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Photograph: (the sootr)
Jaipur: इस सप्ताह की चिट्ठी राजस्थान के बहुआयामी चरित्र को दर्शाती है। मरुधरा की तासीर में ही कुछ ऐसा है कि यहां की हवाएं कभी रेत के टीलों को उड़ाती हैं, तो कभी सत्ता के गलियारों में बड़े उलटफेर कर जाती हैं। एक तरफ सियासत है जहां बजट की लंबाई और नेताओं के बीच तंज का स्तर गिरता-बढ़ता रहा है। दूसरी तरफ समाज है जो अपने खेजड़ी के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। यहां पावर कपल के रिश्तों का बिखराव है,तो भरतपुर के पूर्व राजपरिवार में रिश्तों की पुनरावृत्ति भी है।
​बजट का 'मैराथन' और आंकड़ों की 'सहनशक्ति'
​राजस्थान की विधानसभा में इस सप्ताह भजनलाल सरकार का तीसरा बजट पेश हुआ। बुधवार को जब बजट भाषण शुरू हुआ, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह आंकड़ों का खेल एक 'स्टैमिना टेस्ट' बन जाएगा। ​पूरे 2 घंटे 54 मिनट तक सदन में बजट भाषण चला। यह राजस्थान के इतिहास का दूसरा सबसे लंबा बजट भाषण बन गया।
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दिलचस्प बात यह है कि पिछले तीन साल में डिप्टी सीएम दीया कुमारी के भाषण की अवधि 2:17 घंटे से शुरू होकर 2:54 तक पहुंच गई है। राजनीतिक गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि अब बजट केवल विजन का नहीं, बल्कि वित्त मंत्री की 'वाक-शक्ति' का भी पैमाना है। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का 3 घंटे 20 मिनट का वह 'अजेय' रिकॉर्ड आज भी सुरक्षित है, जो किसी भी नेता के लिए हिमालय फतह करने जैसा है।
​जब मेंटल हॉस्पिटल बना 'सियासी तंज' ​
बजट में मेंटल हॉस्पिटल खोलने का प्रस्ताव जनहित के लिए था, लेकिन नेताओं के बीच इसने 'कॉमेडी शो' जैसा मोड़ ले लिया। कांग्रेस के गोविंद सिंह डोटासरा चुटकी लेते हुए कहते दिखे कि इसे रामगंजमंडी (मदन दिलावर का क्षेत्र) में खोला जाए, तो शिक्षा मंत्री दिलावर ने भी देर नहीं की। उन्होंने पलटवार करते हुए सीकर (डोटासरा का गृह जिला) का नाम उछाल दिया और कहा कि वहां के एक 'बड़े नेता' को इसकी सख्त जरूरत है। यह बहस राजस्थान की उस 'सियासी अदावत' का हिस्सा है, जहां गंभीर मुद्दे भी व्यक्तिगत छींटाकशी की भेंट चढ़ जाते हैं।
​विधानसभा: जहां मर्यादाएं 'कैमरे' में कैद हुईं
​लोकतंत्र का मंदिर कही जाने वाली राजस्थान विधानसभा इस सप्ताह कुछ ऐसी तस्वीरों की गवाह बनी, जो शोभा नहीं देतीं। ​कांग्रेस विधायक रोहित बोहरा का एक अभद्र इशारा कैमरे में कैद हो गया। गनीमत रही कि उस वक्त सदन में हंगामा चल रहा था और किसी की नजर नहीं पड़ी, वरना यह मुद्दा हफ्तों तक सदन की कार्यवाही रोक सकता था।
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बजट सत्र में मर्यादाएं लांघने का यह पहला मामला नहीं है। बोहरा से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शांति धारीवाल पिछले सप्ताह सदन में खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाए। मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग को जवाब देते हुए उन्होंने अंत में जिस 'शब्दावली' का प्रयोग किया, उसने सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाई। ​विचारणीय बिंदु यह रहा कि क्या हमारे जनप्रतिनिधि यह भूल रहे हैं कि आज सोशल मीडिया के दौर में सदन की हर हलचल जनता की सीधी नजर में है।
