सरकारी वकीलों की नियुक्ति में आरक्षण अनिवार्य नहीं, लेकिन समावेशिता जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

Neel Tiwari | Feb 13, 2026, 23:14 IST
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Reservation is not mandatory in the appointment of government lawyers
Photograph: (the sootr)

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी वकीलों की नियुक्ति में आरक्षण की मांग को खारिज करते हुए समावेशिता को महत्व दिया। कोर्ट ने महिला और अन्य वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की सलाह दी।

News in short

  • सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने 10 फरवरी 2026 को सुनवाई की।
  • मामला ‘ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ से जुड़ा है।
  • कोर्ट ने कहा – सरकारी वकीलों की नियुक्ति में आरक्षण का कोई वैधानिक अधिदेश नहीं।
  • महाधिवक्ता कार्यालय को सामाजिक समावेशिता और महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का सुझाव।
  • विशेष अनुमति याचिका को टिप्पणियों के साथ निस्तारित किया गया।

Intro

सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति में आरक्षण की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में ऐसी नियुक्तियों में आरक्षण का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने राज्य को समाज के सभी वर्गों और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने की सलाह दी है।

News in Detail

मामला क्या था

‘ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ मामले में याचिका मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर की मुख्य पीठ द्वारा 19 जुलाई 2022 को रिट अपील (WA No. 510/2022) में दिए गए निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी।

याचिकाकर्ता संगठन का कहना था कि सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति में आरक्षण नीति लागू की जानी चाहिए। इस मुद्दे को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां इस पर विस्तृत सुनवाई की गई।



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सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ में हुई सुनवाई

10 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ में मामले की सुनवाई हुई। इस पीठ में माननीय जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और माननीय जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह शामिल थे। दोनों पक्षों की दलीलें विस्तार से सुनी गईं और उसके बाद कोर्ट ने अपना आदेश सुनाया।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने आरक्षण लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जबकि राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता और अन्य अधिवक्ताओं ने वर्तमान कानूनी स्थिति स्पष्ट की।

आरक्षण पर कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि सरकारी अधिवक्ताओं (Government Pleaders) की नियुक्ति में आरक्षण देने के लिए फिलहाल कोई वैधानिक प्रावधान या कानूनी अनिवार्यता मौजूद नहीं है। यानी कानून में ऐसा कोई बाध्यकारी नियम नहीं है जो सरकार को इन नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य करता हो।

यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे भविष्य में इसी प्रकार की नियुक्तियों से जुड़े विवादों की दिशा स्पष्ट हो सकती है।

सामाजिक समावेशिता पर जोर

हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही आरक्षण अनिवार्य नहीं है, लेकिन नियुक्तियों में “समावेशिता का तत्व” होना चाहिए। कोर्ट का मानना था कि सरकारी पदों पर नियुक्ति करते समय समाज के सभी वर्गों को अवसर मिलना जरूरी है, ताकि हर वर्ग के वकील आगे बढ़ सकें। यह टिप्पणी सामाजिक न्याय और संतुलित प्रतिनिधित्व के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

महिलाओं और विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व का सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से महाधिवक्ता कार्यालय से अनुरोध किया कि भविष्य की नियुक्तियों में समाज के विभिन्न वर्गों और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए।

साथ ही आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय के कम से कम कुछ सदस्यों को भविष्य की नियुक्तियों में शामिल किया जाना चाहिए। यह निर्देश सामाजिक संतुलन और विविधता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिया गया है।

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याचिका का हुआ निपटारा

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त टिप्पणियों और सुझावों के साथ विशेष अनुमति याचिका (SLP) को निस्तारित कर दिया। इसके साथ ही मामले से जुड़े सभी लंबित आवेदनों को भी समाप्त कर दिया गया। यह आदेश सहायक रजिस्ट्रार श्वेता बलोदी और पूनम वैद के माध्यम से आधिकारिक रूप से रिकॉर्ड किया गया।

यह फैसला जहां एक ओर कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है, वहीं दूसरी ओर सरकार को सामाजिक समावेशिता और संतुलित प्रतिनिधित्व की दिशा में संवेदनशील कदम उठाने का संदेश भी देता है।



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