लिपिक भर्ती 2013 की 1051 भर्तियां संदिग्ध, एसओजी जांच के बिना ही कर दिया बर्खास्त
Ashish Bhardwaj | Oct 04, 2026, 13:49 IST
लिपिक भर्ती 2013 की नियुक्तियां संदिग्ध
राजस्थान में 2013 की लिपिक भर्ती में 1051 नियुक्तियां संदिग्ध साबित हुई हैं। राज्यस्तरीय जांच में तीन जिलों से असामान्य गतिविधियों की रिपोर्टें सामने आई हैं। जांच में अनुभव और कंप्यूटर प्रमाण-पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज संदिग्ध पाए गए हैं। इस सिलसिले में अधिकारियों की भूमिका और पूरी भर्ती प्रक्रिया की जांच करने की मांग उठाई गई है, जिला परिषदों को सेवा समाप्त करने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।
राजस्थान में 2013 की लिपिक भर्ती एक बार फिर सवालों के घेरे में है। राज्यस्तरीय जांच में 1051 नियुक्तियां संदिग्ध मिली हैं। ये नियुक्तियां तीन जिलों में सामने आई हैं। एसओजी को जांच के लिए जानकारी देने के निर्देश थे। अब जिलों को सीधे सेवा समाप्ति के निर्देश मिले हैं।
पंचायती राज विभाग की लिपिक भर्ती का मामला पुराना है। साल 2013 में इस भर्ती में नियुक्तियां हुई थीं। अब इन नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं की जांच चल रही है। राज्यस्तरीय जांच में कई दस्तावेज संदिग्ध पाए गए हैं।
मामले में कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। खासकर एसओजी जांच को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। विधानसभा में भी एसओजी जांच की घोषणा हुई थी। इसके बावजूद अब अलग प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
राज्यस्तरीय जांच में तीन जिले सामने आए हैं। इनमें अलवर, जयपुर और भरतपुर शामिल हैं। अलवर में 302 नियुक्तियां संदिग्ध बताई गई हैं। जयपुर में 560 नियुक्तियों पर सवाल उठे हैं। भरतपुर में 189 नियुक्तियां संदिग्ध मिली हैं।
तीनों जिलों की संख्या जोड़कर 1051 होती है। इन नियुक्तियों में अलग-अलग तरह की अनियमितताएं मिली हैं। जांच में दस्तावेजों को लेकर भी सवाल सामने आए। कई मामलों में अनुभव प्रमाण-पत्र संदिग्ध मिले हैं। कुछ कंप्यूटर प्रमाण-पत्र भी जांच के दायरे में हैं। कुछ नियुक्तियों में कटऑफ से कम अंक मिले।
ऑफ-कैंपस कंप्यूटर प्रमाण-पत्र भी सामने आए हैं।
कार्मिक विभाग ने 6 जून 2024 को निर्देश जारी किए। इन निर्देशों में संदिग्ध नियुक्तियों की जानकारी मांगी गई थी। संदिग्ध मामलों की सूचना एसओजी को देने को कहा गया। साथ ही निर्धारित प्रक्रिया से जांच के निर्देश थे।
पंचायती राज विभाग ने ये निर्देश जिलों को भेजे। ये निर्देश 24 मार्च 2025 को जिलों तक पहुंचे। यानी विभागीय निर्देशों को पहुंचने में नौ महीने लगे। यहीं से कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। अब जिला परिषदों को अलग निर्देश दिए गए हैं।मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को सेवा समाप्ति के निर्देश मिले हैं।
संदिग्ध नियुक्तियों की एसओजी जांच नहीं होने पर सवाल है। ऐसी स्थिति में भर्ती प्रक्रिया की पूरी जांच कैसे होगी। गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच में आनी चाहिए। सीधे सेवा समाप्ति से यह पहलू छूट सकता है। यही सवाल इस पूरी प्रक्रिया को घेर रहा है। मामले में नियुक्त कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जा रही है। साथ ही भर्ती कराने वाले अधिकारियों की भूमिका अहम है।
यदि नियुक्ति में फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल हुए हैं। तो दस्तावेज उपलब्ध कराने वालों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। भर्ती प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांचनी होगी।
बीकानेर जिला परिषद का पुराना मामला भी सामने है। यह मामला साल 2017 में सामने आया था। इसमें 49 कथित फर्जी लिपिकों का मामला था। यह मामला अब तक कार्रवाई के इंतजार में है। जिला परिषद ने हाल में विभाग को जवाब भेजा। उस जवाब में तत्कालीन जिला प्रमुख का जिक्र है।
जिला परिषद के जवाब में एक दावा सामने आया। इसमें बर्खास्तगी रोकने की बात कही गई है। वर्षों पुराने मामले में अभी कार्रवाई लंबित बताई गई है। अब नए मामलों में सीधी बर्खास्तगी की तैयारी है। इसी वजह से विभाग की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।
पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने बयान दिया था। उन्होंने इसी साल फरवरी में विधानसभा में घोषणा की। इसमें लिपिक भर्ती मामले की एसओजी जांच शामिल थी। ऐसे में मौजूदा प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विभाग अब सीधे सेवा समाप्ति की तैयारी कर रहा है। वहीं एसओजी को सूचना देने पर भी सवाल है। दोनों प्रक्रियाओं के बीच तालमेल साफ नहीं है। यही वजह है कि मामले में सवाल बढ़ रहे हैं।
मामले में केवल नियुक्त कर्मचारियों की जांच नहीं है। भर्ती प्रक्रिया में अधिकारियों की भूमिका भी अहम है। संदिग्ध प्रमाण-पत्रों की जांच भी जरूरी मानी जा रही है। कटऑफ से कम अंक होने पर भी सवाल है। ऑफ-कैंपस प्रमाण-पत्रों पर भी आपत्ति सामने आई है। ऐसे दस्तावेज नियुक्ति प्रक्रिया में कैसे स्वीकार हुए।
इस सवाल का जवाब भी जांच से मिलना चाहिए। अभी उपलब्ध जानकारी में जांच का पूरा निष्कर्ष नहीं है। पुलिस या एसओजी की विस्तृत जांच रिपोर्ट भी सामने नहीं है।इसलिए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
जिला परिषदों में संदिग्ध नियुक्तियों पर कार्रवाई होगी। सेवा समाप्ति के निर्देशों पर आगे प्रक्रिया चलेगी। साथ ही पूरे मामले पर सवाल बने हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल जांच के तरीके को लेकर है। क्या सभी मामलों की अलग से जांच होगी। क्या भर्ती से जुड़े अधिकारियों की भूमिका सामने आएगी। इन सवालों का जवाब आगे की कार्रवाई से मिलेगा।
1051 संदिग्ध नियुक्तियों का मामला अब बड़ा मुद्दा है। पुराने निर्देश और नए आदेश आमने-सामने दिख रहे हैं। विधानसभा की घोषणा के बाद प्रक्रिया पर नजर है।
पंचायती राज विभाग की लिपिक भर्ती का मामला पुराना है। साल 2013 में इस भर्ती में नियुक्तियां हुई थीं। अब इन नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं की जांच चल रही है। राज्यस्तरीय जांच में कई दस्तावेज संदिग्ध पाए गए हैं।
मामले में कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठ रहे हैं। खासकर एसओजी जांच को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। विधानसभा में भी एसओजी जांच की घोषणा हुई थी। इसके बावजूद अब अलग प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
तीन जिलों में मिली गड़बड़ी
तीनों जिलों की संख्या जोड़कर 1051 होती है। इन नियुक्तियों में अलग-अलग तरह की अनियमितताएं मिली हैं। जांच में दस्तावेजों को लेकर भी सवाल सामने आए। कई मामलों में अनुभव प्रमाण-पत्र संदिग्ध मिले हैं। कुछ कंप्यूटर प्रमाण-पत्र भी जांच के दायरे में हैं। कुछ नियुक्तियों में कटऑफ से कम अंक मिले।
ऑफ-कैंपस कंप्यूटर प्रमाण-पत्र भी सामने आए हैं।
एसओजी जांच के निर्देश थे
पंचायती राज विभाग ने ये निर्देश जिलों को भेजे। ये निर्देश 24 मार्च 2025 को जिलों तक पहुंचे। यानी विभागीय निर्देशों को पहुंचने में नौ महीने लगे। यहीं से कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। अब जिला परिषदों को अलग निर्देश दिए गए हैं।मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को सेवा समाप्ति के निर्देश मिले हैं।
सीधी बर्खास्तगी पर सवाल क्यों
यदि नियुक्ति में फर्जी दस्तावेज इस्तेमाल हुए हैं। तो दस्तावेज उपलब्ध कराने वालों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। भर्ती प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांचनी होगी।
बीकानेर का मामला भी लंबित
जिला परिषद के जवाब में एक दावा सामने आया। इसमें बर्खास्तगी रोकने की बात कही गई है। वर्षों पुराने मामले में अभी कार्रवाई लंबित बताई गई है। अब नए मामलों में सीधी बर्खास्तगी की तैयारी है। इसी वजह से विभाग की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।
विधानसभा में एसओजी जांच का ऐलान
अधिकारियों की भूमिका जांचना भी जरूरी
इस सवाल का जवाब भी जांच से मिलना चाहिए। अभी उपलब्ध जानकारी में जांच का पूरा निष्कर्ष नहीं है। पुलिस या एसओजी की विस्तृत जांच रिपोर्ट भी सामने नहीं है।इसलिए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
अब आगे क्या होगा
1051 संदिग्ध नियुक्तियों का मामला अब बड़ा मुद्दा है। पुराने निर्देश और नए आदेश आमने-सामने दिख रहे हैं। विधानसभा की घोषणा के बाद प्रक्रिया पर नजर है।
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