मामले में जबलपुर हाईकोर्ट का रुख करेंगे और वहां न्याय की उम्मीद रखते हैं।
फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से इन आरोपों पर कोई अलग से प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। जांच से जुड़े दस्तावेज और कमेटी की रिपोर्ट अभी आंतरिक स्तर पर ही समीक्षा के दायरे में बताई जा रही है।
आगे क्या होगा
यह घटना एक बार फिर आरक्षण प्रणाली में जाति प्रमाण पत्रों के सत्यापन से जुड़े सवाल खड़े करती है। लंबे समय बाद सामने आए ऐसे मामले नियुक्ति प्रक्रिया की निगरानी को लेकर भी नई बहस छेड़ते हैं। फिलहाल सागर विश्वविद्यालय में यह मामला चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है, और आने वाले दिनों में इस पर और स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।
एक्सपर्ट कोट्स
भगवत के मुताबिक जांच कमेटी 30 जुलाई को बनी और सिर्फ चार दिन में 3 अगस्त को रिपोर्ट सौंप दी गई, जिसे उन्होंने जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया। उन्होंने इस पूरी कार्रवाई को प्रतिशोध की भावना से प्रेरित बताते हुए कहा कि वे इस मामले में जबलपुर हाईकोर्ट का रुख करेंगे।
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