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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST वकीलों की राज्य/राष्ट्रीय बार काउंसिल में आरक्षण की मांग वाली याचिका खारिज की।
- याचिका में ‘प्रोपरशनल रिप्रेजेंटेशन’ में SC/ST समुदायों के समावेशन की मांग की गई थी।
- कोर्ट ने कहा कि आरक्षण सिर्फ़ विधिसम्मत संशोधन के जरिए ही लागू हो सकता है।
- SC ने महिला वकीलों के लिए पहले से किए गए प्रयासों का ज़िक्र किया, पर SC/ST पर निर्देश देने से इनकार किया
- याचिका पर सुनवाई के दौरान, CJI ने बताया कि BCI और राज्य बार काउंसिल मामले को सक्रिय रूप से देख रहे हैं।
NEWS IN DETAIL
New Delhi. सर्वोच्च न्यायालय ने आज एक याचिका में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से आने वाले वकीलों को बार काउंसिलों में आरक्षण देने के लिए दिशा निर्देश जारी करने से इंकार कर दिया है, यह कहते हुए कि इस प्रकार का आरक्षण केवल कानूनी संशोधन के माध्यम से ही संभव है।
याचिका का मकसद और सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में Universal Dr. Ambedkar Advocates Association ने दावा किया कि Advocates Act, 1961 के सेक्शन 3(2)(b) के तहत “प्रोपरशनल रिप्रेजेंटेशन” का मतलब SC और ST समुदायों के प्रतिनिधित्व को शामिल करना है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसा कोई प्रावधान मौजूदा कानून में नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आरक्षण के लिए संसद के माध्यम से कानून में संशोधन आवश्यक है।
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कोर्ट के फैसले के पीछे का विश्लेषण
याचिका में यह भी कहा गया था कि कई क्षेत्रों में SC/ST के लिए आरक्षण दिया जाता है। चाहे वह संसद हो या अन्य शासन निकाय इसलिए बार काउंसिलों में भी समान मौका मिलना चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर संबंधित निकायों को विचार करने के लिए निर्देश दे चुका है, और अब कोर्ट आरक्षण लागू करने की दिशा निर्देश नहीं देगा।
महिला वकीलों के प्रतिनिधित्व को लेकर टिप्पणी
याचिकाकर्ता ने महिलाओं को पहले दी गई आरक्षण सुविधाओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए सहमति और बातचीत से समाधान निकाला गया था, जिसका SC/ST प्रतिनिधित्व से सीधा अर्थ नहीं लगाया जा सकता।
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आगे का रास्ता: क्या होगा अब?
सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि संसद या राज्य विधायिका Advocates Act में संशोधन करती है, तो SC/ST समुदायों के लिए आरक्षण संभव हो सकता है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी सुझाव दिया कि वे सम्बंधित निकायों या केंद्रीय/राज्य सरकार के समक्ष अपना मामला उठा सकते हैं, और आवश्यक होने पर दोबारा कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।
इस फैसले से बार काउंसिलों में scst वकीलों के लिए तत्काल आरक्षण लागू नहीं होगा, और यह मुद्दा अब विधायिका के समक्ष प्रस्तुत किया जाना बाकी है, जिससे व्यापक कानूनी और सामाजिक बहस की शुरुआत हो सकती है।
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