पहली बार 93 साल की अम्मा का होगा डीएनए टेस्ट, हाई कोर्ट ने सुना दिया बड़ा आदेश

राजस्थान में कृषि भूमि को लेकर शुरू हुई लड़ाई हाई कोर्ट पहुंच गई। हैरानी की बात तो यह है कि एक मां ने बेटी को पहचानने से इनकार कर दिया। बेटी ने हाई कोर्ट में संपति के लिए याचिका दायर की है। कोर्ट ने 93 वर्षीय महिला को डीएनए टेस्ट करवाने के आदेश दिए है।

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Purshottam Kumar Joshi
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Dna order

Photograph: (the sootr)

News in Short

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने 93 वर्षीय महिला को डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया।

  • महिला ने अपनी बेटी को पहचानने से इनकार किया, जिससे मामला और पेचीदा हो गया।

  • यह मामला 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' के तहत आया, जिसमें मातृत्व को नकारने का मुद्दा था।

  • हाईकोर्ट ने कहा कि डीएनए टेस्ट ही इस सत्य को साबित करने का एकमात्र तरीका है।

  • अगर महिला टेस्ट से मना करती है, तो अदालत याचिकाकर्ता के पक्ष में धारणा बना सकती है।

News in Detail

राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश पर 93 साल की महिला बीला देवी को यह साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट कराना होगा कि याचिकाकर्ता 70 वर्षीय भौरी देवी उसकी सगी बेटी है या नहीं। यह पूरा मामला ‘मातृत्व’ को नकारने से जुड़ा है। यह भारतीय कानून में अब तक एक अनूठा और दुर्लभ मामला माना जा रहा है। जस्टिस बिपिन गुप्ता और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इसे 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' करार दिया है।

मामले की शुरुआत

इस मामले की कानूनी लड़ाई एक पुश्तैनी कृषि भूमि को लेकर शुरू हुई थी। याचिकाकर्ता महिला 70 वर्षीय भौरी देवी के पिता ने 2014 में अपनी संपत्ति के लिए एक वसीयत रजिस्टर्ड करवाई थी। जब बेटी को इस वसीयत के बारे में पता चला, तो उसने इसे अदालत में चुनौती दी। उसका तर्क था कि पिता ने संपत्ति की वसीयत नहीं की जा सकती। इसके बाद, उसने अपनी मां के साथ संपत्ति का आधा हिस्सा मांग लिया। इसी विवाद में ट्विस्ट तब आया जब मां और दो अन्य लोगों ने कोर्ट में दावा किया कि याचिकाकर्ता महिला उनकी बेटी नहीं है।

विवादित संपत्ति का विवरण 

भौरी देवी का कहना है कि विवादित कृषि भूमि उनकी पैतृक संपत्ति है। उनके अनुसार, इस भूमि के बदले उनके पिता को राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास और निवेश निगम की योजना के तहत आठ प्लॉट मिले थे। भौरी देवी के मुताबिक, यह भूमि पारिवारिक संपत्ति होने के कारण इस पर उनका और उनकी मां का बराबरी का हक बनता है। भौरी देवी ने यह भी तर्क दिया कि उनके पिता की वसीयत अवैध है, क्योंकि संपत्ति पर उनका अधिकार पहले से ही निर्धारित था।

कानूनी संघर्ष का रास्ता

भौरी देवी ने इस संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए सिविल कोर्ट में एक सूट दायर किया है। यह मामला न केवल संपत्ति के अधिकार से जुड़ा है, बल्कि इसमें उनकी व्यक्तिगत पहचान और परिवार के अधिकारों का भी सवाल उठता है। यह कानूनी ड्रामा इस बात का प्रतीक है कि किस प्रकार संपत्ति विवाद कभी-कभी परिवारों में असहमति और पहचान के संकट को जन्म देते हैं। भौरी देवी का मानना है कि अगर इस संपत्ति का सही तरीके से बंटवारा नहीं किया गया, तो उनके और उनके परिवार के भविष्य के लिए यह बड़ा संकट पैदा हो सकता है।

'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' मामला

हाई कोर्ट ने इस अनूठे मामले पर गहरी हैरानी जताई। जस्टिस गुप्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आमतौर पर पितृत्व को लेकर विवाद होते हैं, लेकिन यह मामला बेहद दुर्लभ है। इसमें एक मां अपने बच्चे को नकार रही है। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम और नए भारतीय साक्ष्य संहिता 2023 का हवाला देते हुए कहा कि कानून में शादी के दौरान पैदा हुए बच्चे के पितृत्व के बारे में स्पष्ट प्रावधान हैं, लेकिन मातृत्व को नकारने जैसी स्थिति कभी कल्पना की नहीं गई थी।

राइट टू प्राइवेसी बनाम सच का अधिकार 

निचली अदालत ने पहले इस मामले में बेटी की डीएनए टेस्ट की मांग खारिज कर दी थी, यह कहते हुए कि यह बुजुर्ग महिला की निजता का उल्लंघन होगा। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि एक बच्चे के लिए यह साबित करना बहुत कठिन है कि वह किसका है, और जब मातृत्व को लेकर कोई स्पष्ट धारणा नहीं है, तो डीएनए टेस्ट ही इसका एकमात्र वैज्ञानिक समाधान है।

सुरक्षा कवच और टेस्ट पर अदालत का आदेश 

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि किसी को भी डीएनए टेस्ट के लिए जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर 93 वर्षीय मां टेस्ट कराने से मना करती है या उपस्थित नहीं होती है, तो अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत याचिकाकर्ता के पक्ष में 'धारणा' बना सकती है। इसका मतलब है कि मां का इनकार बेटी के दावे की पुष्टि के रूप में माना जाएगा।

फैसले का महत्व 

यह फैसला बदलते हुए पारिवारिक दृष्टिकोण और कानूनी शून्यता को भरता है। कोर्ट ने माना कि जब विज्ञान के पास सत्य साबित करने के पुख्ता साधन हैं, तो किसी बच्चे को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। इस निर्णय से कानूनी दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलता है, जो आधुनिक समाज की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए है।

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