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News in short
- आनंद कुमार मिश्रा सहित 1070 शिक्षक याचिकाकर्ता।
- 2018 भर्ती के बाद सेवा शर्तों में बदलाव को चुनौती।
- अनुच्छेद 14 और 16 के उल्लंघन का आरोप।
- 70-80-90% वेतन व्यवस्था को भेदभावपूर्ण बताया।
- नियुक्ति दिनांक से पूर्ण वेतनमान व एरियर्स की मांग।
News in Detail
साल 2018 की शिक्षक भर्ती से जुड़ा वेतन विवाद कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। आनंद कुमार मिश्रा सहित 1071 याचिकाकर्ताओं ने सेवा शर्तों में बदलाव को हाईकोर्ट में चुनौती दी। चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच में समान कार्य के लिए समान वेतन का मुद्दा उठाया गया।
1070 शिक्षकों की सामूहिक याचिका
वर्ष 2018 की शिक्षक भर्ती का वेतन विवाद अब बड़ा बन गया है। आनंद कुमार मिश्रा सहित 1071 याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय में याचिका दी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चयन प्रक्रिया के बाद सेवा शर्तों में बदलाव किया गया। इससे उनके अधिकारों का हनन हुआ। यह मामला हजारों शिक्षकों के भविष्य से जुड़ा है।
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चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच के समक्ष संवैधानिक तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता राहुल दिवाकर ने माननीय डिवीजन बेंच के समक्ष विस्तार से तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि चयनित अभ्यर्थियों ने 2018 के भर्ती विज्ञापन में उल्लेखित शर्तों के आधार पर आवेदन किया और चयनित हुए । प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद नियमों में बदलाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
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समान कार्य के लिए समान वेतन का हवाला
इस मामले की सुनवाई के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने समान कार्य के लिए समान वेतन सिद्धांत का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि तीन वर्षों तक 70-80-90 प्रतिशत वेतन देना न तो विधिसम्मत है, न न्यायसंगत। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि समान जिम्मेदारियों के बावजूद वेतन में कटौती भेदभावपूर्ण नीति है।
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न्यायिक दृष्टांतों के विपरीत नियम परिवर्तन
अधिवक्ता राहुल दिवाकर ने कहा कि नियमों में परिवर्तन न्यायिक दृष्टांतों के विपरीत है। उन्होंने 12/12/2019 के आदेश निरस्त होने का उल्लेख किया। इसके बावजूद वेतन व्यवस्था को लागू रखना प्रशासनिक मनमानी है। उनका कहना था कि यह विधिक सिद्धांतों और चयनित शिक्षकों के साथ अन्याय है।
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नियुक्ति दिनांक से पूर्ण वेतन और एरियर्स की मांग
न्यायालय से अनुरोध किया गया कि 1071 याचिकाकर्ताओं को पूर्ण वेतनमान दिया जाए। बकाया एरियर्स और समस्त लाभ भी प्रदान किए जाएं। अधिवक्ता ने कहा कि यह केवल आर्थिक राहत का प्रश्न नहीं है। यह शिक्षकों की गरिमा, संवैधानिक अधिकार और सेवा सुरक्षा से जुड़ा विषय है। अब डिवीजन बेंच के अंतिम निर्णय का इंतजार है। इसका असर हजारों शिक्षकों पर पड़ सकता है।
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