राजस्थान में साइबर ठगी का बड़ा नेटवर्क, 50% से ज्यादा रकम विदेश तक पहुंचने का दावा
Jyoti Mahender Bhardwaj | Sept 24, 2026, 12:45 IST
कॉर्पोरेट बैंक अकाउंट का भी इस्तेमाल
राजस्थान में साइबर ठगी के मामलों की जांच के दौरान पैसे को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का पूरा नेटवर्क सामने आया है। पुलिस के मुताबिक ठगी की रकम भारतीय सिम और बैंक खातों में पहुंचती है।
समझें क्या है पूरा मामला
- साइबर ठगी की रकम पहले भारतीय बैंक खातों में पहुंचाई जाती है।
- इसके बाद रकम कई म्यूल अकाउंट में बांट दी जाती है।
- कैश निकालने और दूसरे खातों में जमा कराने का काम अलग लोग करते हैं।
- रकम को USDT में बदलकर Telegram पर मिले क्रिप्टो एड्रेस पर भेजा जाता है।
- पुलिस अब बैंकिंग और डिजिटल ट्रेल के जरिए इस नेटवर्क की आगे की कड़ियां तलाश रही है।
जांच के मुताबिक, साइबर ठगी से मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा अलग-अलग भारतीय बैंक खातों में पहुंचाया जाता है। इसके बाद पैसे को कई खातों में घुमाया जाता है। आखिर में इसे USDT यानी क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेश में बैठे हैंडलर्स तक पहुंचाने का काम किया जाता है। जयपुर के सेंट्रल साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन की जांच में साइबर ठगी के पैसे के इस पूरे नेटवर्क का तरीका सामने आया है।
पहले ठगी, फिर शुरू होता है पैसे का खेल
ठगी की रकम पहले भारतीय लोगों के नाम पर खुले बैंक खातों में पहुंचती है। इसके बाद इसे दूसरे खातों में भेज दिया जाता है। कई बार रकम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया जाता है। इससे पैसे का असली स्रोत पता करना मुश्किल हो जाता है।
भारतीय सिम और बैंक खाते बन रहे बड़ी कड़ी
Telegram से USDT तक पहुंचती है रकम
कॉर्पोरेट बैंक अकाउंट का भी इस्तेमाल
आरोप है कि अकाउंट होल्डर से इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी लेकर उसका इस्तेमाल किया जाता है। कई मामलों में अकाउंट से जुड़ी सिम भी अपने पास रखने की कोशिश की जाती है। इससे खाते में आने वाली रकम और होने वाले ट्रांजैक्शन पर नजर रखना आसान हो जाता है।
मोबाइल का कंट्रोल भी लेने की कोशिश
पैसे को कई हिस्सों में बांटकर निकालते हैं
हर काम के लिए अलग टीम
40 से 50 फीसदी तक कमीशन में जाने का दावा
पुलिस की जांच में दावा किया गया है कि इस तरह स्थानीय नेटवर्क में कुल रकम का करीब 40 से 50 फीसदी हिस्सा बंट जाता है। बाकी रकम USDT के जरिए विदेश में बैठे कथित हैंडलर्स तक पहुंचाई जाती है।
विदेश से जुड़े IP एड्रेस भी मिले
हालांकि सिर्फ IP एड्रेस मिलना किसी व्यक्ति के अपराध में शामिल होने का अंतिम सबूत नहीं माना जा सकता। इसके लिए पुलिस को दूसरे डिजिटल और वित्तीय सबूत भी जोड़ने होते हैं।
विदेश में बैठे लोग, भारत में अलग नेटवर्क
यानी पूरा नेटवर्क अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है। किसी एक व्यक्ति के पास पूरी जानकारी नहीं होती, जिससे जांच एजेंसियों के लिए पूरे नेटवर्क तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
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