चैतन्य बघेल बेल केस में बड़ा मोड़, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 28 जनवरी तक टाली

thesootr Desk | Jan 21, 2026, 14:25 IST
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Supreme Court Postpones ED Challenge on Chaitanya Baghel Bail to January 28
Supreme Court Postpones ED Challenge on Chaitanya Baghel Bail to January 28

छत्तीसगढ़ के शराब घोटाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चैतन्य बघेल की बेल चुनौती पर सुनवाई 28 जनवरी तक स्थगित कर दी। सौम्या चौरसिया और अन्य आरोपियों पर राज्य सरकार और ED को नोटिस जारी किया गया।

News In Short

  • सुप्रीम कोर्ट ने शराब घोटाले की 40+ याचिकाओं की सुनवाई टाल दी।
  • चैतन्य बघेल को जमानत देने की चुनौती वाली याचिका भी शामिल।
  • अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।
  • सौम्या चौरसिया और अन्य आरोपियों पर ED और राज्य सरकार को नोटिस।
  • पूर्व एक्साइज मंत्री कवासी लखमा की बेल याचिका भी 28 जनवरी को सुनी जाएगी।
  • आरोप औरसबूत 2019 के हैं, वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में बताया।

News in Detail

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को छत्तीसगढ़ शराब घोटाले से जुड़ी 40 से ज्यादा याचिकाओं की सुनवाई 28 जनवरी तक टाल दी। इन याचिकाओं में चैतन्य बघेल की जमानत चुनौती वाली याचिका भी शामिल थी। ED की इस याचिका पर अगली सुनवाई अगले बुधवार को होगी।

सौम्या चौरसिया और जांच एजेंसी

सुप्रीम कोर्ट ने सौम्या चौरसिया की याचिका पर राज्य सरकार और ED को नोटिस जारी किया। सौम्या पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के ऑफिस में OSD और डिप्टी सेक्रेटरी रह चुकी हैं। कोयला घोटाला मामले में उन्हें बेल मिली थी, लेकिन शराब घोटाले में उन्हें फिर से गिरफ्तार किया गया।

आरोपियों और वकीलों का पक्ष

सौम्या की ओर से मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह मामला जल्दी निपटाने की प्राथमिकता का है। अन्य आरोपियों के वकील कपिल सिब्बल ने बताया कि उनके खिलाफ लगे आरोप और सबूत 2019 के ही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चैतन्य बघेल की बेल चुनौती वाली ED याचिका पर अभी कोई नोटिस जारी नहीं किया।

आगे की सुनवाई

बेंच ने पूर्व एक्साइज मंत्री कवासी लखमा की बेल याचिका की सुनवाई भी 28 जनवरी को तय की। अगली सुनवाई में आरोपियों और जांच एजेंसी के बीच बहस फिर से सामने आएगी। सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाएं मंगलवार को लिस्टेड की थीं, लेकिन सुनवाई स्थगित कर दी गई।

सिस्टम की सख्ती और असमानता

यह मामला साफ़ दिखाता है कि सिस्टम की सख्ती अक्सर कमजोरों तक ही सीमित रहती है। कुछ दिन पहले सिर्फ 20 रुपए की रिश्वत के आरोप में ड्राइवर की नौकरी तुरंत चली गई। लेकिन हाई-प्रोफाइल नेताओं और सालों पुराने मामलों में कार्रवाई क्यों इतनी धीमी होती है?

क्या नियम सबके लिए बराबर हैं, या सिर्फ कमजोरों पर तेज़ और ऊपर वालों पर धीमा लागू होते हैं? क्या जांच और न्याय प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है, या दबाव, मीडिया और हैसियत पर निर्भर करती है? क्या सिस्टम में असमानता दूर करने का कोई तरीका है, या यह रोजमर्रा की राजनीति और ताकत के हाथ में है?

सरकार को चाहिए कि हाई-प्रोफाइल और सामान्य मामलों में जांच और कार्रवाई का पैमाना बराबर करे। हर स्तर पर नियम और सख्ती सभी के लिए समान होनी चाहिए। सिस्टम साफ और खुला होना चाहिए, ताकि हर किसी को भरोसा हो कि न्याय सबके लिए बराबर है।

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