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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- ग्वालियर का कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम अब राजनीति का अखाड़ा बन गया है।
- सांसद भारत सिंह कुशवाह ने जीडीसीए की लीज़ बढ़ाने का विरोध किया है।
- सांसद ने पत्र लिखकर स्टेडियम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
- सिंधिया परिवार का जीडीसीए से पुराना संबंध है, जो विवाद को संवेदनशील बनाता है।
- सांसद कुशवाह ने स्टेडियम को बहु-खेल केंद्र में बदलने का सुझाव दिया।
NEWS IN DETAIL
Gwalior. ग्वालियर का कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम इन दिनों खेल से ज्यादा राजनीति का अखाड़ा बन गया है। मुद्दा सिर्फ स्टेडियम की लीज का नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर उभरते वर्चस्व संघर्ष का है। बीजेपी सांसद भारत सिंह कुशवाह और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच यह टकराव अब खुलकर सामने आ गया है।
सांसद बनाम केंद्रीय मंत्री: पहली बार खुला टकराव
ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद यह पहला मौका है, जब पार्टी के ही एक सांसद ने उनसे जुड़े संस्थान पर सार्वजनिक सवाल खड़े किए हैं। सांसद भारत सिंह कुशवाह ने ग्वालियर डिवीजन क्रिकेट एसोसिएशन (जीडीसीए) को स्टेडियम की लीज न देने की मांग करते हुए महापौर और निगम सभापति को पत्र लिखा है।
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पत्र को लेकर सवाल, सांसद ने दिया साफ जवाब
जब सांसद भारत सिंह कुशवाह से पूछा गया कि उन्होंने सिंधिया पर पत्र लिखकर सीधा हमला क्यों किया, जबकि मामला बातचीत से भी सुलझ सकता था-तो उन्होंने इसे “अटैक” मानने से साफ इनकार किया।
सांसद कुशवाह ने कहा कि
“इसमें हमारे द्वारा कोई हमला नहीं किया गया है। मैं एक जनप्रतिनिधि हूं। अगर मैं युवाओं की बात नहीं करूंगा, तो कौन करेगा? यह पत्र मेरा सुझाव था, कोई राजनीतिक वार नहीं।”
युवाओं और खेल को लेकर सांसद का तर्क
सांसद ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य स्थानीय युवाओं को खेल में ज्यादा अवसर दिलाना है। उन्होंने कहा कि ग्वालियर में जीडीसीए के पास पहले से दूसरा स्टेडियम मौजूद है। इसके बावजूद कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम पर एक ही संस्था का वर्चस्व बना हुआ है।
पत्र में उठाए गए गंभीर सवाल
सांसद के पत्र में जीडीसीए की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप है कि बीते 30 वर्षों में संस्था ग्वालियर से एक भी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट सितारा तैयार नहीं कर पाई। साथ ही स्टेडियम की हालत को भी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं बताया गया है।
सिंधिया परिवार और जीडीसीए का पुराना रिश्ता
यह विवाद इसलिए भी संवेदनशील हो गया है क्योंकि जीडीसीए का संबंध लंबे समय से सिंधिया परिवार से रहा है। दिवंगत माधवराव सिंधिया, स्वयं ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पुत्र महानआर्यमन सिंधिया इस संस्था से जुड़े रहे हैं। नगर निगम द्वारा दी गई स्टेडियम की लीज़ को पहले ही 30 साल के लिए बढ़ाया जा चुका है। सांसद कुशवाह ने बताया कि उसके लिए 2025 में समाप्त हो चुकी हैं।
नगर निगम ने दी मंजूरी, लेकिन असहमति खुलकर सामने
कांग्रेस महापौर और कांग्रेस-भाजपा पार्षदों वाली नगर निगम परिषद ने लीज़ बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि भाजपा सांसद भारत सिंह कुशवाह और चार भाजपा पार्षदों ने इसका विरोध दर्ज कराया। यही विरोध अब भाजपा की अंदरूनी राजनीति को उजागर कर रहा है।
क्या मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचेगा?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सांसद कुशवाह यह मुद्दा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक भी ले जा सकते हैं। चूंकि नगर निगम के प्रस्तावों पर अंतिम अधिकार राज्य सरकार का होता है, ऐसे में सरकार चाहें तो प्रस्ताव को मंजूरी, निरस्त या पुनर्विचार के लिए लौटा सकती है।
पुरानी तल्खी, नया मुद्दा
बताया जाता है कि सांसद कुशवाह और सिंधिया के बीच यह खींचतान नई नहीं है। पिछले डेढ़ साल से दोनों खेमों के बीच मतभेद की चर्चाएं चलती रही हैं। आरोप हैं कि सिंधिया का सांसद क्षेत्र में “अघोषित हस्तक्षेप” रहा, जिसकी शिकायत संगठन तक भी पहुंची।
बैठकों से दूरी, सियासी संदेश साफ
एक समय सिंधिया ने प्रशासनिक समीक्षा बैठकें बंद कर दी थीं। अब बैठकें फिर शुरू हुई हैं, लेकिन इनमें सांसद कुशवाह की गैरमौजूदगी चर्चा में है। वहीं, सांसद की बैठकों में सिंधिया समर्थक मंत्री और विधायक नजर नहीं आते।
स्टेडियम हटे तो नुकसान क्या?
यदि जीडीसीए से स्टेडियम वापस लिया गया, तो क्रिकेट गतिविधियों की निरंतरता प्रभावित हो सकती है। घरेलू मैच, प्रशिक्षण और क्रिकेट संरचना पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
और अगर बदलाव हुआ तो फायदा क्या?
सांसद का कहना है कि स्टेडियम को बहु-खेल केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे क्रिकेट के साथ-साथ फुटबॉल, हॉकी और एथलेटिक्स जैसे खेलों को भी मंच मिलेगा और ज्यादा स्थानीय युवाओं को अवसर मिलेंगे।
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खेल से आगे निकलती सियासत
कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम का विवाद अब खेल तक सीमित नहीं रह गया है। यह ग्वालियर में भाजपा के भीतर चल रही ‘शह और मात’ की राजनीति का संकेत देता है। फैसला चाहे जो भी हो, लेकिन उम्मीद यही है कि निर्णय राजनीति नहीं, बल्कि खिलाड़ियों और युवाओं के हित में लिया जाए।
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