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Photograph: (the sootr)
News in Short
- गुलाबी गैंग कमांडर की गिरफ्तारी के एक बाद हुई FIR
- तहसीलदार ने जमानत आदेश के बाद भी कथित रूप से शर्तें बढ़ाकर जेल वारंट जारी किया।
- पूर्णिमा वर्मा का आरोप – शराब माफियाओं से मिलीभगत कर फर्जी मामला दर्ज किया गया।
- लोकायुक्त जबलपुर में टीआई, सब-इंस्पेक्टर और तहसीलदार के खिलाफ जांच प्रचलित।
- 4 सितंबर को सत्र न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद मिली रिहाई।
INTRO
मध्यप्रदेश में अवैध शराब के खिलाफ आंदोलन चला रहीं गुलाबी गैंग की कमांडर पूर्णिमा वर्मा ने छिंदवाड़ा सिटी कोतवाली पुलिस और तहसीलदार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि उन्हें चाय पिलाने के बहाने बुलाकर अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया और फर्जी कागजी कार्रवाई कर जेल भेजा गया। इस पूरे प्रकरण में लोकायुक्त जबलपुर में जांच शुरू हो चुकी है और बुधवार को उनके कथन दर्ज किए गए।
News in detail
लोकायुक्त में हुए बयान, जबलपुर पहुंचीं पूर्णिमा वर्मा
गुलाबी गैंग की मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ प्रभारी पूर्णिमा वर्मा बुधवार को जबलपुर स्थित लोकायुक्त कार्यालय पहुंचीं। जहां उन्होंने अपने साथ हुई कथित अवैध गिरफ्तारी और जेल भेजे जाने के संबंध में विस्तृत कथन दर्ज कराए। उन्होंने बताया कि 30 अगस्त 2025 को उन्हें हिरासत में लिया गया था और पांच दिन जेल में रहना पड़ा। उनका आरोप है कि पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारी 31 अगस्त को दर्शाई गई है, जो गंभीर विसंगति है। इसी मामले की जांच लोकायुक्त में चल रही है।
‘चाय पिलाने के बहाने बुलाया, धोखे से गिरफ्तारी’
पूर्णिमा वर्मा ने आरोप लगाया कि सिटी कोतवाली थाना प्रभारी आशीष धुर्वे और सब-इंस्पेक्टर एकता सोनी ने उन्हें चाय पीने के बहाने बुलाया। उन्हें इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि उनकी गिरफ्तारी की जा रही है। उन्होंने कहा कि प्रेमपूर्वक बहला-फुसलाकर उन्हें थाने लाया गया और फिर धोखे से हिरासत में ले लिया गया। उनके अनुसार यह गिरफ्तारी न केवल अवैध थी बल्कि उन्हें 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के संवैधानिक प्रावधानों का भी उल्लंघन किया गया।
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गिरफ्तारी और कायमी की तारीखों में विरोधाभास पर सवाल
इस मामले में अधिवक्ता विवेक तिवारी ने बताया कि गिरफ्तारी मेमो 30 अगस्त का है, जबकि प्रतिबंधात्मक कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (पूर्व में सीआरपीसी की धारा 151 के समतुल्य प्रावधान) के तहत 31 अगस्त को दर्ज दिखाई गई। 1 सितंबर को उन्हें तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अधिवक्ता का कहना है कि यदि मामला 31 अगस्त को कायम हुआ तो 30 अगस्त को गिरफ्तारी कैसे दर्शाई गई? यह कागजी हेरफेर और अवैध कस्टडी की ओर इशारा करता है। उन्होंने रोजनामचा प्रविष्टियों में ओवरराइटिंग और विसंगतियों का भी आरोप लगाया।
जमानत के बावजूद जेल वारंट? तहसीलदार पर गंभीर आरोप
पूर्णिमा वर्मा और उनके अधिवक्ता का आरोप है कि तहसीलदार आशुतोष रामटेक ने पहले 50-50 हजार के मुचलके की शर्त रखी, बाद में इसे बढ़ाकर एक लाख कर दिया। आरोप है कि जमानत आदेश के बावजूद जानबूझकर जेल वारंट जारी किया गया, जिसके कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। आखिरकार 4 सितंबर को सत्र न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहाई मिली। इस पूरे घटनाक्रम को उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया है।
‘नशा मुक्त अभियान’ बना विवाद की जड़
पूर्णिमा वर्मा का दावा है कि वे पिछले कई वर्षों से छिंदवाड़ा में अवैध शराब अहातों और आवासीय क्षेत्रों में संचालित दुकानों के खिलाफ आंदोलन चला रही हैं। उनका कहना है कि मध्यप्रदेश सरकार ने अवैध अहातों पर प्रतिबंध का आदेश दिया है, इसके बावजूद बड़े पैमाने पर अवैध संचालन जारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी और प्रभावशाली लोग शराब माफियाओं को संरक्षण दे रहे हैं। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उनके आंदोलन को कुचलने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया गया।
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उठाए सवाल
अपने बयान में पूर्णिमा वर्मा ने कहा कि यदि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारी ही कानून का दुरुपयोग करेंगे तो आम नागरिक की न्याय व्यवस्था से उम्मीदें टूटेंगी। उन्होंने कहा कि यह केवल उनका व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की गरिमा से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस मुद्दे पर कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई जारी रखेंगी।
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लोकायुक्त जांच जारी, दस्तावेज प्रस्तुत
अधिवक्ता विवेक तिवारी के अनुसार, छिंदवाड़ा के सिटी कोतवाली थाना टीआई आशीष धुर्वे, सब-इंस्पेक्टर एकता सोनी और तहसीलदार आशुतोष रामटेक के खिलाफ लोकायुक्त में औपचारिक शिकायत दर्ज है। बुधवार को पूर्णिमा वर्मा ने अपने कथन दर्ज कराए और संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। मामले की जांच वर्तमान में प्रचलन में है।
अब देखना यह होगा कि लोकायुक्त की जांच इस कथित गिरफ्तारी की सच्चाई को किस दिशा में ले जाती है और क्या आरोपित अधिकारियों के खिलाफ आगे कोई ठोस कार्रवाई होती है।
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