खेजड़ी का 'विजयरथ': विश्नोई समाज की चेतना
​इस सप्ताह की सबसे सुकून देने वाली खबर पश्चिमी राजस्थान के धोरों से आई। खेजड़ी, जिसे राजस्थान का 'कल्पवृक्ष' कहा जाता है, उसे बचाने की जंग में विश्नोई समाज की जीत हुई। खेजड़ी कटाई के ​​आंकड़े डराने वाले हैं। सोलर हब बनाने के नाम पर अब तक 25 लाख खेजड़ी पेड़ काटे जा चुके हैं। पर्यावरणविदों का अनुमान है कि अगर यही रफ्तार रही, तो अगले 5 साल में 50 लाख पेड़ इतिहास बन जाएंगे। लेकिन, बीकानेर में दो फरवरी से शुरू हुए आंदोलन ने सरकार को घुटनों पर ला दिया।
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राज्य मंत्री केके बिश्नोई का गुरुवार देर रात को धरना स्थल पर पहुंचना और सरकारी चिट्ठी के साथ 'पूर्ण प्रतिबंध' की घोषणा करना लोकतंत्र की बड़ी जीत है। अब प्रदेश में खेजड़ी की कटाई रोकने के लिए बजट सत्र में एक विशेष संरक्षण कानून आ सकता है। विश्नोई समाज का यह आंदोलन याद दिलाता है कि राजस्थान की संस्कृति में पेड़ केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य है।
​भरतपुर का 'मोती महल': बगावत के बाद घर वापसी​
भरतपुर राजपरिवार की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रही। पिछले पांच साल से जो 'मोती महल' कानूनी लड़ाई और कड़वाहट का केंद्र था, वहां इस सप्ताह सुलह की बयार बही। पहले विश्वेंद्र सिंह और पुत्र अनिरुद्ध सिंह एक रिसॉर्ट में मिलते नजर आए, जिसकी तस्वीर खुद विश्वेंद्र ने सोशल मीडिया पर साझा की।
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पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह और उनके पुत्र अनिरुद्ध के बीच की दूरियां मिटना न केवल परिवार, बल्कि भरतपुर के पूरे सिनसिनवार जाट समुदाय के लिए भावनात्मक क्षण रहा। पिता-पुत्र के मिलन के बाद
मोती महल पर रियासतकालीन झंडा फहराने का विवाद भी शांत हो गया।
​दरअसल, अनिरुद्ध द्वारा रियासतकालीन झंडा उतारने के बाद जो विवाद पैदा हुआ था, उसे खुद विश्वेंद्र सिंह ने दोबारा झंडा फहराकर शांत कर दिया। यह घटना पूरे राजस्थान में चर्चा में रही।
​'पावर कपल' का कानूनी अलगाव
​प्रशासनिक गलियारों में इस हफ्ते एक 'परफेक्ट जोड़ी' के टूटने की खबर ने सबको चौंका दिया। आईएएस आशीष मोदी और भारती दीक्षित की राहें अब आधिकारिक तौर पर जुदा हो गई हैं। ​फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2025 में ही उनके तलाक की डिक्री जारी कर दी थी, लेकिन इसका खुलासा इस सप्ताह हाईकोर्ट के एक फैसले से हुआ।
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आईएएस आशीष मोदी ने अपने ऊपर दर्ज एफआईआर को खत्म करने की अपील की थी, जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए स्वीकार कर लिया कि जब वैवाहिक संबंध ही खत्म हो गए और दोनों में समझौता हो गया, तो आपराधिक मुकदमों का कोई औचित्य नहीं है। यह खबर प्रशासनिक अधिकारियों के निजी जीवन के दबावों और कानूनी जटिलताओं की एक बानगी पेश करती है।
​अगले सप्ताह फिर मिलेंगे प्रदेश की नई हलचलों के साथ।
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