जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 : हिमालय सभी धर्म और शिक्षा के एकाकार होने का स्थल

राजस्थान में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में रूसी विद्वान व्लादिमीर जाइत्सेव और लेखक व पर्यावरणविद स्टीफन ऑल्टर ने हिमालय की बहुआयामी तस्वीर पर संवाद किया। यह बताया कि हिमालय में जानकर सभी धर्म व शिक्षाएं एकाकार हो जाती हैं।

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Purshottam Kumar Joshi
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Photograph: (the sootr)

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जेएलएफ 2026. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 के दूसरे दिन रूसी विद्वान व्लादिमीर जाइत्सेव और लेखक व पर्यावरणविद स्टीफन ऑल्टर ने प्रसिद्ध कलाकार और दार्शनिक निकोलस रोएरिच के जीवन, यात्राओं और कृतियों के माध्यम से हिमालय की बहुआयामी तस्वीर को प्रस्तुत किया। "रोएरिच:हिमालयन विस्तास" नाम के इस सत्र में हिमालय को केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि संस्कृति,इतिहास और आध्यात्म की जीवित परंपरा के रूप में देखने पर जोर दिया गया।

धर्म गुरु दलाई लामा की दार्जिलिंग यात्रा

दोनों के संवाद में यह सामने आया कि हिमालय दृश्य सौंदर्य ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव है, जहां सभी धर्म व शिक्षाएं एकाकार हो जाती हैं। इतना ही नहीं हिमालय संस्कृति,इतिहास तथा आध्यात्म की जीवित परंपरा है। जाइत्सेव ने कहा कि दार्जिलिंग खूबसूरत हिल स्टेशन मात्र नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक केंद्र रहा है।

दार्जिलिंग में कई महान लोगों ने अपने जीवन की अंतिम सांस ली है। संस्कृत के विद्वान डॉ.शेवात्स्की भी यहां ठहरे थे। तिब्बत छोड़ने के बाद 1910 बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा का दार्जिलिंग में आकर रहना इस क्षेत्र के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व का सबूत है। सत्र में दार्जिलिंग को महान पर्वतारोहियों और शेरपाओं की धरती बताते हुए तेनजिंग नोर्गे को भी याद किया गया। 

हिमालय का आध्यात्मिक अनुभव

रोएरिच की प्रसिद्ध पेंटिंग ‘एक्स्टेसी’ और उनके लेखन का जिक्र करते हुए जाइत्सेव ने बताया कि उनके लिए हिमालय केवल दृश्य सौंदर्य नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव था। रोएरिच ने लिखा है कि हिमालय में सभी धर्म और शिक्षाएं एक हो जाती हैं। 

वक्ताओं ने रोएरिच की ट्रांस-हिमालयन यात्रा का भी उल्लेख किया जो लद्दाख से लेकर चीन, मंगोलिया, तिब्बत और साइबेरिया तक फैली। इस अभियान में 35 से अधिक पर्वतीय दर्रे पार किए गए और एकत्र सामग्री अमेरिका भेजी गई। सत्र में कहा गया कि रोएरिच की कला और यात्राएं आज भी हिमालय को समझने की नई दृष्टि देती हैं। 

हिंदी साहित्य को नई आवाज दे रहे पॉडकास्ट

हिंदी साहित्य,पॉडकॉस्ट और डिजिटल माध्यम के प्रभाव व भूमिका पर सत्र : इस सत्र में लेखक जयप्रकाश पांडे, अंजुम शर्मा, अनुराग वर्मा और आरती जैन ने अपने विचार साझा किए। उनका मानना है कि पॉडकास्ट रोचक अंदाज में साहित्य को आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस के बाद रामलीला शुरू कर साहित्य को लोक से जोड़ा, आज वही काम पॉडकास्ट कर रहे हैं। 

ऑडियो पॉडकास्ट की लोकप्रियता

जयप्रकाश पांडे ने कहा कि पुस्तक व्यवसाय शिक्षा और ज्ञान का एक सशक्त माध्यम है जो लेखकों को लोकप्रिय बनाने के साथ आलोचकों को पहचान दिलाता है। लेकिन,पॉडकास्ट रोचक अंदाज में साहित्य को आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं। जिस प्रकार तुलसीदास ने रामचरितमानस के बाद रामलीला शुरू कर साहित्य को लोक से जोड़ा था।

आज वही काम पॉडकास्ट कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि  कोविड काल में ऑडियो पॉडकास्ट को विशेष लोकप्रिय हुआ क्यों कि इसमें वीडियो देखने की जहमत नहीं है, आंखों को आराम है और कहानी आसानी से सुनी जाती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म सशक्त जरिया

अंजुम शर्मा ने कहा कि पॉडकास्ट के जरिए बिना किसी समय सीमा के अपनी बात रखी जा सकती है। उन्होंने 100 से अधिक लेखकों के इंटरव्यू कर साहित्य को रुचिकर बनाने के प्रयोग किए हैं। अनुराग वर्मा ने कहा कि हर माध्यम की अपनी उपयोगिता है और डिजिटल प्लेटफॉर्म युवाओं तक पहुंचने का सबसे सशक्त जरिया है।

आरती जैन ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2020 से हिंदी कहानियों के पॉडकास्ट शुरू किए और श्रोताओं का भरपूर समर्थन मिला लेकिन,किताबों का महत्व बना रहेगा और साहित्य अब पॉडकास्ट,सोशल मीडिया,लोक संगीत और फिल्मों के जरिए और व्यापक रूप में सामने आएगा।

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