योग का प्रचार खूब पर नौकरियों में पड़ा अकाल! विश्वविद्यालयों में 50% सीटें खाली
Aman Vaishnav | Jun 21, 2026, 08:45 IST
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देशभर में योग का प्रचार तो हुआ लेकिन सरकारी क्षेत्र में रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बढ़ाए गए हैं। इसकी वजह से योग कोर्सेस की लगभग आधी सीटें खाली रह गई हैं। एमपी के कई विश्वविद्यालय में तो 50% तक सीटें खाली हैं।
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश की चार बड़ी यूनिवर्सिटी में योग के कोर्स चलते हैं।
- इन कोर्सेस में कुल 330 सीटें हैं।
- सत्र 2025-26 में सिर्फ 175 सीटों पर ही एडमिशन हुआ।
- इसका मतलब कि लगभग आधी सीटें खाली रह गईं।
- सरकारी नौकरियों की कमी और रोजगार के सीमित मौके इसकी वजह है।
योग कोर्सेस में सीटें ज्यादा, एडमिशन कम
इसकी वजह साफ है। योग का प्रचार तो बहुत हुआ, लेकिन सरकारी क्षेत्र में रोजगार के मौके नहीं बढ़े। ऐसे में ज्यादातर छात्रों के सामने सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं। या तो वे निजी संस्थान में प्रशिक्षक बनें या खुद का योग केंद्र खोलें।
बीयू में एडमिशन का हाल
बता दें कि पीजी डिप्लोमा इन योगिक साइंस में 60 सीटें हैं। तीन सालों में क्रमशः 47, 42 और 49 एडमिशन हुए। यह कोर्स बाकी कोर्सेस से थोड़ा बेहतर स्थिति में है।
एम.एससी इन योगिक साइंस में 30 सीटों के मुकाबले 2023-24 में 27 एडमिशन हुए। वहीं 2024-25 में 18 और 2025-26 में सिर्फ 16 एडमिशन हुए। सर्टिफिकेट इन योगिक साइंस योग थैरेपी कोर्स में 30 सीटें हैं। यहां दाखिले की संख्या लगातार बढ़ी है, 2023-24 में 15 से 2025-26 में 21 तक।
एमसीयू और सांची विवि का हाल
सांची विश्वविद्यालय में योगिक साइंस के एमए और एम.एससी कोर्स मिलाकर 20 सीटें हैं। दोनों ही सत्रों में सिर्फ 13-13 एडमिशन हुए। यानी यहां भी सीटें आधी से ज्यादा खाली रहीं।
हिंदी विवि में हालत सबसे खराब
सरकारी नौकरी न होना सबसे बड़ी वजह
जो छात्र पीएचडी कर भी लेते हैं, उन्हें भी नियमित नौकरी के लिए जूझना पड़ता है। यही वजह है कि कई छात्र योग कोर्स करने से कतराते हैं। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
सरकार को ठोस कदम उठाना जरूरी
हालांकि जो छात्र खुद का योग केंद्र खोलते हैं, उनकी कमाई भी अच्छी हो सकती है। कई छात्र महीने में 50 हजार रुपए तक भी कमा लेते हैं। लेकिन यह विकल्प सरकारी नौकरी जैसी स्थिरता नहीं देता।
आने वाले समय में अगर सरकार योग शिक्षकों और थैरेपिस्ट के लिए नियमित पद नहीं बनाती, तो इन कोर्सेस में दाखिले की संख्या और गिर सकती है। इससे योग शिक्षा से जुड़े संस्थानों के सामने भी चुनौती बढ़ेगी।
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