जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026: अनुराग वर्मा का बड़ा दावा, राजस्थान का युवा गहलोत के लिए बेताब

राजस्थान जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में आखिरी दिन 'म‍िलेन‍ियल्‍स और मम्‍मीजी' सेशन में जेन जेड की 'क्रांति' पर चर्चा हुई। इसमें पॉडकास्टर अनुराग माइनस वर्मा, लेखक संतोष देसाई और लेखिका रिया चोपड़ा की चिराग ठक्कर से संवाद हुआ ।

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Purshottam Kumar Joshi
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News In Short

  1. जेएलएफ 2026 के “जेन-Z, मिलेनियल्स और मम्मीजी” सत्र में युवाओं की सोच और उनकी ‘क्रांति’ पर चर्चा हुई।
  2. वक्ताओं ने कहा कि भारतीय समाज बदलाव चाहता है, लेकिन मूलभूत परिवर्तन से अक्सर कतराता है।
  3. जेन-Z राष्ट्रीय स्तर पर एकसमान नहीं, बल्कि राज्यवार अलग-अलग आकांक्षाएं रखता है।
  4. राजस्थान और बिहार में पेपर लीक के खिलाफ जेन-Z के नेतृत्व में आंदोलन हुए।
  5. डिजिटल संस्कृति ने युवाओं के विरोध को व्यक्तिगत और तेज बनाया है।

News In Detail

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 के आखिरी दिन प्रसिद्ध पॉडकास्टर अनुराग माइनस वर्मा, सामाजिक टिप्पणीकार संतोष देसाई और लेखिका रिया चोपड़ा ने लेखक चिराग ठक्कर से बातचीत की। इसमें “जेन-Z, मिलेनियल्स और मम्मीजी” सत्र में युवा पीढ़ी की भूमिका पर गहन चर्चा हुई।

अनुराग माइनस वर्मा ने बातचीत करते हुए कहा कि दिल्ली की जेड जनरेशन टेलर स्विफ्ट कॉन्सर्ट के लिए उतावला हो सकता है। हरियाणा में सपना चौधरी के लिए तो मुंबई मे जोहरान ममदानी के लिए क्रेजी हो सकती है। राजस्थान में भी जेड जनरेशन अशोक गहलोत के लिए बेताब हो सकता है। हर राज्य की अपनी वर्ग-जातिगत दुनिया है, इसलिए समान आकांक्षाओं को एकजुट करना मुश्किल है। 

वक्ताओं ने कहा कि भारतीय समाज प्रगति की बातें करता है, लेकिन वास्तविक बदलाव से हिचकता है। जेन-Z को राष्ट्रीय स्तर पर एकसमान क्रांतिकारी मानना गलत होगा, हालांकि राज्य स्तर पर वह प्रभावी है। राजस्थान और बिहार में पेपर लीक के विरोध में जेन-Z के नेतृत्व वाले आंदोलनों का उदाहरण दिया गया। डिजिटल संस्कृति ने युवाओं को मुद्दों पर संगठित होकर आवाज उठाने की ताकत दी है।

जेन-Z पर बड़ा विमर्श

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (Jaipur Literature Festival) के आखिरी दिन “जेन-Z, मिलेनियल्स और मम्मीजी” सत्र में युवा पीढ़ी की सोच और उसकी ‘क्रांति’ पर गहन चर्चा हुई। इस सत्र में सामाजिक-राजनीतिक बदलाव, डिजिटल संस्कृति और युवा असंतोष जैसे मुद्दे केंद्र में रहे।

परिवर्तन चाहता है समाज, लेकिन बदलाव से डरता है

लेखक संतोष देसाई ने कहा कि भारत एक उभरती महाशक्ति है, लेकिन परिवर्तन का विरोध करने की उसकी क्षमता भी उतनी ही मजबूत है। उनके अनुसार भारतीय समाज प्रगति की बातें तो करता है, लेकिन मूलभूत बदलाव से कतराता है। संतोष देसाई ने कहा कि डिजिटल संस्कृति (Digital Culture) ने विरोध को व्यक्तिगत स्तर पर क्रांतिकारी बना दिया है।
हालांकि छोटे-मोटे आंदोलन होते रहते हैं, लेकिन व्यापक बदलाव अब भी चुनौती बना हुआ है। उन्होंने कहा कि पहले राजनीति का मकसद समाज बदलना था, लेकिन अब समाज ने राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। आज न्यायपालिका और सामाजिक संस्थाएं भी राजनीतिक प्रभाव से अछूती नहीं रहीं।

