नगर निगम या वसूली भाई: यूडी टैक्स वसूली के लिए दिया प्राइवेट कंपनी को ठेका, पूरे शहर को 18 साल के एकसाथ थमाए नोटिस
राजस्थान का जयपुर नगर निगम ने यूडी टैक्स वसूली के लिए एक प्राइवेट कंपनी को ठेका दिया है। यह कंपनी अब 18 साल के बकाया यूडी टैक्स की वसूली के लिए पूरे शहर को नोटिस दे रही है।
राजस्थान की राजधानी जयपुर में नगर निगम के कारनामे ना तो नई बात है और ना ही किसी से छिपे है। लेकिन, अब जयपुर नगर निगम वसूली भाई बनकर सामने आया है। नगर निगम एक निजी कंपनी से ठेके पर नगरीय विकास कर (यूडी टैक्स ) की गैर-कानूनी वसूली करवा रहा है। यह निजी कंपनी राजस्थान नगर पालिका कानून-2009 के विपरीत प्रोपर्टी मालिकों को एक साथ 18 साल के डिमांड और कुर्की नोटिस भेज रही है। कानूनी रुप से तीन वित्तीय वर्ष से पुराने बकाया के लिए कुर्की वारंट जारी ही नहीं हो सकता।
वसूली के लिए स्पेरो सॉफ्टेक को ठेका
नगर निगम ने अपने क्षेत्राधिकार में समस्त संपत्तियों का जियो टैग सर्वे करने एवं कर निर्धारण क़े बाद संग्रहण का काम स्पैरो सॉफ्टेक प्रा.लि. कम्पनी को दिया हुआ है। इस कंपनी ने जयपुर शहर में वर्ष 2007 से अब तक की टैक्स वसूली के सीधे ही डिमांड नोटिस थमा दिए हैं। नियमानुसार नगर निगम को पहले बिल भेजना चाहिए था। ​बिल देने के 15 दिन में टैक्स जमा नहीं होने पर ही डिमांड नोटिस दिया जा सकता है। लेकिन, कारोबारियों के अनुसार उन्हें ना बिल भेजा गया और ना ही सर्वे किया गया। उनके पास सीधे डिमांड नोटिस भेज दिए गए।
Photograph: (the sootr)
भारी-भरकम राशि का नोटिस देखकर चौंके
नगर निगम से आए भारी-भरकम राशि के एकाएक नोटिस देखकर जयपुर शहर के लोग चौंक गए। कुछ व्यापारियों ने बताया कि उन्हें यूडी टैक्स के रूप में 30 लाख रुपए तक के नोटिस मिले हैं। अचानक आए इन नोटिसों को एकसाथ जमा कराना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। नगर निगम के इन नोटिसों के खिलाफ कारोबारियों ने आंदोलन की रणनीति बनाई है। चौड़ा रास्ता व्यापार मंडल के अध्यक्ष विवेक भारद्वाज का कहना है कि हम नगर निगम की मनमानी का विरोध करेंगे।
कानूनी तौर पर ऐसे ले सकते है टैक्स
राजस्थान नगर पालिका कानून-2009 के अनुसार निगम की राजस्व शाखा हर साल प्रोपर्टी का मुआयना करने के बाद गणना करके टैक्स तय करेगी। इसके बाद प्रोपर्टी मालिक को यूडी टैक्स का बिल दिया जाएगा। बिल के अनुसार टैक्स की राशि 15 दिन में जमा करवानी होगी।
बिल प्राप्त करने के 15 दिन में टैक्स् जमा नहीं करवाने पर डिमांड नोटिस दिया जाएगा। डिमांड नोटिस देने के 15 दिन में टैक्स जमा नहीं होने पर कुर्की वारंट जारी होता है। कुर्की वारंट जारी करने व प्रोपर्टी अटैच कार्यवाही का अधिकार केवल आयुक्त को ही है।
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तीन साल से पुराने मामले में नहीं होती वसूली
राजस्थान नगर पालिका अधिनियम-2009 की धारा-131 (2) नगर पालिका को देय किसी भी राशि की वसूली के लिए उपधारा-(1) के तहत कुर्की और अटैचमेंट के लिए वारंट तीन साल की अवधि के समाप्त होने के बाद जारी नहीं किया जा सकता। कानून के अनुसार तीन साल से ज्यादा पुराने मामलों में टैक्स की वसूली के लिए ना डिमांड नोटिस जारी हो सकता है और ना ही कुर्की वारंट। इसके लिए निगम को राजस्थान भू-राजस्व कानून के तहत कलक्टर के समक्ष पीडीआर एक्ट के तहत कार्यवाही करनी होती है।
अपनी नाकामी को छिपाता है निगम
