ऐसे तो 32 फीसदी अरावली हो जाएगी खत्म, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में बनेंगे पक्षकार

राजस्थान में 'वीआर अरावली' संगठन ने एक अध्ययन के आधार पर दावा किया है कि अरावली की नई परिभाषा से 32 फीसदी पहाड़ियां खत्म हो जाएंगी। संगठन ने कहा है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में वह भी पक्षकार बनेगा।

author-image
Mukesh Sharma
New Update
arawali

Photograph: (the sootr)

Listen to this article
0.75x1x1.5x
00:00/ 00:00

Jaipur. अरावली पर्वतमाला में 100 मीटर से ऊंचाई को ही पहाड़ मानने की नई परिभाषा से उपजे विवाद के बाद अरावली बचाने के लिए अनेक संगठन आगे आ रहे हैं। ऐसे ही एक संगठन 'वीआर अरावली' ने भी वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर दावा किया है कि अगर 100 मीटर ऊंचाई की ​परिभाषा को माना गया तो इसकी 32 फीसदी पहाड़ियां गायब हो जाएंगी। संगठन से जुड़े सुधांशु शर्मा और अन्य पदाधिकारियों ने शनिवार को जयपुर में एक प्रेस काफ्रेंस में स्वतंत्र व विस्तृत सैटेलाइट आधारित वैज्ञानिक विश्लेषण जारी कर यह दावा किया है। 

राजस्थान में ईवीएम से ही होंगे पंचायत चुनाव, खास रंग की मंगवाई मशीन

अदालती सुनवाई में बनेंगे पक्षकार

सुधांशु ने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में वे भी पक्षकार बनेंगे। साथ ही शीर्ष कोर्ट में अपनी अध्ययन रिपोर्ट पेश करेंगे। उन्होंने कहा कि अरावली खासकर राजस्थान की जीवनरेखा है। इसके अस्तित्व पर ही लोगों का जीवन है। उन्होंने कहा कि वे अरावली बचाने के लिए पूरा प्रयास करेंगे।  

weather update: सर्दी ने पकड़ी रफ्तार, एमपी, सीजी और राजस्थान में बिगड़े हालात!

अध्ययन में यह तथ्य आया सामने 

संगठन का दावा है कि जीआईएस वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह स्वतंत्र विश्लेषण बेयर अर्थ मॉडल के आधार पर किया है। अध्ययन से पता चला है कि अरावली के कुल पहाड़ी क्षेत्रफल का 31.8% हिस्सा 100 मीटर से कम ऊंचाई का है। इसे वर्तमान सरकारी मानकों के कारण कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया है। संगठन का कहना है कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सभी मैपिंग कोड और एल्गोरिदम ओपन-सोर्स किए गए हैं, जिससे सरकार और वैज्ञानिक समुदाय इनकी स्वतंत्र जांच कर सके।

राजस्थान के वृद्धजन को हर महीने मिलती है इतनी पेंशन, ऐसे उठाएं CM Pension Yojana का लाभ

सरकार के दावे को ऐसे झुठलाया 

सरकारी आंकड़ों की कमी: सरकार द्वारा बताया गया 0.19% का आंकड़ा अरावली की वास्तविक भू-वैज्ञानिक संरचना को नज़रअंदाज़ करता है।

वास्तविक स्थिति: अरावली क्षेत्र का 31.8% हिस्सा ऐसी छोटी, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पहाड़ियों और रिज का है, जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से कम है।

गलत वर्गीकरण: जिन क्षेत्र को “बंजर ज़मीन” बताया है, वह हकीकत में महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

राजस्थान में बहन से बात करने पर युवक की हत्या, न्यू ईयर पार्टी का दिया लालच

संगठन की है ये मुख्य मांग

  • पूर्ण संरक्षण हो: पूरी अरावली पर्वतमाला को पूरी तरह संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए। पर्वत को ऊंचाई के आधार पर अलग करने की व्यवस्था समाप्त की जाए। ऐसे तो 32 फीसदी अरावली हो जाएगी खत्म। 
  • खनन पर पूर्ण प्रतिबंध: सभी प्रकार के खनन पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। अपवाद के रूप् में सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों का सीमित और नियंत्रित उत्खनन होना चाहिए। रोडी, पत्थर और सजावटी पत्थरों के लिए कोई खनन नहीं होना चाहिए।
  • खनन पट्टों की समाप्ति: पहले से दिए गए सभी खनन पट्टे तुरंत रद्द किए जाएं, क्योंकि ये पर्यावरण और जल-प्रणाली के लिए विनाशकारी हैं।
  • भौगोलिक समावेशन: चित्तौड़गढ़, नागौर, बूंदी, कांमा (भरतपुर) और सवाई माधोपुर जैसे क्षेत्रों को आधिकारिक रूप से अरावली प्रणाली में शामिल किया जाए।

आईपीएस राकेश अग्रवाल को मिली अहम जिम्मेदारी, राजस्थान से है खास रिश्ता

सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला 

यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2025 के अंत में आए एक आदेश के बाद खड़ा हुआ है। पर्यावरणविदों  का आरोप है कि अब 100 मीटर ऊंचाई को ही अरावली माना गया है। इससे नीचे की पहाड़ियां अरावली पर्वत माला से बाहर होगी। इनमें खनन और अन्य गतिविधियां बढ़ जाएंगी। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले पर रोक लगा दी। अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी। 

पारिस्थितिक चिंताएं

अरावली को बचाने की मांग इसलिए तेज है, क्योंकि यह उत्तर भारत में रेगिस्तान के विस्तार को रोकती है। साथ ही भूजल पुनर्भरण में मदद करती है। अरावली दिल्ली-एनसीआर में जैव विविधता का मुख्य केंद्र है। यह पर्वतमाला चार राज्यों में है, जिसमें गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली शामिल है। 

सुप्रीम कोर्ट राजस्थान अरावली पर्वतमाला वीआर अरावली ऐसे तो 32 फीसदी अरावली हो जाएगी खत्म
Advertisment