सत्र में शामिल प्रमुख वक्ता

  • संतोष देसाई-प्रमुख सामाजिक टिप्पणीकार (Social Commentator), विज्ञापन विशेषज्ञ, लेखक और स्तंभकार

  • अनुराग माइनस वर्मा-फिल्म निर्माता, लेखक और पॉडकास्टर 

  • रिया चोपड़ा-लेखिका, स्वतंत्र पत्रकार और सांस्कृतिक टिप्पणीकार

  • संचालन: चिराग ठक्कर- संपादक और लेखक

हर राज्य का जेन-Z अलग सोच रखता है

पॉडकास्टर अनुराग माइनस वर्मा ने कहा कि जेन-Z को एक समान मानना गलत है। दिल्ली का जेन-Z टेलर स्विफ्ट के कॉन्सर्ट के लिए उत्साहित हो सकता है, जबकि राजस्थान का जेन-Z अशोक गहलोत के लिए। उन्होंने कहा कि हर राज्य की अपनी वर्गीय और जातिगत संरचना होती है। इसी कारण जेन-Z की आकांक्षाओं को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट करना आसान नहीं है।

राष्ट्रीय स्तर पर सीमित, राज्य स्तर पर प्रभावी

वक्ताओं ने माना कि जेन-Z राष्ट्रीय स्तर पर अभी इतना प्रभावशाली नहीं है कि बड़ी क्रांति ला सके। लेकिन राज्य स्तर पर वह बेहद सक्रिय है और व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। अनुराग माइनस वर्मा ने कहा कि राजस्थान और बिहार में पेपर लीक (Paper Leak) के खिलाफ जेन-Z के नेतृत्व में आंदोलन हुए। ये आंदोलन युवाओं के असंतोष और व्यवस्था से टकराव को दर्शाते हैं।

जेन-Z आंदोलन की खास बातें

  • मुद्दा आधारित विरोध

  • सोशल मीडिया से संगठित

  • व्यवस्था के खिलाफ सीधा सवाल

  • राज्य स्तर पर ज्यादा प्रभाव

“जेन-Z की क्रांति मुझे पसंद है”

सांस्कृतिक टिप्पणीकार रिया चोपड़ा ने कहा कि जेन-Z की तथाकथित क्रांति उन्हें बेहद पसंद है। उनके अनुसार यह उन पुरानी प्रणालियों के खिलाफ पीढ़ीगत विद्रोह है, जो अब काम नहीं कर रहीं। रिया चोपड़ा ने कहा कि मिलेनियल्स (Millennials) पर्माक्राइसिस यानी स्थायी संकट में जी रहे हैं। स्वास्थ्य, राजनीति और जलवायु परिवर्तन जैसी विफलताओं को देखने के बावजूद हम सक्रिय नहीं हो पा रहे। उन्होंने दिल्ली प्रदूषण का उदाहरण देते हुए कहा कि समस्या सब जानते हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती। यही निष्क्रियता जेन-Z को खुद आगे बढ़कर कदम उठाने के लिए प्रेरित करती है।

रिश्तों और प्यार की नई भाषा

रिया चोपड़ा ने कहा कि जेन-Z का प्यार करने का तरीका अलग है, लेकिन भावनाएं वही हैं। सिचुएशनशिप और बेंचिंग जैसे नए शब्द रिश्तों की नई भाषा को दिखाते हैं। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया (Social Media) के कारण जेन-Z के बीच भरोसे की कमी भी बढ़ी है। लैंगिक असमानता और रिश्तों को लेकर नए तरह के टैबू बनते जा रहे हैं।

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