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Photograph: (the sootr)
BHOPAL. छात्रों की सेहत दांव पर, लेकिन फैसले पर सन्नाटा क्यों? सीहोर स्थित वीआईटी यूनिवर्सिटी में दूषित पानी और खराब भोजन से दर्जनों छात्र बीमार पड़े। मामला विधानसभा तक पहुंचा। उच्च शिक्षा मंत्री ने कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया। जांच कमेटी रिपोर्ट दे चुकी है, यूनिवर्सिटी अपना जवाब सौंप चुकी है और विभाग प्रस्ताव शासन को भेज चुका है।
फिर भी दो महीने से अंतिम आदेश का इंतजार है। आखिर कार्रवाई कब होगी? क्या यह देरी उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी सिस्टम की उदासीनता को उजागर नहीं करती?
क्या है पूरा मामला
वीआईटी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहने वाले छात्रों ने खाने और पानी की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें कीं। छात्रों का आरोप है कि शिकायतों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। नवंबर से छात्रों की तबीयत बिगड़नी शुरू हुई। करीब 35 छात्रों में पीलिया (जॉन्डिस) के लक्षण पाए गए।
स्थिति तनावपूर्ण हुई तो छात्रों और प्रबंधन के बीच विवाद बढ़ा। इसी दौरान कैंपस में खड़े कुछ वाहनों में आगजनी की घटना भी सामने आई। पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन आरोप लगे कि सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत अंदर जाने नहीं दिया।
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विधानसभा में गूंजा मुद्दा, मंत्री ने दिया था कड़ा संदेश
यह मामला विधानसभा में प्रमुखता से उठाया गया। विधायकों ने छात्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर सरकार से जवाब मांगा। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने सदन में कहा था-“ऐसी कार्रवाई करेंगे जो पूरे प्रदेश में उदाहरण बने।”बयान सख्त था। लेकिन जमीनी स्तर पर अभी तक ठोस निर्णय सामने नहीं आया।
जांच कमेटी की रिपोर्ट में क्या निकला?
शासन ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी। कमेटी की रिपोर्ट में कई गंभीर बातें सामने आईं-प्रबंधन पर तानाशाही रवैये के आरोप। शिकायत करने वाले छात्रों को फेल करने की धमकी। आई कार्ड जब्त कर परीक्षा से रोकने की बातें। प्रायोगिक परीक्षा में कम अंक देने के आरोप। भोजन और पानी की शिकायतों की अनदेखी। रिपोर्ट ने प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा किया है।
यूनिवर्सिटी का पक्ष क्या है?
वीआईटी प्रबंधन ने सरकार को लिखित जवाब दिया है। प्रबंधन ने सभी आरोपों को निराधार बताया है। घटना की जिम्मेदारी छात्रों और कथित बाहरी तत्वों पर डालते हुए खुद को निर्दोष बताया गया है।
अब फाइल कहां अटकी है?
उच्च शिक्षा विभाग ने जांच रिपोर्ट और यूनिवर्सिटी के जवाब के आधार पर प्रस्ताव शासन को भेज दिया है। मंत्री इंदर सिंह परमार का कहना है कि परीक्षण प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और निर्णय जल्द होगा। लेकिन दो महीने बाद भी अंतिम आदेश जारी नहीं हुआ। फाइल शासन स्तर पर लंबित बताई जा रही है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
- 35 छात्र पीलिया से प्रभावित।
- विधानसभा में मामला उठा।
- मंत्री ने सख्त कार्रवाई का वादा किया।
- तीन सदस्यीय कमेटी ने रिपोर्ट सौंपी।
- यूनिवर्सिटी ने आरोपों को खारिज किया।
- प्रस्ताव शासन को भेजा गया।
- दो महीने बाद भी अंतिम निर्णय नहीं।
बड़े सवाल जो उठ रहे हैं
छात्रों के बीमार पड़ने के बाद भी त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं हुई? सदन में दिए आश्वासन के बाद देरी क्यों? क्या निजी विश्वविद्यालयों के खिलाफ सख्ती में हिचक है? क्या यह मामला सरकारी सिस्टम की धीमी कार्यशैली को उजागर नहीं करता? छात्रों के स्वास्थ्य से जुड़े मामले में इतनी सुस्ती क्या दर्शाती है?
सरकारी तंत्र पर सवाल
यदि जांच में कमियां सामने आई हैं, तो कार्रवाई में देरी क्यों? और यदि आरोप गलत हैं, तो क्लीन चिट देने में भी देर क्यों? अनिर्णय की स्थिति सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों को पहुंचाती है। यह मामला अब सिर्फ एक यूनिवर्सिटी का नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा विभाग की जवाबदेही का बन गया है।
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उदाहरण बनेगा या फाइलों में दबेगा?
मंत्री ने कहा था कि कार्रवाई नजीर बनेगी। अब दो महीने की खामोशी के बाद नजर इस बात पर है कि फैसला कब आएगा। छात्रों की सेहत, सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े मामले में देरी कई सवाल छोड़ रही है। सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है-आखिर कब होगी कार्रवाई?
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