कलक्टर के यहां भू-राजस्व कानून के तहत बकाया टैक्स की वसूली कार्यवाही शुरू करने के लिए निगम को हर साल संबंधित प्रोपर्टी का सर्वे, सर्वे के आधार पर तय टैक्स, प्रोपर्टी मालिक को दिया गया बिल, नहीं चुकाने पर जारी डिमांड नोटिस व प्रोपर्टी मालिक पर इनकी तामील के सबूत पेश करने होंगे। क्यों​कि इस रिकार्ड से ही तय होगा कि नगर निगम ने टैक्स वसूली के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया है।
सच्चाई यह है कि निगम ना तो हर साल सर्वे करता है और ना ही टैक्स का बिल देता है। बल्कि उसने प्रोपर्टी का सर्वे करने और टैक्स तय करने की जिम्मेदारी भी प्राईवेट कंपनी को दे दी है। जबकि यह गैर-कानूनी है। क्यों कि कानून के तहत प्रोपर्टी का सर्वे करके टैक्स की गणना करने व बिल जारी करने का काम निगम की राजस्व शाखा का है। प्राईवेट कंपनी का काम सिफ बिल के अनुसार टैक्स का पैसा कलेक्ट करके निगम में जमा करवाने का है।
क्या है यूडी टैक्स यानी नगरीय विकास कर
राजस्थान नगरपालिका अधिनियम- 2009 के तहत राज्य सरकार राज्य की समस्त नगरपालिकाओं, नगर न्यास, नगर परिषद एवं नगर निगमों की परिसीमा में स्थित सम्पत्तियों पर गृहकर को समाप्त कर वित्तीय वर्ष 2007-08 से जो कर लगाया गया है, उसे नगरीय विकास कर कहते है।
नगरीय विकास कर के दायरे में सभी वे सम्पत्तियां आती हैं, जो नियमों के तहत कर के दायरें में आती है। तथा जिन पर नगरीय विकास कर आवासीय,व्यावसायिक,औद्योगिक एवं संस्थानिक के अनुसार लगाया जाता है।
सभी सम्पत्तियां नगरीय विकास कर के दायरें में नहीं आती है। राज्य सरकार के नियमानुसार निम्न सम्पत्तियां ही नगरीय विकास कर के दायरें में आती है।
300 वर्गगज से अधिक के आवासीय भूखण्ड
100 वर्गगज से अधिक के व्यावसायिक भूखण्ड पर या उक्त भूखण्ड पर निर्मित फ्लोर के अनुसार जो 900 वर्गफीट से अधिक हो।
औद्योगिक भूखण्डों पर 500 वर्गगज से अधिक के भूखण्ड या उक्त भूखण्ड के निर्मित फ्लोर के अनुसार जो 4500 वर्गफीट से अधिक हो (औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पादन श्रेणी के उद्योग को छोडकर)।
100 वर्गगज से अधिक के संस्थानिक भूखण्डों पर भूखण्ड या उक्त भूखण्ड पर निर्मित फ्लोर के अनुसार जो 900 वर्गफीट से अधिक हो।
ऐसे होता है यूडी टैक्स का निर्धारण
यूडी टैक्स समस्त 300 वर्गगज से अधिक के रिहायशी मकानों और फ्लैट में 1500 वर्गफीट से अधिक निर्मित क्षेत्र होने पर लगता है।
खाली भूखण्ड पर भी यूडी टैक्स लागू है,लेकिन उक्त भूखण्ड यूडी टैक्स के दायरें में आना चाहिए यानि खाली भूखण्ड 300 एवं व्यावसायिक भूखण्ड 100 वर्गगज से अधिक हो।
100 वर्गगज से अधिक या 900 वर्गफीट से अधिक के व्यावसायिक भूखण्डों पर यूडी टैक्स लगता है।
तीन साल से पुराने टैक्स की वसूली नहीं
कानूनी रुप से नगर निगम तीन साल से पुराने टैक्स की वसूली का नोटिस नहीं दे सकता। इसके लिए निगम को भू—राजस्व कानून के तहत कलक्टर के जरिए वसूली करनी होती है। यूडी टैक्स के लिए हर साल ्रपत्येक प्रोपर्टी का सर्वे करके बिल देना जरुरी है। बिल देने के बाद 15 दिन में टैक्स जमा नहीं हो तो डिमांड नोटिस और इसके बाद भी 15 दिन में जमा नहीं होने पर आयुक्त कुर्की का वारंट दे सकता है। लेकिन,बिना बिल दिए सीधे डिमांड नोटिस देना नियम विरुद्ध है।
विभूति भूषण शर्मा,एडवोकेट राजस्थान हाई कोर्ट
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ना बिल दिया, ना नोटिस दिया
हमको ना तो पहले कभी कोई बिल दिया ना कोई नोटिस दिया और सीधे ही पिछले 18 साल का टैक्स जमा करने का डिमांड नोटिस दिया है। 50—50 गज की कई दुकानों को एक साथ दिखाकर टैक्स मांग रहे हैं। जबकि 100 वर्गगज की दुकान पर कोई टैक्स नहीं है। व्यापारी निगम की मनमानी के खिलाफ आंदोलन करेंगे और जरुरत होने पर अदालत का सहारा लेंगे। विवेक भारद्वाज, अध्यक्ष,चौड़ा रास्ता व्यापार मंडल,जयपुर।