दीपावली पर जयपुर नगर निगम का अजीब रूट प्लान: निजी कंपनी की दूरी घटी, निगम के कॉम्पैक्टर पर बढ़ा बोझ
Ashish Bhardwaj | Oct 16, 2026, 11:21 IST
जयपुर नगर निगम
दिवाली से पहले जयपुर में साफ-सफाई का काम तेजी से चल रहा लेकिन नगर निगम ने कचरा उठाकर ले जाने की व्यवस्था में जो बदलाव किया है, उससे परेशानी बढ़ गई। बिना लिखित आदेश के लागू इस नई व्यवस्था में निगम की गाड़ियों को पहले से ज्यादा दूरी तय करनी पड़ रही। इससे कचरा उठाने में ज्यादा समय लग रहा है और सफाई का काम भी प्रभावित हो रहा।
दीपावली पर शहरवासी घरों की सफाई में जुटे हैं। वहीं, जयपुर नगर निगम की कचरा ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो रहे। आरोप है कि कचरा उठाने का रूट बदलने से निजी ठेका कंपनी के वाहनों की दूरी घट गई, जबकि नगर निगम के कॉम्पैक्टर को ज्यादा चलना पड़ रहा। यह बदलाव भी किसी लिखित आदेश के बजाय मौखिक व्यवस्था के जरिए किया गया है।
मामला मुरलीपुरा और विद्याधर नगर जोन से निकलने वाले कचरे को सेवापुरा डंपिंग यार्ड तक पहुंचाने का है। नगर निगम की गैराज शाखा ने करीब सात दिन पहले कचरा ट्रांसफर करने का रूट बदल दिया। पहले निगम के कॉम्पैक्टर कचरा कालवाड़ रोड डिपो तक पहुंचाते थे। अब उन्हें सीकर रोड स्थित टोडी मोड़ डिपो तक भेजा जा रहा। यह डिपो कालवाड़ रोड डिपो से करीब 12 किलोमीटर आगे है।
इस बदलाव से निजी कंपनी को कचरा उठाने और सेवापुरा पहुंचाने में कम दूरी तय करनी पड़ रही। दूसरी ओर, निगम के वाहनों को अतिरिक्त दूरी और समय खर्च करना पड़ रहा।
नगर निगम के झोटवाड़ा, मुरलीपुरा, मानसरोवर और विद्याधर नगर जोन का कचरा अलग-अलग डिपो से उठाकर सेवापुरा पहुंचाने का काम विवेक एंटरप्राइजेज के पास है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, टेंडर में कंपनी के लिए प्रतिदिन 700 टन कचरा ट्रांसपोर्ट करने का लक्ष्य तय है।
इस काम के लिए कंपनी को रोज करीब 1.94 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है। इस हिसाब से 30 दिन का भुगतान लगभग 58.33 लाख रुपये बैठता है। मुरलीपुरा और विद्याधर नगर जोन का कचरा कंपनी को कालवाड़ रोड डिपो से उठाकर सेवापुरा डंपिंग यार्ड तक पहुंचाना होता है।
कालवाड़ रोड डिपो तक कचरा पहुंचाने की जिम्मेदारी नगर निगम की है लेकिन पिछले सात दिनों से निगम के कॉम्पैक्टर कचरा टोडी मोड़ डिपो तक पहुंचा रहे हैं। यहां से निजी कंपनी के वाहन कचरा उठाकर सेवापुरा ले जा रहे हैं, जो टोडी मोड़ से करीब तीन किलोमीटर दूर बताया गया है।
मुरलीपुरा और झोटवाड़ा क्षेत्र में करीब 60 हूपर घर-घर से कचरा इकट्ठा करते हैं। ये वाहन कचरा सीकर रोड पर नंबर एक चौराहे, यानी परशुराम चौराहे के पास स्थित डिपो तक पहुंचाते हैं।
इसके बाद नगर निगम के तीन रिफ्यूज कॉम्पैक्टर कचरे को कालवाड़ रोड डिपो तक ले जाते थे। एक कॉम्पैक्टर एक बार में करीब सात टन कचरा ले जाता है। पांच चक्करों में एक कॉम्पैक्टर करीब 35 टन कचरा ट्रांसफर कर सकता है।
नई व्यवस्था में हूपर का रूट पहले जैसा ही है। बदलाव सिर्फ इसके बाद कचरा ले जाने वाले कॉम्पैक्टर के रूट में किया गया है। अब इन्हें कालवाड़ रोड के बजाय टोडी मोड़ डिपो तक जाना पड़ रहा है।
दिए गए दूरी के आंकड़ों के मुताबिक, रूट बदलने के बाद एक कॉम्पैक्टर को हर चक्कर में आने-जाने की करीब 24 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। पांच चक्करों में यह दूरी 120 किलोमीटर हो जाती है। इसके साथ करीब दो घंटे तक अतिरिक्त समय भी लग रहा।
वहीं, निजी कंपनी के वाहन पहले कालवाड़ रोड से कचरा उठाकर सेवापुरा पहुंचने के लिए करीब 30 किलोमीटर का चक्कर लगाते थे। नई व्यवस्था में टोडी मोड़ से सेवापुरा और वापस की दूरी करीब छह किलोमीटर बताई गई है। यानी एक चक्कर में लगभग 24 किलोमीटर की दूरी कम हो रही है।
