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Photograph: (the sootr)
Tonk. राजस्थान के आंवा गांव में मकर संक्रांति पर ऐतिहासिक दड़ा महोत्सव का आयोजित किया गया। 80 किलो वजनी दड़े को 12 गावों के सैकड़ों खिलाड़ियों ने खेला। इस खेल को लेकर मान्यता है कि इसकी जीत और हार प्रदेश में अकाल और सुकाल की भविष्यवाणी करती है। शौर्य, रोमांच और लोक आस्था का अद्भुत संगम है। यह खेल न केवल एक मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह आने वाले वर्ष के मौसम के संकेत भी प्रदान करता है। इस पारंपरिक खेल में ग्रामीणों का उत्साह और आस्था देखने लायक होती है।
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आंवा में मकर संक्रांति: एक अनोखा परंपरागत खेल
मकर संक्रांति का पर्व राजस्थान में खास तरीके से मनाया जाता है। जहां एक ओर पूरे राज्य में पतंगबाजी का आनंद लिया जाता है, वहीं टोंक जिले के आंवा कस्बे में एक अद्भुत खेल 'दड़ा' खेला जाता है। इस खेल की खास बात यह है कि यह कोई सामान्य खेल नहीं है, बल्कि यह शौर्य, रोमांच और लोक आस्था का प्रतीक है। इस खेल के दौरान लोग एक विशाल और भारी दड़े से खेलते हैं, जो लगभग 80 किलो वजनी होता है।
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दड़ा महोत्सव की विशेषताएं (2026 में अद्यतन)
दड़े का निर्माण
मकर संक्रांति के तीन-चार दिन पहले इस दड़े को तैयार किया जाता है। इसे पुराने कपड़ों, जूट और चमड़े से बनवाया जाता है। इसके बाद इसे भारी बनाने के लिए तीन दिनों तक पानी में भिगोकर रखा जाता है।
दड़ा का वजन और खिलाड़ी
इस वर्ष, दड़ा का वजन लगभग 80 किलो है। इस खेल में आंवा और आसपास के 12 गांवों के हजारों युवा और बुजुर्ग लोग शामिल होते हैं। इस खेल में दो दल होते हैं, जो दड़े को अलग-अलग दिशाओं में ले जाने का प्रयास करते हैं।
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इतिहास और परंपरा
दड़ा महोत्सव की शुरुआत रियासत काल से मानी जाती है। कहा जाता है कि तत्कालीन राजा-महाराजा इस खेल का आयोजन करते थे, ताकि वे युवाओं की शारीरिक क्षमता और फुर्ती का परीक्षण कर सकें। जो युवा सबसे अधिक वीरता से खेलता था, उसे सेना में भर्ती किया जाता था।
खेल और भविष्यवाणी: अकाल या सुकाल?
दड़ा महोत्सव केवल एक खेल नहीं है, बल्कि यह एक प्रकार की भविष्यवाणी भी है। खेल के दौरान दड़ा को दो अलग-अलग दिशाओं में ले जाने का प्रयास किया जाता है:
दूनी दरवाजे की ओर दड़ा जाने पर – इसे 'सुकाल' (अच्छी वर्षा और समृद्धि) का संकेत माना जाता है।
अखानी (रामपुरा दरवाजे) की ओर दड़ा जाने पर – इसे 'अकाल' का संकेत माना जाता है।
गढ़ चौक में रुकने पर – इसे औसत वर्षा का संकेत माना जाता है।
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खेल की शुरुआत और आयोजन
इस साल, 14 जनवरी 2026 को, दड़ा खेल का शुभारंभ आंवा के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और सरपंच द्वारा गोपाल चौक (गढ़ चौक) में किया गया। इस रोमांचक खेल को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग और पर्यटक आंवा पहुंचे। सुरक्षा की दृष्टि से जिला प्रशासन ने पुलिस का अतिरिक्त जाप्ता तैनात किया था, ताकि खेल का आयोजन सुरक्षित रूप से हो सके।
दड़ा महोत्सव का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
दड़ा महोत्सव केवल एक खेल नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण जीवन, खेती और लोक मान्यताओं का प्रतीक है। यह आयोजन स्थानीय लोगों के बीच सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है और उनकी सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
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इस बार क्या हुई भविष्यवाणी
दड़ा महोत्सव में 12 पूरो के युवाओं ने पूरी जोर अजमाइश की दूनी दरवाजे तक दखलेने की लेकिन ना तो दड़ा दूनी दरवाजे तक पहुंचा ना ही अखनिया दरवाजे तक , काफी देर जोर आजमाइश के बाद दड़ा मुख्य दरवाजे में पहुंच गया जिसे सेंटर माना जाता है। यहां दड़ा पहुंचने पर माना जाता है कि आने वाले समय में ना तो अकाल पड़ेगा ना ही सुकाल यानी मध्यम दर्जे का होगा। जिसमें किसानों के अच्छी पैदावार होगी और फसलों में खराबा भी पूरी तरह से नहीं होगा। लोगों का यह भी दावा है कि अब तक दड़ा महोत्सव में सामने आए नतीजों पर परम्परा और मान्यता के अनुसार ही पूरी तरह से सही साबित हुआ है।
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किसने की थी दड़ा की शुरूआत
आवां में दड़ा महोत्सव की शुरूआत उनियारा राजघराने के पूर्व जागिरदार सरदार सिंह ने साल 1944 में इसकी शुरूआत की थी। तब राजघराने में सेना भर्ती के लिए युवाओं की दक्षता के लिए इस खेल की शुरूआत की थी, फिर धीरे-धीरे इस खेल को आस्था से जोड़ दिया गया। तब से ही अब तक इस विश्व प्रसिद्ध दड़ा महोत्सव का आयोजन हर साल मकर संक्रांति के मौके पर 14 जनवरी को आयोजित किया जाता है।
मुख्य बिंदू:
दड़ा महोत्सव मकर संक्रांति के दिन, 14 जनवरी को आंवा गांव, टोंक जिले में आयोजित होता है।
2. दड़ा का वजन कितना होता है?
2026 में दड़ा का वजन लगभग 80 किलो है। इसे पुराने कपड़ों, जूट और चमड़े से बनाया जाता है।
3. दड़ा महोत्सव का सांस्कृतिक महत्व क्या है?
यह खेल स्थानीय लोगों की सांस्कृतिक धरोहर, सामाजिक समरसता और कृषि से जुड़ी लोक मान्यताओं का प्रतीक है।
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