सांदीपनि मॉडल से बदल रही सरकारी शिक्षा की तस्वीर, छोटे स्कूलों पर संकट
Ramanand Tiwari | Sept 05, 2026, 22:47 IST
सांदीपनि मॉडल से बदल रही सरकारी शिक्षा
मध्य प्रदेश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था का फोकस अब छोटे स्कूलों के बजाय बड़े, सुविधायुक्त सांदीपनि विद्यालयों पर होता दिख रहा है। 15 हजार से ज्यादा स्कूलों में 20 से कम बच्चे हैं। अगले पांच साल में करीब 7 हजार स्कूलों के मर्ज होने की संभावना है।
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश के 15 हजार 170 स्कूलों में कम बच्चे हैं।
- इन स्कूलों में 20 से कम विद्यार्थी पढ़ते हैं।
- सरकार 773 सांदीपनि विद्यालय विकसित करेगी।
- योजना पर 24 हजार 915 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
- सरकारी स्कूलों की संख्या लगातार कम हुई है।
अगले पांच साल में 7 हजार पर नजर
इसी बदलाव के बीच 15 हजार 170 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां 20 से भी कम बच्चे पढ़ रहे हैं। अब छोटे स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मिलाने की संभावित रणनीति ने सवाल खड़ा किया है। क्या बेहतर शिक्षा का रास्ता स्कूल बड़ा करने से निकलेगा या बच्चे के घर के पास स्कूल बचाए रखने से?
बड़े स्कूलों का मॉडल, छोटे स्कूलों की परीक्षा
इन स्कूलों में बेहतर सुविधाएं, ज्यादा क्षमता और आसपास के विद्यार्थियों को एक जगह पढ़ाने की व्यवस्था तैयार की जा रही है। दोनों चरण पूरे होने के बाद करीब 8.48 लाख विद्यार्थियों के लिए क्षमता तैयार करने का लक्ष्य है।
यानी सरकारी शिक्षा का मॉडल अब छोटे-छोटे स्कूलों में संसाधन बांटने के बजाय बड़े और सुविधायुक्त संस्थानों पर ज्यादा केंद्रित होता दिखाई दे रहा है।
असली सवाल उन गांवों का है, जहां बच्चे कम हैं
सरकार के सामने तर्क यह है कि बहुत कम बच्चों वाले स्कूलों में शिक्षक और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम हो रहा है। ऐसे स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों से जोड़ने पर शिक्षकों और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
लेकिन ग्रामीण इलाकों में तस्वीर सिर्फ आंकड़ों से तय नहीं होती। एक किलोमीटर की दूरी और पांच किलोमीटर की दूरी कागज पर छोटी लग सकती है, लेकिन छोटे बच्चों के लिए यही दूरी रोज स्कूल जाने की बड़ी बाधा बन सकती है।
सांदीपनि स्कूलों पर बड़ा निवेश
पहले चरण पर करीब 13 हजार 525 करोड़ खर्च होने का प्लान है। इसमें करीब 4.43 लाख विद्यार्थियों को प्रवेश देने का लक्ष्य रखा गया है।
दूसरे चरण में 405 विद्यालय प्रस्तावित हैं। इन पर 11 हजार 390 करोड़ से ज्यादा खर्च होने की योजना है। दोनों चरण मिलाकर सरकारी शिक्षा के इस नए मॉडल पर करीब 24 हजार 915 करोड़ का निवेश प्रस्तावित है।
बदल गई सरकारी स्कूलों की तस्वीर
अब अगले पांच साल में करीब 7 हजार और स्कूलों के बंद या मर्ज होने का अनुमान है। ऐसे में आने वाला बदलाव केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं होगा, बल्कि गांवों की शिक्षा व्यवस्था का नक्शा भी बदल सकता है।
फिर भी बच्चों को रोकना चुनौती
इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाना चुनौती बना हुआ है। सरकार की कोशिश है कि बच्चों को बेहतर सुविधाओं वाले स्कूल मिलें और शिक्षकों का इस्तेमाल भी जरूरत के मुताबिक हो।
लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह के मुताबिक सांदीपनि विद्यालयों में आसपास के स्कूलों के बच्चों को प्रवेश दिया जा रहा है। बच्चों की आवाजाही के लिए बस सुविधा देने की बात भी कही गई है।
असली परीक्षा मर्जर के बाद शुरू होगी
अगर बड़े स्कूल में बेहतर शिक्षक, प्रयोगशाला और दूसरी सुविधाएं मिलती हैं तो बदलाव का फायदा साफ दिखाई देगा। लेकिन यदि स्कूल दूर होने से ग्रामीण या छोटे बच्चों की नियमित उपस्थिति प्रभावित होती है, तो यही मॉडल नई चुनौती भी खड़ी कर सकता है।
यही वजह है कि आने वाले वर्षों में सांदीपनि विद्यालय सिर्फ सरकारी शिक्षा का नया चेहरा नहीं होंगे। वे यह भी तय करेंगे कि सरकार गुणवत्ता और पहुंच इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाती है।
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