इन आंकड़ों के आधार पर निगम के कॉम्पैक्टर के अतिरिक्त चक्कर और निजी कंपनी के वाहनों की कम हुई दूरी के बीच बड़ा अंतर नजर आता है। हालांकि, वास्तविक डीजल खर्च और कुल वित्तीय नुकसान का आकलन करने के लिए वाहनवार लॉगबुक, ईंधन रिकॉर्ड और टेंडर की शर्तों की जांच जरूरी है।
कचरा गाड़ियों का रूट बदलने को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि व्यवस्था किसके आदेश पर बदली गई और इसका लिखित रिकॉर्ड कहां है। यदि निगम के वाहनों पर अतिरिक्त दूरी और समय का बोझ बढ़ा है, तो बदलाव के पीछे का कारण स्पष्ट होना चाहिए।
ठेका कंपनी को फायदा पहुंचाने की आशंका से जुड़े सवाल पर नगर निगम की गैराज शाखा के एक्सईएन गोपाल मूढ़ ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। बाद में उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही और फोन रख दिया।
अब सवाल यह है कि रूट बदलने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? क्या इसके लिए कोई लिखित आदेश जारी हुआ था? और क्या निगम ने इस बदलाव से होने वाले खर्च का आकलन किया? इन सवालों के जवाब जांच और संबंधित रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट होंगे।
कचरा उठाने का रूट बदलने से डंपिंग यार्ड की दूरी बढ़ी
इस बदलाव से निजी कंपनी को कचरा उठाने और सेवापुरा पहुंचाने में कम दूरी तय करनी पड़ रही। दूसरी ओर, निगम के वाहनों को अतिरिक्त दूरी और समय खर्च करना पड़ रहा।
निजी कंपनी को रोजाना 1.94 लाख रुपये का भुगतान
इस काम के लिए कंपनी को रोज करीब 1.94 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है। इस हिसाब से 30 दिन का भुगतान लगभग 58.33 लाख रुपये बैठता है। मुरलीपुरा और विद्याधर नगर जोन का कचरा कंपनी को कालवाड़ रोड डिपो से उठाकर सेवापुरा डंपिंग यार्ड तक पहुंचाना होता है।
कालवाड़ रोड डिपो तक कचरा पहुंचाने की जिम्मेदारी नगर निगम की है लेकिन पिछले सात दिनों से निगम के कॉम्पैक्टर कचरा टोडी मोड़ डिपो तक पहुंचा रहे हैं। यहां से निजी कंपनी के वाहन कचरा उठाकर सेवापुरा ले जा रहे हैं, जो टोडी मोड़ से करीब तीन किलोमीटर दूर बताया गया है।
60 हूपर, तीन कॉम्पैक्टर और पांच चक्कर
इसके बाद नगर निगम के तीन रिफ्यूज कॉम्पैक्टर कचरे को कालवाड़ रोड डिपो तक ले जाते थे। एक कॉम्पैक्टर एक बार में करीब सात टन कचरा ले जाता है। पांच चक्करों में एक कॉम्पैक्टर करीब 35 टन कचरा ट्रांसफर कर सकता है।
नई व्यवस्था में हूपर का रूट पहले जैसा ही है। बदलाव सिर्फ इसके बाद कचरा ले जाने वाले कॉम्पैक्टर के रूट में किया गया है। अब इन्हें कालवाड़ रोड के बजाय टोडी मोड़ डिपो तक जाना पड़ रहा है।
जयपुर नगर निगम पर अतिरिक्त दूरी और समय का बोझ
वहीं, निजी कंपनी के वाहन पहले कालवाड़ रोड से कचरा उठाकर सेवापुरा पहुंचने के लिए करीब 30 किलोमीटर का चक्कर लगाते थे। नई व्यवस्था में टोडी मोड़ से सेवापुरा और वापस की दूरी करीब छह किलोमीटर बताई गई है। यानी एक चक्कर में लगभग 24 किलोमीटर की दूरी कम हो रही है।
इन आंकड़ों के आधार पर निगम के कॉम्पैक्टर के अतिरिक्त चक्कर और निजी कंपनी के वाहनों की कम हुई दूरी के बीच बड़ा अंतर नजर आता है। हालांकि, वास्तविक डीजल खर्च और कुल वित्तीय नुकसान का आकलन करने के लिए वाहनवार लॉगबुक, ईंधन रिकॉर्ड और टेंडर की शर्तों की जांच जरूरी है।
रूट बदलने का मौखिक आदेश किसने दिया?
ठेका कंपनी को फायदा पहुंचाने की आशंका से जुड़े सवाल पर नगर निगम की गैराज शाखा के एक्सईएन गोपाल मूढ़ ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। बाद में उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही और फोन रख दिया।
अब सवाल यह है कि रूट बदलने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? क्या इसके लिए कोई लिखित आदेश जारी हुआ था? और क्या निगम ने इस बदलाव से होने वाले खर्च का आकलन किया? इन सवालों के जवाब जांच और संबंधित रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट होंगे।
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