अपना घर की कहानी: सिंदूर की आस 4 साल बाद पूरी, छलक पड़े आंसू

राजस्थान में भरतपुर के अपनाघर में नेपाल के गणेश चौधरी की 4 साल बाद अपने परिवार से मुलाकात हुई। अपनाघर आश्रम में पुनर्वास के बाद उनका परिवार फिर से एक साथ हो गया, खुशी के आंसू छलके।

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Purshottam Kumar Joshi
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Photograph: (the sootr)

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News in Short

  • भरतपुर में अपना घर में रह रहे गणेश चौधरी की चार साल बाद घर वापसी
  • नेपाल से सुनीता अपने पति गणेश को लेने भरतपुर में अपना घर पहुंची
  • गणेश जब घर से निकला, तब सुनीता गर्भवती थी, पति बाद में नहीं लौटे
  • गणेश को लेकर उनके परिजन यह उम्मीद छोड़ चुके थे कि वह लौटेगा
  • गणेश सुधबुध खोए बीमार हालात में अपनाघर आया था, अब वह स्वस्थ है 

राजेश खण्डेलवाल @ भरतपुर

News in Detail

चार साल के दौरान जब भी मांग में सिंदूर भरती तो मन में एक ही टीस उठती कि मेरा शृंगार सच्चा है या नहीं...। क्या मेरे पति कहीं जीवित हैं भी? और जब से पति से बात होना बंद हुआ था, ठीक से शृंगार किया ही नहीं। यह कहना था नेपाल की सुनीता का, जो राजस्थान में भरतपुर के अपना घर आश्रम में अपने पति गणेश चौधरी को लेने के लिए पहुंची। उनकी विदाई के समय वहां उपस्थित सभी लोगों के आंसू छलक पड़े।

खुशियां तो आई पर गणेश नहीं लौटे

सुनीता ने बताया कि जब गणेश घर से निकले, तब वह गर्भवती थी। गणेश घर से यह कह कर गए थे कि जब घर में खुशियां आएंगी, तब तक मैं आ जाऊंगा। घर में खुशियां तो आई, लेकिन पति गणेश नहीं आए। 

तस्वीर के सहारे काटे दिन

सुनीता ने अपनी नन्हीं बेटी को सिर्फ पिता की तस्वीर दिखाकर बड़ा किया और खुद भी उसी तस्वीर के सहारे दिन काटे। भावुक सुनीता ने बताया कि वह इस संशय में जी रही थीं कि उनके सुहाग की निशानी (सिंदूर) की सच्चाई क्या है, लेकिन आज पति को सामने देख उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

भाग्य के भरोसे रहे गणेश के पिता

गणेश के वृद्ध पिता जगतराम थारू ने कहा कि वे यह उम्मीद पूरी तरह छोड़ चुके थे कि उनके बुढ़ापे का सहारा और उनकी बैसाखी कभी उन्हें वापस मिलेगी। उन्होंने गणेश की तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, पर अंत में थक हारकर भाग्य के भरोसे बैठ गए थे। आज अपने बेटे को दोबारा पाकर उन्हें लगा जैसे उनके जीवन की खोई हुई लाठी वापस मिल गई हो।

कर्नाटक गए थे मजदूरी करने

अपना घर आश्रम के सचिव बसंतलाल गुप्ता ने बताया कि गणेश चौधरी 4 साल पहले मजदूरी करने कर्नाटक पहुंचे थे। वहां पर साल भर काम करने के बाद में 40 हजार रुपए कमाकर घर लौट रहे थे। रास्ते में जहर-खुरानी गिरोह का शिकार हो गए। 

अस्पताल से लाया गया अपना घर

मानसिक आघात के कारण गणेश सुध-बुध खो बैठा और घर नहीं पहुंच सका। पिछले दो वर्ष से वह कहां रहा, उसे कुछ नहीं पता, लेकिन बदलते हालातों ने उन्हें लखीमपुर खीरी के जिला चिकित्सालय पहुंचा दिया, जहां से जिला चिकित्सा प्रभारी का फोन अपनाघर आया तथा चार प्रभुजी को वहां से अपना घर भरतपुर लाया गया, जिनमें से एक गणेश भी था। 

नेपाल से लेने आया गणेश का परिवार

भरतपुर के अपना घर आश्रम में लाने के बाद चिकित्सा सेवा हुई, जिसके बाद गणेश ने परिवार का पता बताया। इस पर अपना घर की पुनर्वास टीम ने अपना घर आश्रम नेपाल के माध्यम से उनके परिवार को खोजने का प्रयास किया और अंतत: परिवार मिल गया जब उन्हें सूचना दी गई इस सूचना पर गणेश के पिता तथा पत्नी अपनी बेटी को लेकर गणेश को लेने अपना घर पहुंचे।

50 से ज्यादा नेपाली प्रभुजनों का कराया पुनर्वास

अपना घर के संस्थापक डॉ. बीएम भारद्वाज ने बताया कि अपना घर आश्रम अब तक 50 से अधिक नेपाली प्रभुजनों का सफल पुनर्वास कर चुका है। आवश्यकता पडऩे पर नेपाल स्थित आश्रमों की सहायता भी ली जाती है। सोमवार को आवश्यक कागजी कार्रवाई के बाद गणेश को उनकी पत्नी, मासूम बेटी और पिता को सुपुर्द कर दिया गया।

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