अपनाघर को मिली वैश्विक मान्यता, इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्डस में नाम दर्ज

राजस्थान के भरतपुर में निराश्रितों की सेवा में समर्पित अपनाघर आश्रम को वैश्विक मान्यता मिली है। उसका नाम इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्डस में दर्ज हुआ है।

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Ashish Bhardwaj
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Photograph: (the sootr)

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News In Short

  • 'अपना घर' आश्रम को इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में वैश्विक मान्यता मिली।
  • अब तक 65,000 से अधिक प्रभुजनों को सुरक्षित आश्रय और इलाज दिया गया है।
  • संस्था 12 राज्यों और नेपाल में 70 आश्रम चला रही है।
  • प्रतिदिन 30 लाख रुपए का खर्च आता है, जो पूरी तरह से ईश्वरीय आस्था पर आधारित है।
  • आश्रम में हर प्रभुजन के लिए व्यक्तिगत सेवा और अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

News In Short

राजेश खण्डेलवाल@ भरतपुर

राजस्थान के भरतपुर में ढाई दशक से निराश्रितों की सेवा में समर्पित मां माधुरी बृज वारिस सेवा सदन 'अपना घर' को  इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्डस में वैश्विक मान्यता दी गई है।  अपनाघर आश्रम में 6,602 प्रभुजनों (निराश्रितों) को सुरक्षित आश्रय और उपचार सहित जीवन यापन की सभी मूलभूत सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं।

6500 बेसहारा का कर चुके इलाज

अपनाघर आश्रम के राष्ट्रीय सचिव विनोद सिंघल बताते हैं कि वर्ष 2000 में शुरू हुई इस यात्रा में अब तक 65,000 से अधिक प्रभुजनों को प्रवेश दिया जा चुका है। संस्था 36 हजार से ज्यादा प्रभुजनों को स्वस्थ कर उनके अपनों से मिला चुकी है और देश के कोने-कोने में स्थित उनके घरों तक सम्मानपूर्वक पहुंचा चुकी है। 

12 राज्यों में 70 आश्रम संचालित

संस्था के 12 राज्यों में तथा नेपाल सहित कुल  70 आश्रम संचालित हैं। इनमें 16 हजार से अधिक प्रभुजी रहकर सेवाएं ले रहे हैं। इनकी सेवा में 1,500 स्टाफ और 240 वाहनों का बेड़ा (100 एम्बुलेंस) लगा है। संस्था से प्रत्यक्ष व परोक्ष 10 लाख से ज्यादा लोग जुड़े हैं, जबकि डेढ़ लाख से अधिक सहयोगियों ने केवल 1 वर्ष में विभिन्न केंद्रों में अपनी सेवाएं व सहयोग प्रदान किया है।

30 लाख रुपए रोज का खर्चा 

अपनाघर की विशेषता यह है कि बिना चंदा, बिना सरकारी सहायता संस्था का संचालन पूरी तरह ईश्वरीय आस्था पर टिका है। प्रतिदिन 30 लाख रुपए (केवल भरतपुर केंद्र पर 7.5 लाख रुपए) का खर्चा होता है। मात्र कोटा, जयपुर व अजमेर आश्रम को आंशिक राजकीय सहयोग प्राप्त है, जो संस्था के कुल बजट का 2 प्रतिशत से भी कम है।

रोज लिखते हैं ठाकुर जी को पाती

दैनिक आवश्यकताओं के लिए प्रतिदिन ठाकुर जी को पाती (चिट्टी) लिखी जाती है और प्रभु कृपा से सेवा का यह चक्र निर्बाध चलता रहता है। यहां अपना घर आश्रम, भरतपुर में प्रभुजनों के लिए ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जो दुनिया के किसी भी सेवा केंद्र के लिए मिसाल हैं। 

अत्याधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध

यहां प्रभुजनों के लिए पूरी तरह नि:शुल्क कैफेटेरिया, सिनेमा हॉल, शॉपिंग सेंटर और स्प्रीचुअल पार्क संचालित हैं। वर्गीकृत देखभाल के हिसाब से यहां हर बीमार व्यक्ति तक व्यक्तिगत सेवा पहुंचाने के लिए माता-बहनों और पुरुषों के लिए उनकी बीमारी के अनुसार 26-26 अलग-अलग तरह के वार्ड (होम्स) बनाए गए हैं।

आस्था का केन्द्र हैं अपनाघर

यहां की ईश्वरीय एवं आध्यात्मिक सेवा के कारण यह भरतपुर का अपना घर एक आस्था का केंद्र बनता जा रहा है, जिसमें देश भर से लोग  बसों और निजी वाहनों पर अपना घर तीर्थ यात्रा का बैनर लगाकर यहां की निस्वार्थ सेवा को देखने और जुडऩे आते हैं।

बढ़ती जिम्मेदारी का प्रतीक

संस्था इस विश्व रिकॉर्ड को कोई व्यक्तिगत उपलब्धि न मानकर अपनी बढ़ती हुई जिम्मेदारी के रूप में देखती है। संस्था का मूल संकल्प है कि किसी भी असहाय को संसाधनों के अभाव में प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा। यह रिकॉर्ड उन हजारों बेसहारा लोगों की मुस्कान को समर्पित है, जिन्हें यहां नया जीवन मिला है तथा उन सेवाभावी, सहयोगी, सेवा साथी एवं दिन रात सेवा में सेवारत रहे उन सहयोगियों के लिए है, जो इन असहाय बीमार प्रभु जनों की सेवा को अपनी पूजा एवं आराधना मानते हैं।

- डॉ. बीएम भारद्वाज
संस्थापक, अपनाघर आश्रम, भरतपुर।

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राजस्थान भरतपुर संस्थापक राष्ट्रीय अपना घर आश्रम
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